कालिका पुराण अध्याय २५ || Kalika Puran Adhyay 25 Chapter

कालिका पुराण अध्याय २५ में सर्ग इत्यादि का वर्णन है।

अथ श्रीकालिका पुराण अध्याय २५                     

मार्कण्डेय मुनि ने कहा– हे द्विजश्रेष्ठों ! मैं आदि सर्ग वाराह का वर्णन करूँगा जिस तरह से कल्प-कल्प में वाराह में जैसी सृष्टि हुई थी । भगवान् हरि ने प्रतिसर्ग में उसी भाँति आदि सृष्टि को दिखलाकर भगवान् शम्भु के लिए प्रलय आदि को दिखलाया था, इसे समझ लो ।

सबसे प्रथम मैं प्रलय का प्रर्णन करूँगा । उसके पीछे आदि सर्ग को बतलाऊँगा । हे विप्रो! प्रति सर्ग में फिर वाराह का ज्ञान प्राप्त कर लो । काल के एक अंश को निमेष कहा जाता है जो नेत्रों के उन्मेष से विशेष लक्षित हुआ करता है । उन अठारह निमेषों से एक काष्ठा होती है और तीस काष्ठाओं की एक कला है। उतनी ही अर्थात् बीस कलाओं से एक क्षण नामक कहा गया है। बारह क्षणों से एक मुहूर्त कहा गया है तथा बीस मुहूर्तों से मनुष्यों का अहोरात्र होता है और पन्द्रह अहोरात्र का एक पक्ष होता है। पक्षों में मनुष्यों के वर्ष होते हैं जो कि पितृगणों का एक अहर्निश हुआ करता है । बारह मासों का एक वर्ष होता है जो देवों का एक अहोरात्र ही है । पितृगणों के कर्म के लिए कृष्ण पक्ष ही दिन माना गया है।

स्वप्न अर्थात् शयन करने के लिए शुक्ल पक्ष होता है जो रजनी कही गई है । उत्तरायण सूर्य के होने पर छः मास देवों का दिन कहा गया है । दक्षिणायन के छः मास देवों की रात्रि शयन करने की हुआ करती है। सूर्य के समुत्पन्न दो-दो मासों से ऋतु कहा गया है। तीन ऋतुओं का एक अयन होता है जो मनुष्यों का माना गया है । छः ऋतुओं का एक वत्सर (वर्ष) होता है। और उनको आप पृथक-पृथक सुनिये । हे द्विजोत्तमो ! संज्ञा के भेद से चैत्र आदि दो मासों से ऋतु को समझिए । चैत्र और वैशाख दो मास में बसन्त ऋतु होता है । ज्येष्ठ और आषाढ़ दो मास में ग्रीष्म ऋतु हुआ करता है। श्रावण और भाद्रपद इन दो मासों में वर्षा ऋतु हुआ करता है। आश्विन और कार्तिक मासों में शरद् हुआ करता है । अगहन और पौष में हेमन्त ऋतु होता है तथा माघ और फाल्गुन मासों में शिशिर ऋतु होता है । ये छै ऋतुये कही गई हैं जो यज्ञादि में पृथक विहित किये गये हैं। मनुष्यों के मान से सत्रह क्षय है और अट्ठाईस सहस्त्र का मान कृतयुग का है । अन्तराल में अर्थात युगों के मध्य में चार सौ वर्षों का सन्ध्याकाल होता है । सन्ध्यांश उतने से ही कहा गया है जो अन्तर्गत ईक्षित होता है ।

त्रेता युग मनुष्य के बारह लक्ष वर्षों का हुआ करता है और इस युग की सन्ध्या का समय छियानवे हजार तीन सौ वर्षों का हुआ करता है। उसके अन्दर तीन सौ सन्ध्यांश कहा गया है । प्रमाण से चौंसठ हजार लक्ष और आठ वर्ष का द्वापर का नाम वाला युग होता है उनमें दो सौ की सन्ध्या होती है। दो वर्ष का सन्ध्यांश अन्तर्गत ही अभीष्ट हुआ करता है । चार लाख बत्तीस हजार वर्ष कलियुग का समय होता है। वर्षों का मान होता है और एक सौ वर्ष की सन्ध्या का काल होता है। इसके अनन्तर में एक-एक सौ वर्ष का सन्ध्यांश है । इस रीति से कृतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग मानुषमाण से चार युग हुआ करता हैं। ये चारों युग सैंतालीस लाख वर्षों के मान से हुआ करता है । बीस सहस्र वर्षों की इन सबकी सन्ध्या का अंश हुआ करता है जो कि उस सन्ध्यांश से संयुत है ।

