रुद्रयामल तंत्र पटल १८ Rudrayamal Tantra Patal 18

रुद्रयामल तंत्र पटल १८ में भगवती के कामचक्र का वर्णन है जिसमें वर्णो से किए गए प्रश्न का निर्णय प्रतिपादित है । आज्ञाचक्र के मध्यभाग में करोड़ों रस वाली नाडियों के मध्य में मनोरम कामचक्र की स्थिति है । इनके कोष्ठकों में वर्णो के स्थापन से होने वाले फल का निर्देश है। सभी चक्रों में यह अत्यन्त उत्तम कामचक्र है। काम्य फल के कारण इससे उत्तम सिद्धि प्राप्त होती है। विभिन्न वर्णो में किए गए प्रश्नों में वर्ण भेद से फल का कथन हे । जैसे-कवर्ग से प्रश्न करने पर कामसम्पत्ति एवं श्री समृद्धि प्राप्त होती है। इस प्रकार वर्ग के अनुसार शुभ मंत्र ग्रहण करने से साधक को सिद्धि प्राप्त होती है ।

|| रुद्रयामल तंत्र अष्टादशः पटलः – कामचक्रफलोद्‍भवम् ||

कामचक्रसारसंकेते चतुर्वेदोल्लासः

तंत्र शास्त्ररूद्रयामल

कामचक्रफल

आनन्दभैरवी उवाच

श्रृणु नाथ प्रवक्ष्यामि असाध्यसाधनं परम् ।

कामचक्रस्य वर्णानां वर्णनं प्रश्ननिर्ण्यम् ॥१॥

आनन्द भैरवी ने कहा — हे नाथ ! अब मैं परम असाध्य के साधनभूत कामचक्र पर स्थित वर्णों का वर्णन तथा प्रश्न के विषय में निर्णय कहती हूँ उसे सुनिए ॥१॥

आज्ञाचक्रमध्यभागे नाडीकोटिरसालिनी ।

तन्मध्ये भावेयेन्मन्त्री कामचक्रं मनोरमम् ॥२॥

कामचक्रे च पूर्वोक्तवर्णमालोक्य साधकः ।

न्यासमन्त्रे पुटीकृत्य जपित्वा योगिराड्‌ भवेत् ॥३॥

एको मन्दिरमध्यस्थो मन्त्रमाश्रित्य यत्नतः ।

निजनामाक्षरं तत्र तत्कोष्ठनुमाश्रयेत् ॥४॥

आज्ञाचक्र के मध्य में करोड़ों सरस नाड़ियाँ प्रवाहित हैं, मन्त्रज्ञ साधक उसके मध्य में अत्यन्त मनोहर कामचक्र का ध्यान करे । उस कामचक्र में साधक पूर्व में कहे गए वर्णों को देखकर न्यास मन्त्र में उसका सम्पुट कर जप करे तो वह योगिराज बन जाता है । साधक अकेले किसी मन्दिर के मध्य में स्थित होकर यत्नपूर्वक मन्त्र का आश्रय लेकर उस वर्ण के कोष्ठक में अपने नाम मे अक्षरों को देखे ॥२ – ४॥

आनन्दभैरव उवाच

एतेषां कोष्ठसंस्थानां वर्णानां हि फलाफलम् ।

वद कान्ते रहस्यं मे कामचक्रफलोद्‌भवम् ॥५॥

आनन्दभैरव ने कहा — हे कान्ते ! कोष्ठ में स्थित रहने वाले उन वर्णों के फलाफल को तथा कामचक्र के फल से उत्पन्न उस रहस्य को भी कहिए ॥५॥

आनन्दभैरवी उवाच

कामचक्रं कालरुपं ततो वाराणसीपुरम् ।

तत्र सर्वपीठचक्रं चक्राणामुत्तमोत्तमम् ॥६॥

आनन्दभैरवी ने कहा — यह कामच्रक काल ( राशि नक्षत्रादि ) का स्वरुप है । उसके बाद वाराणसीपुर है, वहीं पर सभी चक्रों में उत्तमोत्तम ՙसर्वपीठचक्र’ है ॥६॥

