अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धय: |
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् || गीता 7/24||
अर्थ : बुद्धिहीन लोग मेरे अविनाशी और सर्वश्रेष्ठ परम भाव को नहीं जानते और मुझ अव्यक्त को व्यक्त मनुष्य रूप धारण किया मानते हैं।

व्याख्या : निरंतर आत्मिक ज्ञान से बुद्धि प्रखर हो जाती है जिसके फलस्वरुप हमारा विवेक जग जाता है। यह जगा हुआ विवेक ही हमें अच्छे-बुरे,सत-असत और बंधन-मुक्ति का भेद कराता है। विवेक ही परमात्मा तक पहुँचने में हमारी राह आसान करता है।

विवेक से ही हम परमात्मा के परम भाव को जान पाते हैं, लेकिन जो लोग बुद्धिहीन होते हैं उनका विवेक नहीं जगता। ऐसे बुद्धिहीन लोग परमात्मा के अविनाशी और सर्वश्रेष्ठ परम भाव को नहीं जान पाते।

वे देवताओं के पूजन को ही परमात्मा का पूजन मानने लगते हैं। वे सोचते हैं कि मुझ निराकार परमात्मा ने ही यह मनुष्य रूप धारण किया है, जबकि परमात्मा रूप धारण नहीं करता, बल्कि परमात्मा तो पूरे ब्रह्माण्ड में निराकार के रूप में रचा-बसा है।

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मैं एक पत्नी होने के साथ साथ गृहिणी एवं माँ भी हुँ । लिखने का हुनर... ब्लॉग लिखती रहती हु... सनातन ग्रुप एक सकारात्मक ऊर्जा, आत्मनिर्भर बनाने की प्रेरणा देती जीवनी, राष्ट्रभक्ति गीत एवं कविताओं की माला पिरोया है । आग्रह :आपको पसन्द आये तो ऊर्जा देने के लिए शेयर एवं अपने सुझाव दीजिए ।

शालू सिंह

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