छिन्नमस्ता स्तोत्र || Chhinnamasta Stotra

यह महापुण्यकारक ब्रह्मकृत छिन्नमस्ता स्तोत्र है। इसे ब्रह्मा ने बहुत पहले कहा था। यह समस्त सिद्धियों का दाता और साक्षात् महापाप का नाशक है। जो प्रातः उठकर देवी के निकट जाकर इसका पाठ करता है, हे देवि ! उसे अभीष्टदायिनी सिद्धि प्राप्त होती है। धन, धान्य, पुत्र, पत्नी, घोड़ा, हाथी, भूमि, महाविद्या तथा आठों सिद्धियाँ निश्चिच रूप से प्राप्त होती हैं ।

ब्रह्मकृतं छिन्नमस्तास्तोत्रम्

अथ स्तोत्रम् ।

ईश्वर उवाच –

नाभौ शुभ्रारविन्दं तदुपरि विलसन्मण्डलं चण्डरश्मेः।

संसारस्यैकसारां त्रिभुवनजननीं धर्मकामार्थदात्रीम् ॥

तस्मिन्मध्ये त्रिमार्गे त्रितयतनुधरां छिन्नमस्तां प्रशस्तां

तां वन्दे छिन्नमस्तां शमनभयहरां योगिनीं योगमुद्राम् ॥ १॥

नाभि भाग में स्वच्छ कमल के ऊपर विराजमान तीव्र रश्मि, समूह की सृदृश, संसार की आधार स्वरूपा, तीनों लोकों की जननी, धर्म अर्थ और काम को प्रदान करने वाली, उस कमल के मध्य भाग में तीन धाराओं के रूप में तीन शरीर में विभक्त समस्त भय को दूर करने वाली, योगियों के आराध्य योग मुद्रावस्था भगवती छिन्नमस्ता को मैं भावपूर्ण नमन करता हूं।

नाभौ शुद्धसरोजवक्त्रविलसद्बन्धूकपुष्पारुणं ।

भास्वद्भास्करमण्डलं तदुदरे तद्योनिचक्रं महत् ॥

तन्मध्ये विपरीतमैथुनरतप्रद्युम्नसत्कामिनी ।

पृष्ठस्थाम् तरुणार्ककोटिविलसत्तेजस्स्वरूपां भजे ॥ २॥

नाभि स्थित स्वच्छ कमल के सदृश बंधूक पुष्प के समान रक्त वर्ण की शोभा से युक्त, चमकते हुए सूर्य मण्डल के ऊपर सुशोभित योनिचक्र वाली, विपरीत मैथुन युक्त रति और कामदेव के पृष्ठ भाग पर करोड़ों तरुण सूर्य के तेज से सुशोभित भगवती छिन्नमस्ता की मैं वन्दना करता हूं।

वामे छिन्नशिरोधरां तदितरे पाणौ महत्कर्तृकां ।

प्रत्यालीढपदां दिगन्तवसनामुन्मुक्तकेशव्रजाम् ॥

छिन्नात्मीयशिरस्समुच्छलदसृग्धारां पिबन्तीं परां ।

बालादित्यसमप्रकाशविलसन्नेत्रत्रयोद्भासिनीम् ॥ ३॥

भगवती छिन्नमस्ता के विभिन्नरूपों वाली, बायें हाथ में खड्ग धारण की हुई, दिशारूपी वस्त्रों वाली, खुले हुए केशों से युक्त, कटे हुए मस्तक से निकलती हुई रक्तधारा को पान करती हुई, उदित होते हुए सूर्य के समान प्रकाशपुंजमयी त्रिनेत्र धारणी भगवती छिन्नमस्ता का मैं नमन करता हूं।

वामादन्यत्र नालं बहुगहनगलद्रक्तधाराभिरुच्चैः ।

गायन्तीमस्थिभूषां करकमललसत्कर्तृकामुग्ररूपाम् ॥

रक्तामारक्तकेशीमपगतवसनां वर्णिनीमात्मशक्तिं ।

प्रत्यालीढोरुपादामरुणितनयनां योगिनीं योगनिद्राम् ॥ ४॥

दूसरी ओर गाढ़े और ऊंची धाराओं वाली रक्त को पान करती हुई, हिलती हुई अस्थि मालाओं से सुशोभित, हाथ में चमकती हुई खड्ग धारण करने वाली भय प्रदान करने वाली, रक्तवर्ण से युक्त, निर्वस्त्र, अपार शक्ति सम्पन्न जंघा और रक्त नेत्रों वाली, योगिनी, योग निद्रा से युक्त भगवती छिन्नमस्ता का मैं हाथ जोड़कर वन्दन करता हूं।