एतच्चक्रप्रसादेन ते पादाम्बुजदर्शनम् ।

प्राप्नोति साधकान् सत्यं सर्वं जानति साधकः ॥७॥

कामनासिद्धयर्थं मन्त्रार्थादिविचारनाम् ।

वृद्धमस्तमिंत त्यक्त्या गृहणीयान्मन्त्रमुत्तमम् ॥८॥

इसी चक्र ( वाराणसीस्थ सर्वपीठचक्र ) की कृपा होने पर, हे सदाशिव ! साधकों को आपके चरणकमलों का दर्शन होता है, वह बहुत से साधकों को भी प्राप्त करता है, किं बहुना, साधक सब कुछ सत्य जान लेता है । मन्त्र द्वारा अपनी कामना की फलसिद्धि के लिए मन्त्र के अर्थ आदि का विचार करना चाहिए । अतः कोष्ठ में वृद्ध तथा अस्तमित भावों को छोड़कर उत्तम मन्त्र का ग्रहण करना चाहिए ॥७ – ८॥

(आनन्दभैरवी उवाच)

श्रृणु वर्णफलं नाथ असाध्यप्रश्ननिर्णयम् ।

वर्णानाञ्च नाथ राशिभेदेन संश्रृणु प्रभो ॥९॥

हे नाथ ! अब वर्णफलों को तथा असाध्य प्रश्नों के निर्णय को सुनिए । हे प्रभो ! सर्वप्रथम राशिभेद से उन वर्णों का फल कहती हूँ उसे सुनिए ॥९॥

बाल्यदिषु स्थितात् वर्गान् आश्रयेत् साधकोत्तमः ।

वर्जयेद्‍ वृद्धभावञ्च तथास्तमितमेव च ॥१०॥

आश्रयेद्‍ राशिभावेन बाल्यकैशोरयौवनाम् ।

अथ बाल्यं वर्गभेदं विचारे वामयोगतः ॥११॥

मन्त्राणाञ्चापि गणयेत् प्रश्नकर्माणि दक्षिणात् ।

मध्यकोणावधिं नाथ गणनीयं विचक्षणैः ॥१२॥

ऊद्‌र्ध्वदक्षिणयोगेन गणयेत् प्रश्नकर्मणि ।

वामयोगेन गणयेद्‍ मन्त्रादीनां विचारणे ॥१३॥

बाल्य, कैशोर तथा युवाभाव में आश्रित वर्ण मन्त्रों को साधकोत्तम ग्रहण करे । किन्तु वृद्धभाव को तथा अस्तमित भाव को प्राप्त मन्त्राक्षरों का त्याग कर देवे । राशि के भेद से बाल्य, कैशोर और युवा वर्ण वाले अक्षरों को ग्रहण करे और अपने बाल्यादिवर्ग भेद का विचार करते समय बायें से गणना करे । मन्त्रों के प्रश्न कर्म में दक्षिण से गणना करनी चाहिए । हे नाथ ! विद्वान पुरुष को यह गणना मध्यकोण को अवधि बनाकर करनी चाहिए । प्रश्न कर्म में ऊदर्ध्वस्थ की दक्षिण के योग के द्वारा गणना करनी चाहिए । किन्तु मन्त्र आदि के विचार में बायें के योग से गणना करनी चाहिए ॥१० – १३॥

श्रृणु तद्‌वर्गवर्गाणाम फलमत्यन्तसुन्दरम् ।

वदामि परमान्दरससिन्धुमधुव्रतः(त) ॥१४॥

अब हे परमानन्द सिन्धु मधुव्रत ! वर्ग कु आदि अर्थात् क वर्ग ( क ख ) आदि के अत्यन्त सुन्दर फलों को मैं कहती हूँ उसे सुनिए ॥१४॥

