श्रीभगवानुवाच।

अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते। भूतभावोद्भवकरो विसर्ग: कर्मसञ्ज्ञित: ।। गीता 8/3।।

अर्थ : श्री भगवान् बोले ! ब्रह्म, परम अक्षर है, स्वभाव को अध्यात्म कहा जाता है, भूतों के भाव को उत्पन्न करने वाला त्याग कर्म कहलाता है।

व्याख्या : भगवान् अब महत्वपूर्ण प्रश्नों का उत्तर देते हुए कहते हैं कि जिसका कभी नाश नहीं होता, जो हमेशा क्षररहित है, अक्षर है,वही ब्रह्म है, ब्रह्म में कभी परिवर्तन नहीं होता। अतः परम अक्षर ब्रह्म है, वो कभी नष्ट नहीं होता, या यूं कहे कि परमात्मा ही ब्रह्म है।

दूसरे प्रश्न का उत्तर देते हुए कहते हैं कि परब्रह्म का जो प्रत्येक शरीर में अंतर आत्मा का भाव है उसका नाम स्वभाव है, वह स्वभाव ही अध्यात्म कहलाता है। तीसरे प्रश्न का उत्तर देते हुए कह रहे हैं कि भूत वस्तुको उत्पन्न करने वाला जो त्याग है, वह त्याग रूप यज्ञ कर्म नामसे कहा जाता है। इस बीज रूप यज्ञसे ही वृष्टि आदिके सभी भूतप्राणी पैदा होते हैं।

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शालू सिंह

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