भुवनमण्डले नवयुगमुदयतु सदा विवेकानन्दमयम् ।
सुविवेकमयं स्वानन्दमयम् ॥धृ॥

तमोमयं जन जीवनमधुना निष्क्रियताऽऽलस्य ग्रस्तम् ।
रजोमयमिदं किंवा बहुधा क्रोध लोभमोहाभिहतम् ।
भक्तिज्ञानकर्मविज्ञानै: भवतु सात्विकोद्योतमयम् ॥१॥

वह्निवायुजल बल विवर्धकं पाञ्चभौतिकं विज्ञानम् ।
सलिलनिधितलं गगनमण्डलं करतलफलमिव कुर्वाणम् ।
दीक्षुविकीर्णं मनुजकुलमिदं घटयतुचैक कुटुम्बमयम् ॥२॥

सगुणाकारं ह्यगुणाकारं एकाकारमनेकाकारम् ।
भजन्ति एते भजन्तु देवं स्वस्वनिष्ठया विमत्सरम् ।
विश्वधर्ममिममुदारभावं प्रवर्धयतु सौहार्दमयम् ॥३॥

जीवे जीवे शिवस्यरूपं सदा भवयतु सेवायाम् ।
श्रीमदूर्जितं महामानवं समर्चयतु निजपूजायाम् ।
चरतु मानवोऽयं सुहितकरं धर्मं सेवात्यागमयम् ॥४॥

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मैं एक पत्नी होने के साथ साथ गृहिणी एवं माँ भी हुँ । लिखने का हुनर... ब्लॉग लिखती रहती हु... सनातन ग्रुप एक सकारात्मक ऊर्जा, आत्मनिर्भर बनाने की प्रेरणा देती जीवनी, राष्ट्रभक्ति गीत एवं कविताओं की माला पिरोया है । आग्रह :आपको पसन्द आये तो ऊर्जा देने के लिए शेयर एवं अपने सुझाव दीजिए ।

शालू सिंह

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