गणेश चतुर्थी – चतुर्थी महीने में दो बार आता है,एक शुक्लपक्ष को और दूसरा कृष्णपक्ष को। इन दोनों ही चतुर्थी को चतुर्थी का व्रत किया जाता है। कृष्णपक्ष की चतुर्थी को संकटा या संकष्टी और शुक्लपक्ष की चतुर्थी को वरद चतुर्थी या विनायक चतुर्थी कहा जाता है।इसके अलावा चतुर्थी को बहुला चतुर्थी या बहुला चौथ, सकट चौथ, तिलकुंद चतुर्थी भी कहा जाता है। यहाँ चतुर्थी जो की संकटा या संकष्टी और वरद या विनायक हर माह में होता ही है,जानेंगे।

संकटा या संकष्टी अर्थात् संकट को हरने वाला और वरद या विनायक अर्थात् वर प्रदान करने वाला। संकटा या संकष्टी चतुर्थी में पूजन चंद्रोदय पर करें तथा वरद या विनायक चतुर्थी में पूजन दोपहर को किया जाता है। इस व्रत में भगवान श्री गणेश जी का पूजन किया जाता है।

गणेश जी को विघ्नहर्ता कहा जाता है। अतः यह व्रत आर्थिक संकट को दूर करने, सुख-समृद्धि, धन-दौलत में वृद्धि,सुखमय वैवाहिक जीवन तथा जीवन में आने वाली समस्त समस्याओं के निवारण के लिए किया जाता है।

यह व्रत सूर्योदय से प्रारम्भ कर चंद्र दर्शन के बाद भगवान गणेश और चंद्रमा की पूजा करके व्रत खोलने की परंपरा है। शिव पुराण के अनुसार भगवान गणेश का जन्म मध्याह्न में हुआ था इसलिए दोपहर में भगवान गणेश की पूजा किया जाता है।

गणेश चतुर्थी । Ganesh chaturthi

संकटा या संकष्टी और वरद या विनायक चतुर्थी की पौराणिक व्रत कथा निम्न है-

संकष्टी चतुर्थी व्रत पौराणिक व्रत कथा

राजा हरिश्चंद्र के राज्य में एक कुम्हार था। वह मिट्टी के बर्तन बनाता, लेकिन वे कच्चे रह जाते थे। अब एक पुजारी की सलाह पर उसने इस समस्या को दूर करने के लिए एक छोटे बालक को मिट्टी के बर्तनों के साथ भट्ठी में डाल दिया। उस दिन संकष्टी चतुर्थी का दिन था। उस बच्चे की माँ ने संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखी थी। माँ अपने बेटे को इतनी देर तक घर में न पाकर परेशान थी। उसने गणेश जी से बेटे की कुशलता की प्रार्थना की।

दूसरे दिन जब कुम्हार ने सुबह उठकर देखा तो भट्ठी में उसके बर्तन तो पक गए थे, लेकिन बालक भी सकुशल था। वह डर गया और राजा के दरबार में जाकर सारी घटना बताई। इसके बाद राजा ने उस बच्चे और उसकी माँ को बुलवाया तो माँ ने सभी तरह के विघ्न को दूर करने वाले संकष्टी चतुर्थी का वर्णन किया। इस घटना के बाद से महिलाएं संतान और परिवार के सौभाग्य के लिए सकट चौथ का व्रत करने लगीं।

संकष्टी चतुर्थी व्रत की दूसरी पौराणिक व्रत कथा

एक बार ऋषिगण,भगवान स्कन्द पूछते हैं कि हे स्वामिन! दरिद्रता, शोक, कुष्ठ, विकलांगता, शत्रुओं से संतप्त, राज्य से निष्कासित राजा, सदैव दुःखी रहने वाले, धनहीन, समस्त उपद्रवों से पीड़ित, विद्याहीन, संतानहीन, घर से निष्कासित, रोगियों एवं अपने कल्याण की इच्छा रखने वाले मनुष्यों को कौन-सा उपाय करना चाहिए, जिससे उनको कष्टों से मुक्ति मिले और कल्याण हो।

स्वामी कार्तिकेय जी ने कहा- हे ऋषियों! आपने जो प्रश्न किया हैं, उसके निवारणार्थ मैं आप लोगों को एक शुभदायक व्रत कहता हूं, उसे सुनिए। इस व्रत के करने से पृथ्वी के समस्त प्राणी सभी संकटों से मुक्त हो जाते हैं। यह व्रतराज महापुण्यकारी एवं मानवों को सभी कार्यों में सफलता प्रदान करने वाला है। यदि इस व्रत को महिलाएं करें तो उन्हें संतान एवं सौभाग्य की वृद्धि होती है।इस व्रत को धर्मराज युधिष्ठिर ने किया था।

