प्रबल झंझावात में तू बन अचल हिमवान रे मन॥

हो बनी गंभीर रजनी सूझती हो नहीं अवनी।
ढल न अस्ताचल अचल में बन सुवर्ण विहान रे मन॥
प्रबल झंझावात में तू॥१॥

उठी रही हो सिन्धु लहरी हो न मिलती थाह गहरी।
नील-नीरधि का अकेला जन सुभग जलयान रे मन॥
प्रबल झंझावात में तू॥२॥

कमल कलियाँ सकुचती हों रश्मियाँ भी मचलती हों।
तू तुषार कुहा गगन में बन मधुप की तान रे मन॥
प्रबल झंझावात में तू ॥३॥

prabala jhaṁjhāvāta meṁ tū bana acala himavāna re mana ||

ho banī gaṁbhīra rajanī sūjhatī ho nahīṁ avanī |
ḍhala na astācala acala meṁ bana suvarṇa vihāna re mana ||
prabala jhaṁjhāvāta meṁ tū ||1||

uṭhī rahī ho sindhu laharī ho na milatī thāha gaharī |
nīla-nīradhi kā akelā jana subhaga jalayāna re mana ||
prabala jhaṁjhāvāta meṁ tū ||2||

kamala kaliyā sakucatī hoṁ raśmiyā bhī macalatī hoṁ |
tū tuṣāra kuhā gagana meṁ bana madhupa kī tāna re mana ||
prabala jhaṁjhāvāta meṁ tū ||3||

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मैं एक पत्नी होने के साथ साथ गृहिणी एवं माँ भी हुँ । लिखने का हुनर... ब्लॉग लिखती रहती हु... सनातन ग्रुप एक सकारात्मक ऊर्जा, आत्मनिर्भर बनाने की प्रेरणा देती जीवनी, राष्ट्रभक्ति गीत एवं कविताओं की माला पिरोया है । आग्रह :आपको पसन्द आये तो ऊर्जा देने के लिए शेयर एवं अपने सुझाव दीजिए ।

शालू सिंह

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