नाहं प्रकाश: सर्वस्य योगमायासमावृत:। मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्।।

अपनी योगमाया से ढंका हुआ मैं सबको महसूस नहीं होता। इसलिए यह मूढ़ जगत मुझ अजन्मे और अविनाशी को नहीं जान पाता।

परमात्मा हमारे भीतर प्रकाश के रूप में बसते हैं, लेकिन हम उसको अनुभव नहीं कर पाते। इसका सबसे बड़ा कारण है हमारे चित्त में पड़े हुए संस्कार। हम जो कर्म करते हैं उस कर्म का फल हमारे मन में संस्कार के रूप में जमा हो जाता है। इन्हीं संस्कारों से हमारा संसार बनता है। जन्म-जन्मों के इन अच्छे और बुरे संस्कारों के कारण ही हम माया में फंसे रहते हैं और यह माया ही हमें परमात्मा से अलग किए रहती है।

ज्ञान के जरिए जब हम माया से ऊपर उठ जाते हैं तब हमें परमात्मा के दर्शन होते हैं। लेकिन मूढ़ जगत अज्ञानता के कारण सिर्फ माया में ही उलझा होने की वजह से मुझ परमात्मा के जन्मरहित और विनाशरहित स्वरूप को नहीं जान पाता। परमात्मा को अनुभव करने के लिए उसी परमात्मा की रची माया का उल्लंघन करना होता है, लेकिन मूढ़ लोग स्थूल चीजों में ही अटके रहते हैं।

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मैं एक पत्नी होने के साथ साथ गृहिणी एवं माँ भी हुँ । लिखने का हुनर... ब्लॉग लिखती रहती हु... सनातन ग्रुप एक सकारात्मक ऊर्जा, आत्मनिर्भर बनाने की प्रेरणा देती जीवनी, राष्ट्रभक्ति गीत एवं कविताओं की माला पिरोया है । आग्रह :आपको पसन्द आये तो ऊर्जा देने के लिए शेयर एवं अपने सुझाव दीजिए ।

शालू सिंह

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