पूर्वकाल में राजच्युत होकर अपने भाइयों के साथ जब धर्मराज वन में चले गए थे, तो उस वनवास काल में युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण कहा कि, हे केशव! आप सर्वज्ञ हैं। अतः हमें कोई ऐसा उपाय बतलाइए जिससे हम वर्तमान संकटों से मुक्त हो सके और आगे हम लोगों को अब किसी प्रकार का कष्ट न भुगतना पड़े ।

स्कंद जी कहते है कि जब धैर्यवान युधिष्ठिर विनम्र भाव से हाथ जोड़कर, बारम्बार अपने कष्टों के निवारण का उपाय पूछने लगे तो भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा कि हे राजन! संपूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाला एक गुप्त व्रत हैं। हे युधिष्ठिर! इस व्रत के संबंध में मैंने आज तक किसी को नहीं बतलाया हैं।

हे राजन! प्राचीनकाल में सतयुग की बात हैं कि पर्वतराज हिमाचल की कन्या पार्वती ने शंकर जी को पति रूप में प्राप्त करने के लिए गहन वन में जाकर कठोर तपस्या की। परन्तु भगवान शिव प्रसन्न होकर प्रकट नहीं हुए तब पार्वती ने गणेश जी का स्मरण किया।गणेश जी को उसी क्षण प्रकट देखकर पार्वती जी ने पूछा कि मैंने कठोर, दुर्लभ एवं लोमहर्षक तपस्या की, किन्तु अपने प्रिय भगवान् शिव को प्राप्त न कर सकी। अतः आप मुझसे कोई ऐसा दिव्य व्रत कहिए जो कष्टविनाशक हो और जिससे मुझे भगवान की प्राप्ति हो सके।

पार्वती जी की बात सुनकर सिद्धि दाता गणेश जी उस कष्टनाशक, शुभदायक व्रत का प्रेम से वर्णन करने लगे। गणेश जी ने कहा- हे अचलसुते! आप अत्यंत पुण्यकारी एवं समस्त कष्टनाशक व्रत को कीजिए। इसके करने से आपकी सभी आकांक्षाएं पूर्ण होगी और भी जो व्यक्ति इस व्रत को करेंगे उन्हें भी सफलता मिलेगी। श्रावण के कृष्ण चतुर्थी की रात्रि में चंद्रोदय होने पर पूजन करना चाहिए। उस दिन मन में संकल्प करें कि जब तक चंद्रोदय नहीं होगा, मैं निराहार रहूंगी। गणेश पूजन कर ही भोजन करूंगी। मन में ऐसा निश्चय करना चाहिए। इसके बाद सफ़ेद तिल के जल से स्नान करें। मेरा पूजन करें, तथा अपनी सामर्थ्य के अनुसार सोने, चांदी, तांबे अथवा मिट्टी के कलश में जल भरकर कलश पर वस्त्राच्छादन करके अष्टदल कमल की आकृति बनावें और उस पर गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करें। तत्पश्चात षोडशोपचार विधि से भक्ति पूर्वक पूजन करें। और नाना प्रकार के प्रसाद बनाकर भगवान को भोग लगाएं।

फिर चतुर्थी को अर्घ्य प्रदान करते हुए कहें कि हे चतुर्थी! तुम सब तिथियों में सर्वोत्तम हो, गणेश जी की परम प्रिय हो। हमारे द्वारा प्रदत अर्ध्य को ग्रहण करों, तुम्हें प्रणाम हैं।

फिर चन्द्रमा को अर्घ्य प्रदान करते हुए कहें कि- क्षीरसागर से उत्पन्न हे लक्ष्मी के भाई! हे निशाकर! रोहिणी सहित हे शशि! मेरे दिए हुए अर्घ्य को ग्रहण कीजिए।

अब गणेश जी को प्रणाम करते हुए कि – हे लम्बोदर! आप सम्पूर्ण इच्छाओं को पूर्ण करने वाले हैं आपको प्रणाम हैं। हे समस्त विघ्नों के नाशक! आप मेरी अभिलाषाओं को पूर्ण करें।