रुद्रयामल तंत्र पटल १८

रुद्रयामल तंत्र अष्टादश पटल – वर्णदेवता स्वरुपकथन

कवर्गं कामाख्याभवनमणिपीठे त्रिजगतां

धरित्री सा धात्री वसति सततं सिद्धिनवके ।

हुताशेष्वाकोशे जलदतनुसाकाशजननी

गभीरा खड्‌गाभा करहर (भयवर) करा घोरमुखरां ॥१५॥

क वर्ग के क वर्ण के देवता और फल — क वर्ग कामाख्या हैं, जो मन्दिर के मणि पीठ पर स्थित हैं, वही तीनों जगत् को धारण करने वाली तथा धात्री (पालन करने वाली) हैं, सर्वदा नवसिद्धि में अग्नि में निवास करती हैं । जलद के समान शरीर वाली वही आकाश की जननी हैं और गम्भीर तथा खड्‍ग के समान आभा वाली हैं । हाथ में अभय तथा वर मुद्रा धारण की हैं और घोर तथा मुखर हैं ॥१५॥

अभ्यासयोगात् कलिकालपावनीं कालीं कुलानन्दमयीं रमेशीम् ।

महारसोल्लाससुवक्त्रलोचनां कामेश्वरीं कूर्मपदं(दां) भजेज्जयी ॥१६॥

निरन्तर अभ्यास के योग से वह कलिकाल में पवित्र करने वाली हैं, काली कुल में आनन्द देने वाली रमेशी हैं, महारस के उल्लास में उनके मुख और नेत्र अत्यन्त सुन्दर दिखाई पड़ते हैं, ऐसी कामेश्वरी तथा कूर्मपद का भजन करने वाले को जय की प्राप्ति होती है ॥१६॥

कालागुरोरुत्तमसिद्धसेविता मनोहरा खेचरसारशाखिनी ।

उल्कासमग्रा भवदीपवृत्तिस्तेज(:)(प्र) कूटामलनीलदेहा ॥१७॥

जो उत्तम सिद्धों से काला अगुरु के द्वारा सेवित हैं, अत्यन्त मनोहर तथा खेचर सार की शाखिनी (वृक्षस्वरुपा) हैं समग्र उल्का स्वरुपा हैं । संसार की दीपक, तेजों का समूह तथा अमल नीलवर्ण युक्त शरीर धारण करने वाली (नीलसरस्वती) हैं ॥१७॥

खड्‌गायुधा खर्परधारिणी सा चण्डोद्‌गमा वायुपथस्थ खेचरी ।

विद्याभयाखञ्जनलोचना गतिः क्षितिक्षये खेचरवर्गधारिणी ॥१८॥

ख वर्ण का स्वरुप तथा देवता — वही खड्‍ग आयुध वाली एवं खप्पर धारण करने वाली हैं जो ऊपर प्रचण्ड रुप से चलने वाली तथा वायुमार्ग में खेचरी हैं, विद्या तथा अभय से युक्त है खञ्जन के समान नेत्र वाली, समस्त प्राणियों की गति तथा क्षिति के क्षय हो जाने पर खेचर वर्गों को धारण करती हैं ॥१८॥

खारी विहारी खलखेलनेन खराखरोन्मत्तगतिप्रिया खगा ।

महाखगारुपखलस्थिता सदा प्रपाति विद्याबलविक्रमस्थिता ॥१९॥

व्यापारनिद्रागहनार्थचिन्ताखरप्रभाभाति यदा यदा ॥२०॥

जो परिमाण में खारी (द्रोण) हैं, खलों के साथ खेल में विहार करने वाली हैं, खरा (कठोर) तथा खरों के समान उन्मत्तगति जिन्हें प्रिय है, जो खगा (आकाशाचारी) हैं, सदैव महाखगरुप तथा खल में स्थित रहने वाली हैं तथा विद्या, बल एवं विक्रम में स्थित रह कर जगत् की रक्षा करती है । व्यापार, निद्रा, गहन अर्थों में चिन्ता तथा खर (तीक्ष्ण) प्रभा हैं वे जहाँ-तहाँ सर्वत्र शोभित हैं ॥१९ – २०॥

