अधिभूतं क्षरो भाव: पुरुषश्चाधिदैवतम्। अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ।। गीता 8/4।।

अर्थ: हे शरीरधारियों में श्रेष्ठ (अर्जुन)! अधिभूत मेरी नश्वर प्रकृति है, हिरण्यगर्भ पुरुष अधिदैव है और इस शरीर में सब यज्ञों का आधार मैं ही हूं।

व्याख्या : यहां भगवान अर्जुन को शरीर धारियों में श्रेष्ठ नाम से सम्बोधन कर रहे हैं, क्योंकि अर्जुन अब अपने गुरु श्रीकृष्ण से ज्ञान प्राप्त कर रहा है। जो आत्मा की खोज में लगा होता है, वही श्रेष्ठ मनुष्य होता है।

भगवान् कह रहे हैं कि यह दिखाई देने वाली प्रकृति एक दिन नष्ट होने वाली है, इस प्रकृति में हर समय होता रहता है, यह मेरी अधिभूत प्रकृति है और जिसके गर्भ से यह संपूर्ण ब्रह्माण्ड प्रकट हुआ है वह अधिदैव हिरण्यगर्भ है और शरीरों में जितनी भी गतिविधियां होती है या इस शरीर से जो भी कर्म होता है, उन सभी गतिविधियों और कर्मों को करने की शक्ति का आधार भी मैं ही हूं।

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मैं एक पत्नी होने के साथ साथ गृहिणी एवं माँ भी हुँ । लिखने का हुनर... ब्लॉग लिखती रहती हु... सनातन ग्रुप एक सकारात्मक ऊर्जा, आत्मनिर्भर बनाने की प्रेरणा देती जीवनी, राष्ट्रभक्ति गीत एवं कविताओं की माला पिरोया है । आग्रह :आपको पसन्द आये तो ऊर्जा देने के लिए शेयर एवं अपने सुझाव दीजिए ।

शालू सिंह

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