हे देवी! शुद्ध देशी घी में पंद्रह लड्डू बनाएं। सर्व प्रथम भगवान को लड्डू अर्पित करके उसमें से पांच ब्राह्मणों को दे दें। अपनों सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा देकर चंद्रोदय होने पर भक्तिभाव से अर्घ्य देवें। तत्पश्चात पांच लड्डू का स्वयं भोजन करें। इस प्रकार पूजन सम्पन्न करें। इसके बाद ब्राह्मण भोजन कराकर गणेश जी से प्रार्थना कर प्रतिमा का विसर्जन करें ।

यदि इन सब कार्यों के करने को शक्ति न हो तो अपने भाई-बंधुओं के साथ दही एवं पूजन में निवेदित पदार्थ का भोजन करें।इस प्रकार जीवन भर गणेश चतुर्थी का व्रत करना चाहिए। यदि जन्म भर न कर सकें तो 21 वर्ष तक करें। यदि इतना करना भी संभव न हो तो एक वर्ष तक बारहों महीने के व्रत को करें। यदि इतना भी न कर सकें तो वर्ष के एक मास श्रावण को अवश्य ही व्रत करें और चतुर्थी को व्रत का उद्यापन करें।

गणेश चतुर्थी । Ganesh chaturthi

वरद चतुर्थी की पौराणिक व्रत कथा

एक बार भगवान शिव तथा माता पार्वती नर्मदा नदी के किनारे बैठे थे। तभी उनको चौपड़ खेलने की इच्छा हुई, लेकिन उनके अलावा कोई तीसरा नहीं था, जो खेल में हार जीत का फैसला करे। ऐसे में भगवान शिव ने कुछ तिनके एकत्रित कर उसका एक पुतला बनाकर उसकी प्राण-प्रतिष्ठा कर दी और उसे निर्णायक की भूमिका दी। अब भगवान शिव और माता पार्वती ने चौपड़ खेलना शुरू किया। यह खेल तीन बार चला पर संयोग से तीनों ही बार माता पार्वती जीत गईं। खेल समाप्त होने के बाद बालक से हार-जीत का फैसला करने के लिए कहा गया, तो उस बालक ने भगवान शिव को विजयी बताया। यह सुनकर माता पार्वती क्रोधित हो गईं और क्रोध में उन्होंने बालक को लंगड़ा होने, कीचड़ में पड़े रहने का श्राप दे दिया। बालक ने माता पार्वती से माफीमांगी और कहा कि यह मुझसे अज्ञानतावश ऐसा हुआ है, मैंने किसी द्वेषवश ऐसा नहीं किया। बालक द्वारा क्षमा मांगने पर माता ने कहा- कि यहां गणेशजी पूजन को नागकन्याएं आएंगी, उनके कहे अनुसार तुम गणेश व्रत करना, ऐसा करने से तुम मुझे प्राप्त करोगे।’ यह कहकर माता पार्वती शिवजी के साथ कैलाश पर्वत पर चली गई। अब एक वर्ष के बाद उस स्थान पर नागकन्याएं आईं, तब नागकन्याओं से गणेशजी के व्रत की विधि पुछकर उस बालक ने 21 दिन लगातार गणेशजी का व्रत किया। उसकी श्रद्धा-भाव से कि हुई व्रत व पूजन से गणेशजी प्रसन्न हुए। उन्होंने बालक को वर मांगने को कहा। बालक ने कहा- हे भगवन ! यदि आप प्रसन्न हैं तो मुझे इतनी शक्ति दीजिए कि मैं अपने पैरों से चलकर अपने माता-पिता के पास कैलाश पर्वत पर पहुंच सकूं। तब बालक को वरदान देकर गणेशजी अंतर्ध्यान हो गए। इसके बाद वह बालक कैलाश पर्वत पर पहुंच गया और कैलाश पर्वत पर पहुंचने की अपनी कथा उसने भगवान शिव को सुनाई। चौपड़ वाले दिन से माता पार्वती शिवजी से विमुख हो गई थीं अत: देवी के रुष्ट होने पर भगवान शिव ने भी बालक के बताए अनुसार 21 दिनों तक श्री गणेश का व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से माता पार्वती के मन से भगवान शिव के लिए जो नाराजगी थी, वह समाप्त हो गई। अब यह व्रत विधि भगवान शिव ने माता पार्वती को बताई। यह सुनकर माता पार्वती ने अपने पुत्र कार्तिकेय से मिलने की इच्छा से 21 दिनों तक श्री गणेश का व्रत किया तथा दूर्वा, फूल और लड्डूओं से गणेशजी का पूजन किया। व्रत के प्रभाव से 21वें दिन कार्तिकेय स्वयं माता पार्वती से मिलने पहुँचे। उस दिन से समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति करने वाला यह श्री गणेश चतुर्थी का व्रत पूरे संसार में किया जाने लगा।