गायत्री गणनायिका मतिगतिग्लनिरगूढाशया

गीता गोकुलकामिनी गुरुतरा गार्ह्यग्निजेयोदया ।

गोरुपा गयहा गया गुणवर्ता गाथापथस्थयिनी

श्रीगुर्वी प्रतिपालनं त्रिजगतां गायन्ति यां तां भजेत् ॥२१॥

ग वर्ण के देवता — जो गायत्री गणनायिका मति, गति तथा ग्लानि हैं, जिनका आशय अत्यन्त गूढ़ है, गीता तथा गोकुल कामिनी हैं, गुरुतरा हैं, गृह की अग्नि वाली एवं उदया हैं, गोरुपा, गय नामक राक्षस का हनन करने वाली, गया स्वरुपा, गुणवती एवं गाथापथ में स्थित रहने वाली हैं । श्री गुर्वी हैं, तीनों जगत् का पालन करने वाली हैं, लोग जिनका गान करते हैं ऐसी ग स्वरुपा भगवती का भक्तों को भजन करना चाहिए ॥२१॥

वायोर्घर्मकरानन्दमोहिनी घर्घरा घना ।

निद्रामाध्याति घटना नीला घोटकवाहिनी ॥२२॥

घ वर्ण विचार — जो वायु से घाम करने वाली, आनन्द को भी मोहित करने वाली घर्घरा एवं घन स्वरुपा हैं, निद्रा देने वाली घटना, नीला तथा घोटक के ऊपर सवार रहने वाली हैं उनका भजन करना चाहिए ॥२२॥

बिन्दुस्था विषभोजनानलकथा बीजश्रमायोप्रिया ।

पञ्चाढ्यामनुनासिका सुखमयी वेदक्रिया षण्मुखी ॥२३॥

ङ वर्ण के देवता — बिन्दु में स्थित रहने वाली, विष का भोजन करने वाली अग्नि के समान तेजस्विनी, बीज के लिए श्रम करने वाली तथा तीक्ष्ण लोहे के शस्त्रों से प्रेम करने वाली, पाँच से पूर्ण, नासिका से उच्चरित होने वाली, सुखमयी, वेदक्रिया तथा छः मुखों वाली ऐसी ङकार की देवता है ॥२३॥

विचित्रवस्त्राचरणाब्जचालनम् ।

विचारचेष्टां मयि देहि चञ्चले ॥२४॥

इति वर्णं चवर्गस्य महापातकनाशनम् ।

कामचक्रे स्थितं यद्यत् प्रश्ने मन्त्रगृहे यथा ॥२५॥

चवर्गफलमत्यन्तनिष्कर्षं सूक्ष्मभावनम् ।

धिया सर्वाक्षरश्रेणीं भावयन्ति पुनः पुनः ॥२६॥

च वर्ण के देवता — हे चञ्चल ! आप विचित्र वस्त्रों वाली, अपने चरणकमलों से जगत् को चलाने वाली हैं मुझ में विचार कि चेष्टा प्रदान कीजिए । चवर्ग वर्ण का यही माहात्म्य है कि वह महापातकों का नाशकर देता है यह कामचक्र में स्थित है, यही च प्रश्न में उस प्रकार से स्थित है, जैसे मन्त्र गृह में रहता है । च वर्ग का फल अत्यन्त सारयुक्त है, सूक्ष्म भावना वाला है, साधक लोग सभी अक्षरों की श्रेणी में बारम्बार इसका ध्यान करते हैं ॥२४ – २६॥

सर्वं जानाति शम्भो त्वं परं कि कथयामि ते ।

तथापि वर्गमाहात्म्यं कामचक्रस्थनिर्मलम् ॥२७॥

हे शम्भो ! आप तो सब जानने वाले हैं, फिर मैं और आप से क्या कह सकती हूँ, कामचक्र में स्थित रहने वाले अत्यन्त निर्मल वर्गों का माहात्म्य इस प्रकार है ॥२७॥

यो जानाति कामचक्रं यमो हन्ति न तं जनम् ।

तत्प्रकारं भावयुक्तं भावनाध्याननिर्मलम् ॥२८॥

जो कामचक्र को जानता है, उस मनुष्य को यमराज नहीं मारते, उसके जानने का प्रकार यही है कि भाव युक्त होकर भावना तथा निर्मल ध्यान करे ॥२८॥