रात्रियों के सहित देवों का दिन मनुष्यों का एक वत्सर होता है । इस प्रकार से क्रम की गणना करके मनुष्यों के चारों युगों से देवों के बारह सहस्त्र वर्ष कीर्त्तित किये गए हैं। देवों के बारह सहस्त्र वर्षों का दैविक युग हुआ करता है । वह मनुष्यों के चार युग हैं जिसमें सन्ध्या और सन्ध्यांश भी सम्मिलित होता है। देवों के कृतयुग में त्रेता, द्वापर की व्यवस्था से युग व्यवहार नहीं है और धर्म आदि की भिन्नता भी नहीं है । किन्तु मनुष्यों का चतुर्युग अर्थात् चारों युग सदा देवों का युग होता है । इकहत्तर देवों के युगों से एक मन्वन्तर हुआ करता है । देवों के दो सहस्त्र युगों का ब्रह्माजी का एक अहोरात्र हुआ करता है । मनुष्यों के मान से दो सहस्त्र चारों युग होते हैं। एक ब्रह्माजी के दिन में चौदह मनु होते हैं । इस प्रकार से ब्रह्मा के मान तीन सौ दिनों से आठों से वत्सर होता है जैसे मनुष्यों का है वैसे ही ब्रह्मा का वर्ष होता है । ब्रह्मा अर्थात् ब्रह्मा के पाँच सौ वर्षों से परार्ध कीर्त्तित किया गया है। वह ईश्वर का दिवस है और उतनी ही रात्रि कही जाती है।

ब्रह्माजी के एक शत वर्ष का काल दूसरा परार्धक होता है द्वितीय परार्ध के व्यतीत हो जाने पर जो ब्रह्मा का है, प्रलय होता है । पर ब्रह्मा के लीन हो जाने पर जगतों का आधार, अव्यय और पर से भी पर है । उस ब्रह्मा के स्वरूप के दिवारात्र का जो होता है उससे हर नाम उसका आधा परार्ध कहा जाता है । जगत् के स्वरूप वाले भगवान् परमात्मा का अक्षर और अव्यय होता है । जो स्थूल से स्थूलतम और जो सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतम माना गया है उसका दिवारात्रि का व्यवहार नहीं होता है और वत्सर ही है । किन्तु पूर्व पौराणिकों के द्वारा और उस प्रकार के हमारे भी द्वारा सृष्टि और प्रलय का ज्ञान प्राप्त करने के लिए अहर्निश कल्पित किया जाया करता है । वह ही रात्रि है, वही वर्ष है और वह क्षिति है तथा सृष्टि के करने वाला हर है । वह विष्णु के रूप वाले पुराण पुरुष हैं । उसी से यह समस्त उसी की भांति विभात होता है । यह शाश्वत परमात्मा ब्रह्म के लीन होने पर यह सम्पूर्ण जगत् क्रम से ही उसके रूपत्व के लिए गमन किया करता है अर्थात् उसी का स्वरूप बन जाया करता है ।

ब्रह्मा के सौ वर्ष के अन्त में रुद्रदेव के स्वरूप वाले भगवान जनार्दन स्वयं इस जगत का अन्त करके परमरूप में लीनता को प्राप्त हो जाते हैं । सबसे प्रथम तो सवित अपनी परम तीक्षण किरणों से स्थावर और जंगम सम्पूर्ण जगत् के जल का शोषण करके स्वयं ग्रहण कर लेंगे। शुष्क वृक्ष, तृण, गण, प्राणी तथा पर्वत चूर्ण होकर दिव्य सौ वर्ष में विकीर्ण हो जायेंगे। फिर बारह सूर्यों की बहुत ही अधिक प्रबल किरणें हुई और जगत के भोग्य से उपवृहित द्वादश आदित्य हुए थे। द्यौ और मेदिनी उष्णता को प्राप्त हो गये थे । इसके उपरान्त सम्पूर्ण स्थावर और जंगम के विनष्ट जाने पर आदित्य की किरण से रुद्ररूपी देव जनार्दन उन्नत हो पाताल नदी को प्राप्त हो गये थे ।

