कैसे हों त्रिगुणमयी माया के पार

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया |
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते || गीता 7/14||

अर्थ : मेरी यह त्रिगुणमयी दैवी माया बड़ी दुस्तर है, लेकिन जो मेरी शरण आते हैं, वे माया को पार कर जाते हैं ।
व्याख्या : परमात्मा की यह तीनों गुणों वाली माया सेल्स मेन की तरह काम करती है, इस माया का काम व्यक्ति को संसार में उलझाए रखना है, व्यक्ति को पता भी नहीं चलता कि माया उसे फंसा रही है, लेकिन वह जन्म से मृत्यु तक मनुष्य को उलझाए रखती है और जन्म-मरण में डालें रखती है। इस माया से पार पाना बड़ा मुश्किल है। अध्यात्म इसी माया से परे जाने की प्रक्रिया है। जब साधक अपने सभी कर्म व उनके फल व सब कुछ प्रभु को समर्पित कर देता है और पूरी तरह प्रभु की शरण में आ जाता है तब प्रभु की माया उस साधक को उलझाना बंद कर देती है और व्यक्ति जन्म-मरण के चक्कर को पार कर देता है।

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