ध्यात्वा कामरुपस्था मूलाधारनिवासिनः ।

देवताः पार्थिवाः सर्वे आत्मानं परमेष्ठिनः ॥२९॥

पूर्वकाल में सभी राजाओं ने मूलाधार स्थित तथा कामरुप स्थित देवताओं का ध्यान कर अपने को परमेष्ठी में मिला दिया ॥२९॥

न जानन्ति बालका मे तेषां योगादिसिद्धये ।

कामचक्रं कामरुपं कामनाफलसिद्धिदम् ॥३०॥

तन्मन्त्रग्रहणादेव साक्षादीशो भवेन्नरः ।

श्रुतिशास्त्राणि सर्वाणि करे तस्य न संशयः ॥३१॥

योगशिक्षादिकं सर्वं जानाति कामचक्रतः ।

कामचक्रप्रसादेन कामरुपी भवेद्‍ ध्रुवम् ॥३२॥

मेरे बालक (भक्त गण) कुछ भी नहीं जानते हैं । उनके योगादि सिद्धि के लिए कामनाफल की सिद्धि देने वाला यह कामरुप कामचक्र है । मात्र उस कामचक्र के ज्ञान से मनुष्य ईश्वर स्वरुप हो जाता है । उसके हाथ में समस्त श्रुतियाँ तथा समस्त शास्त्र आ जाते हैं इसमें संशय नहीं । कामचक्र से साधक योग तथा शिक्षादि सभी जान लेता है । निश्चय ही कामचक्र की कृपा होने पर साधक कामरुपी (इच्छानुसार रुप धारण करने वाला) हो जाता है ॥३० – ३२॥

तद्वर्नस्थं तदन्तःस्थं दशकोणस्थमेव च ।

अष्टदलस्थं तत्रापि विचार्य साधकोत्तमः ॥३३॥

अनुलोमविलोमेन शास्त्रस्यानुक्रमेण च ।

बाल्यं कैशोरमुल्लासं वृद्धिः सिद्धिश्च यौवने ॥३४॥

उस कामचक्र के वर्गों मे स्थित उसके भीतर स्थित, दशकोण स्थित, अष्टदल पर स्थित (बाल्य कैशोरादि) भावों की गणना साधकोत्तम शास्त्रीय पद्धति के अनुसार अनुलोम विलोम क्रम से (दाहिने बायें, सीधे उल्टे) विचार करके करे । बाल कैशोरादि भाव उल्लास प्रदान करते हैं, युवाभाव वृद्धि और सिद्धि प्रदान करता है ।३३ – ३४॥

वृद्धो वृद्धत्वमाप्नोति अस्ते च निधनं भवेत् ।

नवग्रहास्तत्र मध्ये पञ्चप्राणाश्च सन्ति वै ॥३५॥

अनुलोमविलोमेन गणयेद्‌दशकोणके ।

दशकोणे सर्वसिद्धरष्टसिद्धिश्च तत्र वै ॥३६॥

वृद्ध भाव से वृद्धता प्राप्त होती है तथा अस्तमित भाव से साधक मृत्यु प्राप्त करता है, उसके मध्य में नवों ग्रह तथा पाँचों प्राण भी हैं वहीं दशकोण में सर्वसिद्धियाँ तथा अष्टसिद्धियाँ भी हैं ॥३५ – ३६॥

अष्टपत्रे प्रशंसन्ति अधोऽनन्तमध्ये गृहे ।

ब्राह्ममूर्ध्वगेहे च मन्त्रवर्नांश्च तत्तु तान् ॥३७॥

अष्टपत्र के अधोभाग में, अनन्त के मध्य गृह में तथा उसके ऊपर वाले गृह में उन-उन मन्त्र वर्णों का पड़ना प्रशंसास्पद है ॥३७॥

