परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातन: | य: स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति || गीता 8/20||

अर्थ: निश्चित रूप से इस अव्यक्त से भी परे एक और सनातन अव्यक्त भाव है जो सब भूतों के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होता।

व्याख्या: पांच महाभूतों से बनी जो प्रकृति हमें दिखाई देती है, उसे व्यक्त कहते हैं और यही इस व्यक्त प्रकृति का मूल कारण है। जहां यह प्रकृति बीज रूप में विद्यमान होती है, उसको अव्यक्त कहते हैं। ऐसा नहीं है कि उस अव्यक्त से परे और कुछ भी नहीं है। इससे परे एक सनातन अव्यक्त भाव और भी है। यह ऐसा भाव है जो हमेशा एक जैसा ही रहता है। वह कुछ और नहीं बल्कि परमात्मा ही है।

वह सनातन अव्यक्त भाव कभी भी नष्ट नहीं होता। सारी सृष्टि और सभी भूतों के नाश हो जाने पर भी वह ज्यों का त्यों बना रहता है क्योंकि यह अनश्वर भाव है। योगी लोग उसी भाव को अपने भीतर अनुभव करते हैं। इसी सनातन अव्यक्त भाव में बने रहना मुक्ति है और इसी भाव को अनुभव करने की साधना भक्ति है।

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शालू सिंह

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