सात पाताल के संस्थानों को नाग, गन्धर्व और राक्षसों को, देवों को, ऋषियों को और शेष को नर शूल के धारण करने वाले ने हनन कर दिया था । इसी प्रकार से स्वर्ग में, पाताल में, पृथ्वी में और सागरों में जो भी प्राणधारी जीव थे उन प्रभु जनार्दन ने उन सबको मार दिया था। इसके पश्चात मुख से महावायु का रुद्रदेव ने स्वयं सृजन किया था । वह अव्याहत गति वाला वायु दृढ़ता से संसार के तीनों भुवन के गर्भ में गमन करने वाला सौ वर्ष तक भ्रमण करता हुआ जो भी कुछ था उस सबको तुला राशि के ही समान उसको उत्साहित कर दिया था । सभी ओर जगत में रहने वाले सम्पूर्ण को समुत्साहित करके वेग में अत्यधिक वह वायु बारह आदित्यों में प्रवेश कर गया था । उनके मण्डल में प्रवेश करके उनके तेज के साथ वायु गुरुदेव के द्वारा प्रतियोजित होते हुए महान मेघों का उसने समारम्भ कर दिया था। फिर प्रेरित हुए वे मेघ जो उस वेग वाले वायु के द्वारा ही प्रेरित किये गये थे अतिरौद्र के द्वारा मेघों ने स्थल को घेर लिया था ।

सम्वर्त नाम वाले महामेघ जो भिन्न अञ्जन के समूह के समान थे । उनमें कुछ धूम्र वर्ण वाले थे, कुछ शुक्ल और कुछ चित्र विचित्र वर्ण वाले महाभीषण थे । कुछ मेघ पर्वत के तुल्य आकार से युक्त थे,कुछ नाम के समान प्रजा के समन्वित थे, कुछ बड़े विशाल प्रासाद के समान थे और कुछ क्रौंच के वर्ण वाले महान भीषण थे । वे महामेघ गर्जन करते हुए सौ वर्ष से भी अधिक समय तक महान शब्द करने वाले वे मेघ तीनों लोकों का प्लावन करते हुए वर्षा करते थे । इसके अनन्तर स्तम्भ (खम्भा) के प्रमाण वाले धाराओं के पास से खूब दृढ़ धारासार से जो कि बहुत ही महान थी तीनों भुवनों को पूरित कर दिया था । आधुवस्थान को प्राप्त करके जल समूह के स्थित होने पर रुद्ररूपी प्रभु जनार्दन ने अपने मुख से वायु का सृजन किया था । उस वायु के ओघ से क्षित मेघ सौ वर्ष तक अव्याहत गति वाले वायु के द्वारा फिर ध्वस्त हो गये थे । उन मेघों के विनिष्ट हो जाने पर फिर दया से सहित रुद्रदेव ने ब्रह्मभुवन तक जनलोक आदि का विध्वंस कर दिया था । समस्त भुवनों के विध्वस्त हो जाने पर और विशेष रूप से ब्रह्मलोक के विध्वस्त होने पर गुरुदेव द्वादश अरुणों के समीप गये थे । वे हरि महान वेग के साथ द्वादश आदित्यों के समीप में पहुँचे थे और उनको ग्रसित कर लिया था फिर उन गर्भ में स्थित दिवाकरों के द्वारा अत्यन्त प्रज्वलित हो गए थे। इसके उपरान्त कालान्तक के समान महान बलवान रुद्रदेव ब्रह्माण्ड में प्राप्त हुए थे और वह सबको मुष्टिपेष चूर्ण कर दिया था । ब्रह्माण्ड चूर्ण करते हुए उन्होंने पृथिवी को भी चूर्णित कर दिया था। उन हरि ने योग के बल से समस्त जलों को धारण कर लिया था। जो जल पूर्व में सब और ब्रह्माण्ड से बाहर स्थित था अथवा जो अभ्यन्तर में रहने वाला जल था वह सब एक रूपता को प्राप्त हो गया था । सब ओर सर्वव्यापी जनों के एकीभूत हो जाने पर ब्रह्माण्ड के खण्डों में पूर्णोध वह नौका की ही भाँति प्लवन करते हुए थे। इसके अनन्तर पृथ्वी का सार गन्ध तन्मात्रक से क्रम से जल ने ग्रहण कर लिया था और सम्पूर्ण पृथ्वी विनष्ट हो गई थी ।

