पुरुष: स पर: पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया।
यस्यान्त:स्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्।। गीता 8/22।।

अर्थ: हे पार्थ ! जिस परम पुरुष के अंतर्गत सभी भूत हैं और जिससे यह संपूर्ण जगत व्याप्त है उसको तो अनन्य भक्ति से ही प्राप्त कर सकते हैं।

व्याख्या: आत्मा को पुरुष भी कहा जाता है और जो सभी जीवात्माओं में श्रेष्ठ हो उसको परम पुरुष या परमात्मा कहते हैं। भगवान कह रहे हैं- हे पार्थ! पांच भूतों से बना इस संसार में जो भी है वो सब परमात्मा में ही है, सभी पदार्थों से लेकर प्रकृति और सभी भूत प्राणी, परमात्मा में ही स्थित है।

सारा संसार, सम्पूर्ण सृष्टि, आकाश गंगा आदि नक्षत्र जो भी जगत में हैं, वहां परमात्मा समान रूप से व्याप्त है। सर्वत्र विद्यमान परमात्मा को अपने भीतर पाने के लिए, परमात्मा की अनन्य भक्ति करते रहना चाहिए।

अनन्य भक्ति का अर्थ है कि परमात्मा के अलावा हमारा मन अन्य किसी वस्तु, पदार्थ या व्यक्ति का भक्त न हो, बस निरंतर परमात्मा का ही भाव मन में जगा रहे। इसप्रकार जब अनन्य भक्ति से परमात्मा को याद किया जाता है, तब साधक परमात्मा को अपने भीतर अनुभव करने लगता है।

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मैं एक पत्नी होने के साथ साथ गृहिणी एवं माँ भी हुँ । लिखने का हुनर... ब्लॉग लिखती रहती हु... सनातन ग्रुप एक सकारात्मक ऊर्जा, आत्मनिर्भर बनाने की प्रेरणा देती जीवनी, राष्ट्रभक्ति गीत एवं कविताओं की माला पिरोया है । आग्रह :आपको पसन्द आये तो ऊर्जा देने के लिए शेयर एवं अपने सुझाव दीजिए ।

शालू सिंह

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