राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् |
प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् || गीता 9/2||
अर्थ: यह विज्ञान सहित ज्ञान सब विद्याओं का राजा, अत्यंत गोपनीय, अति पवित्र, अति उत्तम, प्रत्यक्ष अनुभव से जानने योग्य, धर्मयुक्त, करने में बड़ा सरल और अविनाशी है।

व्याख्या: अर्जुन का शक्तिपात करने के बाद भगवान राजविद्या का वर्णन करते हुए कहते हैं कि यह जो ज्ञान मैंने तुझे दिया वो विज्ञान सहित ज्ञान जितनी भी प्रचलित विद्याएं हैं, उन सबका राजा है। अत्यंत गोपनीय है, इसलिए इसको अपने पास ही गुप्त रखना अन्यथा इसका रहस्य खो जाएगा, केवल गुरु को ही आगे शिष्यों को बताने का अधिकार होता है।

यह साधना अति पवित्र होने के कारण चित्त की अपवित्रता का नाश कर देती है। यह अति उत्तम है। इसका अभ्यास करते ही स्वयं साधक को अनेक प्रकार के अनुभव होने लगते हैं। यह धर्मयुक्त है अर्थात धर्म पर चलने में मदद करती है। करने में बड़ी सरल है, इसलिए सरलता से इसका अभ्यास कर पाएंगे। इसका कभी नाश नहीं हो सकता, क्योंकि यह शक्ति की साधना है जो साधक को अविनाशी आत्मा तक पहुंचाने में सहयोगी होती है।

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शालू सिंह

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