समाश्रित्य जपेद्वद्यां सूरयः क्रमरुपिणीम् ।

ह्रस्वदेवीं ह्रस्वबुद्धिं ददाति साधकाय च ॥३८॥

विद्वान् लोगों को क्रमस्वरुपा इस विद्या का आश्रय लेकर जप करना चाहिए । ह्रस्व देवी अपने साधक को ह्रस्व बुद्धि देती है ॥३८॥

यदि क्रोधपरा विद्या भक्षयेत् साधकं लघु ।

अतः समवयोरुपां देवतामष्टसिद्धिदाम् ॥३९॥

यदि विद्या क्रोध में रहने वाली है तो साधक का शीघ्र ही भक्षण कर जाती है, अतः अपने समान वय रुप वाले देवता का पूजन करे क्योंकि वह इष्टसिद्धि प्रदान करते हैं ॥३९॥

देवो भूत्वा यजेद्‌देवं तदा मोक्षं समाप्नुयात् ।

यदि वर्णं न जानति कौलपुत्रोऽप्यधो व्रजेत् ॥४०॥

स्वयं देवता बन कर ही देवता का यजन पुजन करना चाहिए, तभी साधक को मोक्ष प्राप्ति होती है । यदि वर्णों का ज्ञान नहीं है तो साधक कौल पुत्र (शक्ति का उपासक) होकर भी नीचे गिर जाता है ॥४०॥

डाकिनी तं भक्षयति दीक्षामन्त्रार्णहीनकम् ।

ततो वर्णविचारञ्च प्रवक्ष्यामि समासतः ॥४१॥

दीक्षा मन्त्र के वर्ण से रहित साधक को डाकिनी खा जाती है । हे शिव ! इसलिए मन्त्र के वर्ण का विचार संक्षेप में कहती हूँ ॥४१॥

चापान् धृत्वा नरेन्द्रस्तमपि मनुजकं पालयन्तीह लोके

सर्व चन्द्रो विघातं प्रचुरमयभयं भास्करो हन्ति शोकान् ।

चातुर्थ्या चक्रपाणेः पदमपि चपला सन्ददातीह माया

योगोद्योगी चरुगतमनसा साधकायाऽऽशु योगम् ॥४२॥

च वर्ण विचार — इस लोक में (चवर्गोपासक) मनुष्य की राजा स्वयं बाण लेकर पालन करते हैं । चन्द्रमा प्रचुरता युक्त उसके भय को विनष्ट करते हैं । भास्कर शोक दूर करते हैं । चौथी चपला माया उसे चक्रपाणि विष्णु का पद देती है । किं बुहना, योग में तत्पर योगी हूयमान अन्न वाले मन से उस साधक को शीघ्र ही योग प्रदान करते हैं ॥४२॥

छत्राशा कमले स्थिता स्थितिलये वाञ्छाफलश्रीधरा

छायामण्डपमध्यगाच्छागाच्छलगता छत्रञ्छटा तेजसा ।

त्रैलोक्यं प्रतिपाति पाशुपतिभिः क्षेत्राधिपैः श्रीधरैः

प्राणप्रेमविहारिणी भगवतीच्छत्रेण तं साधकम् ॥४३॥

छ वर्ण विचार — छः की देवता छत्रशा कमल पर स्थित हैं । वे स्थिति तथा लय में वाञ्छाफल की श्री धारण करने वाली हैं, छाया मण्डप के मध्य में गमन करती है, छल करने वाली हैं, अपने तेज से छत्र की छ्टा से युक्त है, वे पाशुपतियों तथा श्री धारण करने वाले क्षेत्राधिपों के साथ त्रैलोक्य का पालन करती हैं, ऐसी प्राणों में प्रेम पूर्वक विहार करने वाली भगवती उस छकारोपासक साधक की अपने छत्र से रक्षा करें॥४३॥

