चन्द्रमङ्गलस्तोत्रम्- चंद्रमा एक विभेदित निकाय है जिसका भूरसायानिक रूप से तीन भाग क्रष्ट, मेंटल और कोर है। चंद्रमा का २४० किलोमीटर त्रिज्या का लोहे की बहुलता युक्त एक ठोस भीतरी कोर है और इस भीतरी कोर का बाहरी भाग मुख्य रूप से लगभग ३०० किलोमीटर की त्रिज्या के साथ तरल लोहे से बना हुआ है। कोर के चारों ओर ५०० किलोमीटर की त्रिज्या के साथ एक आंशिक रूप से पिघली हुई सीमा परत है। संघात खड्ड निर्माण प्रक्रिया एक अन्य प्रमुख भूगर्भिक प्रक्रिया है जिसने चंद्रमा की सतह को प्रभावित किया है, इन खड्डों का निर्माण क्षुद्रग्रहों और धूमकेतुओं के चंद्रमा की सतह से टकराने के साथ हुआ है। चंद्रमा के अकेले नजदीकी पक्ष में ही १ किमी से ज्यादा चौड़ाई के लगभग ३,००,००० खड्डों के होने का अनुमान है। इनमें से कुछ के नाम विद्वानों, वैज्ञानिकों, कलाकारों और खोजकर्ताओं पर हैं। चंद्र भूगर्भिक कालक्रम सबसे प्रमुख संघात घटनाओं पर आधारित है, जिसमें नेक्टारिस, इम्ब्रियम और ओरियेंटेल शामिल है, एकाधिक उभरी सतह के छल्लों द्वारा घिरा होना इन संरचनाओं की ख़ास विशेषता है। २००८ में चंद्रयान अंतरिक्ष यान ने चन्द्रमा पर सतह जल बर्फ के अस्तित्व की पुष्टि की है। नासा ने इसकी पुष्टि की है। चंद्रमा का करीब 1-100 नैनोटेस्ला का एक बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र है। पृथ्वी की तुलना में यह सौवें भाग से भी कम है। चन्द्र से सम्बंधित यहाँ चन्द्रमङ्गलस्तोत्रम् दिया जा रहा है ताकि पाठक लाभ उठा सके।

|| चन्द्रमङ्गलस्तोत्रम् ||

चन्द्रः कर्कटकप्रभुः सितनिभश्चात्रेयगोत्रोद्भवम् ।

आग्नेयश्चतुरस्रवा षण्मुखश्चापोऽप्युमाधीश्वरः ।

षट्सप्तानि दशैक शोभनफलः शौरिप्रियोऽर्को गुरुः ।

स्वामी यामुनदेशजो हिमकरः कुर्यात्सदा मङ्गलम् ॥

प्रार्थना

आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम् ।

पूजाविधिं न हि जानामि क्षमस्व परमेश्वर ॥

मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर ।

यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे ॥

रोहणीश सुधामूर्ते सुधारूप सुधाशन ।

सोम सौम्यो भवास्माकं सर्वारिष्टं निवारय ॥

ॐ अनया पूजया चन्द्रदेवःप्रीयताम् ॥

॥ ॐ चन्द्राय नमः ॐ शशाङ्काय नमः ॐ सोमाय नमः ॥

॥ ॐ शान्तिः ॐ शान्तिः ॐ शान्तिः ॐ ॥

इति श्रीचन्द्रमङ्गलस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।

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शालू सिंह

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