फिर उन रुद्रदेव ने गर्भ में स्थित तेजों को अपने शरीर से निकाल दिया था । पुनः भीषण रूप से वे पुन्जीभूत हो गये थे । उन तेजों ने छोर तक स्थित सबको ग्रहण कर लिया था और भीतर, बाहर ब्रह्माण्ड से जो तेज था तथा अन्य से गया हुआ था उस सबको ग्रहण किया था ! जगत में रहने वाले सम्पूर्ण तेज का ग्रहण करके एक ही स्थान के जलते हुए ने रौद्र ब्रह्माण्ड के खण्डों को जल में त्रिर्दोष कर दिया था । ब्रह्माण्ड के चूर्णों का दाह करके वे तेज उज्ज्वलित हो गये थे फिर जलों से जो उनकी रस तन्मात्रा थी जो कि सारभूत थी उसका ग्रहण कर लिया था। रूप तन्मात्रा के ग्रहण किये जाने पर सम्पूर्ण तेज विनष्ट हो गये थे और अनादित वायु प्रबल हो गया था। इसके अनन्तर वायु महान शब्द वाले को प्राप्त करके अग्नि की भाँति प्रज्वलित होते हुए रुद्रदेव संक्षुब्ध हो गये थे और उस समय में आकाश को गया था ।

उससे संक्षुब्ध आकाश की वायु ने ग्रहण कर लिया था । उसके अन्दररूप की तन्मात्रा को लेकर फिर वायु भी नष्ट हो गया था । वायु के नष्ट हो जाने पर यह रुद्रदेव उस समय ब्रह्मा के शरीर में प्रवेश कर गये थे। उस अवसर पर ब्रह्मशरीर आकुल, निराधार और निराकुल हो गया था फिर शंख, चक्र और गदा के धारण करने वाले भगवान विष्णु के शरीर में उसने प्रवेश किया था। इसके उपरान्त महान् तेजस्वी भगवान कृष्ण ने अपना पञ्च भौतिक शरीर जो अच्युत और शंख, चक्र तथा गदा धारण करने वाला था सबसे सार का आदान करके अपनी शक्ति के द्वारा शीघ्र ही त्याग दिया था। जो बिना आधार वाला तथा आकार से रहित, निःसत्त और निरवह था । जो आनन्द से परिपूर्ण, अद्वैत, द्वैत से हीन और बिना विशेषण वाला था उसका त्याग कर दिया था ।

जो न तो स्थूल और न सूक्ष्म ही है जिसका ज्ञान नित्य एवं निरञ्जन है । वह एक ही परब्रह्म है जो सभी ओर से अपने द्वारा ही प्रकाश वाला है । जो न तो दिन है और न रात्रि ही है। न आकाश है। और न पृथ्वी है । वह तप भी नहीं था और अन्य ज्योति भी नहीं था । श्रीत्रादि और बुद्धि आदि से उपलभ्य एक प्राधानिक ब्रह्म है । उस समय में पुमान् था । इस प्रकार से जब तक यह सृष्टि स्थित थी तब तक ही सृष्टि का बलाबल था । एक ही परतत्व था फिर उससे सृष्टि प्रवृत्त होती है । क्योंकि सभी तन्मात्राओं का संचय प्रकृति में संस्थित था जो प्राकृत लय था उसके अहंकार और महत्तत्व गत हो गये थे । जो अतीत प्रलय वाला अव्यक्त था वह भी प्रकृति में संस्थित था इसी कारण से प्रत्येक यह संज्ञा प्राकृत संज्ञा वाला है और ऐसा कहा जाया करता है । हे विप्रो ! यह प्राकृत नाम वाला महान लय आपको बतला दिया है। मेरे द्वारा पुनः इस आदि सृष्टि का आप लोग श्रवण कीजिए ।

॥ इति श्रीकालिकापुराणे सर्गवर्णननाम पञ्चविंशतितमोऽध्यायः॥ २५ ॥

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