वरद चतुर्थी की अन्य पौराणिक व्रत कथा

एक समय भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी के विवाह की तैयारियां चल रही थीं, इसमें सभी देवताओं को निमंत्रित किया गया लेकिन विघ्नहर्ता गणेश जी को निमंत्रण नहीं भेजा गया। सभी देवता अपनी पत्नियों के साथ विवाह में आए लेकिन गणेश जी उपस्थित नहीं थे, ऐसा देखकर देवताओं ने भगवान विष्णु से इसका कारण पूछा। उन्होंने कहा कि भगवान शिव और पार्वती को निमंत्रण भेजा है, गणेश अपने माता-पिता के साथ आना चाहें तो आ सकते हैं। हालांकि उनको सवा मन मूंग, सवा मन चाँवल, सवा मन घी और सवा मन लड्डू का भोजन दिनभर में चाहिए। यदि वे नहीं आएं तो अच्छा है। दूसरे के घर जाकर इतना सारा खाना-पीना अच्छा भी नहीं लगता। इस दौरान किसी देवता ने कहा कि गणेश जी अगर आएं तो उनको घर के देखरेख की जिम्मेदारी दी जा सकती है। उनसे कहा जा सकता है कि आप चूहे पर धीरे-धीरे जाएंगे तो बाराज आगे चली जाएगी और आप पीछे रह जाएंगे, इससे अच्छा तो आप घर की देखरेख करें। योजना के अनुसार, विष्णु जी के निमंत्रण पर गणेश जी वहां उपस्थित हो गए। उनको घर के देखरेख की जिम्मेदारी दे दी गई। बारात घर से निकल गई और गणेश जी दरवाजे पर ही बैठे थे, यह देखकर नारद जी ने इसका कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि विष्णु भगवान ने उनका अपमान किया है। तब नारद जी ने गणेश जी को एक सुझाव दिया। गणपति ने सुझाव अनुसार अपने चूहों की पूरी सेना बारात के आगे भेज दी, जिसने पूरे रास्ते खोद दिए।अब देवताओं के रथ जब उस रास्तों पर चली,तो रथों के पहिए रास्तों में ही फंस गए। बारात आगे नहीं जा पा रही थी। किसी के समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए, तब नारद जी ने गणेश जी को बुलाने का उपाय दिया ताकि देवताओं के विघ्न दूर हो जाएं। भगवान शिव के आदेश पर नंदी गणेश को लेकर आए। देवताओं ने गणेश जी का पूजन किया, तब जाकर रथ के पहिए गड्ढों से निकल तो गया किन्तु कई पहिए टूट गए थे। उस समय पास में ही एक लोहार काम कर रहा था, उसे बुलाया गया। उसने अपना काम शुरू करने से पहले गणेश जी का मन ही मन स्मरण किया और देखते ही देखते सभी रथों के पहियों को ठीक कर दिया। उसने देवताओं से कहा कि लगता है आप सभी ने शुभ कार्य प्रारंभ करने से पहले विघ्नहर्ता गणेश जी की पूजा नहीं की है, तभी ऐसा संकट आया है। आप सब गणेश जी का ध्यान कर आगे जाएं, आपके सारे काम हो जाएंगे। देवताओं ने गणेश जी की जय जयकार की और बारात अपने गंतव्य तक सकुशल पहुंच गई तथा भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का विवाह संपन्न हो पाया। इस प्रकार गणेश जी कृपा से सारे देवताओं का संकट टला और उन्हें मनवांक्षित फल की प्राप्ति हुई।

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गणेश चतुर्थी । Ganesh chaturthi की महिमा-

इस प्रकार यह गणेश चतुर्थी की महिमा है जिसमें की संकटा या संकष्टी चतुर्थी को चंद्रोदय से चंद्रोदय तक और वरद या विनायक चतुर्थी को दोपहर से दोपहर तक किया जाता है।

मैं एक पत्नी होने के साथ साथ गृहिणी एवं माँ भी हुँ । लिखने का हुनर... ब्लॉग लिखती रहती हु... सनातन ग्रुप एक सकारात्मक ऊर्जा, आत्मनिर्भर बनाने की प्रेरणा देती जीवनी, राष्ट्रभक्ति गीत एवं कविताओं की माला पिरोया है । आग्रह :आपको पसन्द आये तो ऊर्जा देने के लिए शेयर एवं अपने सुझाव दीजिए ।

शालू सिंह

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