न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय।
उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु।। गीता 9/9।।

अर्थ: हे अर्जुन! कर्म मुझको नहीं बांधते हैं, क्योंकि मैं उन कर्मों में अनासक्त और उदासीन की भांति स्थित हूं।

व्याख्या: हम जो भी कर्म शरीर या मन से करते हैं या तो उनका फल तुरंत भोग लेते हैं या उन सभी का फल हमारे चित्त में इकठ्ठा हो जाता है। इस प्रकार कर्म अपने फल के कारण हमें बांध लेते हैं।

भगवान तरीका बता रहे हैं कि कर्म किस प्रकार किए जाएं कि वे हमें अपने फल में न बांध सकें। इसके लिए कर्मों को करते समय हमारे अंदर, कर्म और उसके फल की आसक्ति नहीं होनी चाहिए।

साथ ही हमारा भाव भी उदासीन होना चाहिए अर्थात कर्म करने का अहंकार नहीं होना चाहिए, फिर कोई भी कर्म हमें नहीं बांध सकते। वैसे भी जब हम आत्म भाव में स्थित होते हैं, तब हमारे द्वारा किए गए सभी कर्म निष्काम हो जाते हैं, फिर हम उन कर्मों में नहीं बंधते।

, , , , , , , , ,

मैं एक पत्नी होने के साथ साथ गृहिणी एवं माँ भी हुँ । लिखने का हुनर... ब्लॉग लिखती रहती हु... सनातन ग्रुप एक सकारात्मक ऊर्जा, आत्मनिर्भर बनाने की प्रेरणा देती जीवनी, राष्ट्रभक्ति गीत एवं कविताओं की माला पिरोया है । आग्रह :आपको पसन्द आये तो ऊर्जा देने के लिए शेयर एवं अपने सुझाव दीजिए ।

शालू सिंह

🙏 सकारात्मक जानकारी को फेसबुक पर पाने के लिए लाइक करें 👇

Leave a Reply