दिग्वस्त्रां मुक्तकेशीं प्रलयघनघटाघोररूपां प्रचण्डां ।

दंष्ट्रा दुष्प्रेक्ष्य वक्त्रोदरविवरलसल्लोलजिह्वाग्रभासाम् ॥

विद्युल्लोलाक्षियुग्मां हृदयतटलसद्भोगिनीं भीममूर्त्तिं ।

सद्यश्छिन्नात्मकण्ठप्रगलितरुधिरैर्डाकिनीं वर्धयन्तीम् ॥ ५॥

दिशाओं रूपी वस्त्र से युक्त, खुले हुए बालों वाली प्रलय-कालीन घनघोर घटा के समान, भयावह रूपों वाली जिसके दातों को देखना कठिन है मुख रूपी खोह से लपलपाते हुए लाल जिह्वा से युक्त बिजली के समान चमकती हुई दो आंखों वाली हृदय पटल पर सुशोभित हारों वाली भयावह देह वाली, शीघ्र कटे हुए मस्तक से निकलते हुए रुधिर धाराओं से युक्त डाकिनियों को शक्ति प्रदान करती हुई भगवती को मैं नमन करता हूं।

ब्रह्मेशानाच्युताद्यैः शिरसि विनिहता मन्दपादारविन्दै-

राप्तैर्योगीन्द्रमुख्यैः प्रतिपदमनिशं चिन्तितां चिन्त्यरूपाम् ।

संसारे सारभूतां त्रिभुवनजननीं छिन्नमस्तां प्रशस्ता-

मिष्टां तामिष्टदात्रीं कलिकलुषहरां चेतसा चिन्तयामि ॥ ६॥

ब्रह्मा, विष्णु और महेश के द्वारा वंदित, मंदार और कमल पुष्प के द्वारा, योगियों से पूजित चरण वाली निरंतर ध्यान योग्य संसार के सारभूत तीनों लोकों की जननी श्रेष्ठस्वरूपा मनोकामनाओं को देने वाली, कलियुग के पाप को हरण करने वाली भगवती छिन्नमस्ता को मैं ध्यान करता हूं।

उत्पत्तिस्थितिसंहतीर्घटयितुं धत्ते त्रिरूपां तनुम् ।

त्रैगुण्याज्जगतो यदीय विकृतिर्ब्रह्माच्युतः शूलभृत् ॥

तामाद्यां प्रकृतिं स्मरामि मनसा सर्वार्थसंसिद्धये ।

यस्याः स्मेरपदारविन्दयुगले लाभं भजन्ते नराः ॥ ७॥।

उत्पत्ति स्थिति और संहार करने के लिए तीन रूपों में विभक्त, सत्व, रज और तमो गुण से संसार का निर्माण करने वाली, ब्रह्मा, विष्णु, महेशस्वरूपा जिसके चरण कमल को लोग मनोकामना पूर्ति के लिए पूजते हैं ऐसी आदि प्रकृति भगवती छिन्नमस्ता को मन से सर्वार्थ सिद्धि के लिए स्मरण करता हूं।

अभिलषितपरस्त्रीयोगपूजापरोऽहं ।

बहुविधजनभावारम्भसम्भावितोऽहम् ॥

पशुजनविरतोऽहं भैरवीसंस्थितोऽहं ।

गुरुचरणपरोऽहं भैरवोऽहं शिवोऽहम् ॥ ८॥

भगवती आदि शक्ति की पूजा में लगा हुआ, सभी जनों के द्वारा भावपूर्ण नमन करने में लगा हुआ, पशुत्वभाव से रहित, भगवती के चरण कमल में मन लगाया हुआ, गुरुचरणों का ध्यान करने वाला भैरव रूप में शिव स्वरूप हो जाता है।

इदं स्तोत्रं महापुण्यं ब्रह्मणा भाषितं पुरा ।

सर्वसिद्धिप्रदं साक्षान्महापातकनाशनम् ॥ ९॥

इस पवित्र स्तोत्र को जो सर्वसिद्धि देने वाला है तथा सब पापों को नाश करने वाला है, पूर्व युग में ब्रह्मा ने उच्चरित किया ।

यः पठेत्प्रातरुत्थाय देव्याः सन्निहितोऽपि वा ।

तस्य सिद्धिर्भवेद्देवि वाञ्छितार्त्थप्रदायिनी ॥ १०॥

जो व्यक्ति प्रातः उठ कर भगवती छिन्नमस्ता के सामने इस स्तोत्र का पाठ करता है, मनोकामना पूर्ति करने वाली भगवती छिन्नमस्ता उसको सिद्धि प्रदान करती है।

धनं धान्यं सुतं जायां हयं हस्तिनमेव च ।

वसुन्धरां महाविद्यामष्टसिद्धिं लभेद् ध्रुवम् ॥ ११॥

इसका प्रति दिन पाठ करने से साधक को धनधान्य, पुत्र, पत्नी, वाहन, भूमि तथा दस महाविद्याओं की सिद्धि प्राप्त होती है।

इति ब्रह्मकृतं छिन्नमस्तास्तोत्रम् ॥

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