जातिख्यातिरनुत्तमा प्रभवति प्रीतायमाभ्यासतां

जीवानामतिदुःखराशिहननात् एकार्थसञ्चारिणी ।

वज्रा जीवनमध्यगा गतिमती विद्या जया यामिनी

जाता जातनिवारिणी जनमनःसंहारचिन्तावतु ॥४४॥

ज वर्ण विचार — जिस जकार का अभ्यास करने वालों की जाति तथा ख्याति सर्वश्रेष्ठ रुप में उत्पन्न हो जाती है, जीवों के अत्यन्त दुःख राशि का हनन करने से एकर्थ सञ्चारिणी जिस पर प्रसन्न रहती हैं ऐसी वज्रा, जीवन मध्यगा, गतिमती, विद्या, जया यामिनी, जाता, जातनिवारिणी संहार चिन्ता स्वरुपा भगवती मनुष्यों के मन की रक्ष करें ॥४४॥

गङा हन्ति हताशुभा धनमुखी कैवल्यमुक्तिप्रदा ।

कृत्वा रक्षति साधकं झरझनत्कारेण सूक्ष्मनिला

कामक्रोधविनाशिनी शशिमुखी झङ्कारशब्दप्रिया ॥४५॥

झ विचार — शीघ्र ही वाद विवाद को विनष्ट कर झर्झरा (झाँझ) के समान शब्द करने वाली जो गङ्गा अपने झं झं शब्द से जन्म मरण के बीजझङ्कार को नष्ट कर देती हैं, अशुभों का हनन कर देती हैं धन प्रदान करने वाली तथा कैवल्य मुक्ति देने वाली हैं सूक्ष्म वायु से परिपूर्ण ऐसी काम क्रोध की विनाशिनी, चन्द्रमुखी, झङ्कार शब्द से प्रेम करने वाली गङ्गा अपने झरझनत्कार शब्द से (झकारोपासक) साधक की रक्षा करती है ॥४५॥

ञकारबीजामलभावसारैः बाणस्य पुञ्चं प्रतिहन्ति योगिनी ।

खड्‌गायुधा सा रसपानमत्ता संहारनिद्राकुलसाधकुःखहा ॥४६॥

ञवर्ण का विचार — जो अकार बीजाधिष्ठात्री योगिनी अकारबीज रुप स्वच्छ भाव सार से बाण से बाण समूहों को नष्ट कर देती हैं, वह खड्‍ग का आयुध धारण करने वाली, रस पान से प्रमत्त संहार निद्रा से आकुल साधुजनों के दुःख को दूर करें ॥४६॥

चन्द्रातपस्निग्धसुकान्त विग्रहा टङ्कास्त्र वज्रास्त्रहतारिपुअङुवाः ।

टिं टि महामन्त्रजपेन सिद्धिदा हन्ति श्रियं कापुरुषस्य पातकम् ॥४७॥

ट वर्ण विचार — चन्द्रमा की चन्द्रकिरण के समान स्निग्ध तथा मनोहर विग्रह वाली अपने टङ्कास्त्र (त्रिशूल) तथा वज्रास्त्र से अरिपुङ्गवों का विनाश करने वाली, टिं टिं इस बीज रुप मन्त्र से सिद्धि देने वाली टकाराधिष्ठातृ देवता दारिद्र पुरुष के पातक का विनाश करती हैं और श्री प्रदान करती हैं ॥४७॥

विशालनेत्रा यदि चारुकाङिं ठं ठं स्वबीजं परिपाति कक्षरी ।

मनोगतं दुःखसमूहमुर्वशी रत्नाकरा सैन्यकुलं निहन्ति ॥४८॥

ठकार वर्ण विचार — ठकार की अधिष्ठातृ देवी विशाल नेत्रों वाली अत्यन्त मनोहर अङ्गो वाली है और ठं ठं अपने इस बीज की रक्षा करती हैं । ऐसी कक्षरी रत्नकरा उर्वशी देवी अपने उपासकों के मन में रहने वाले समस्त दुःख समूहों को तथा शत्रु के सैन्य कुलों को विनष्ट करती हैं ॥४८॥

डामरा जगतामाद्या डं डां डिं डीं स्वरुपिणी ।

कामचक्रे सुखं दत्वा सारयैवं तनोति सा ॥४९॥

ड वर्ण विचार — ड की अधिष्ठात्री जगत् की आदि भूता डामरा हैं । वे डं डां डिं डीं स्वरुपिणी हैं । वे अपने डकारोपासक को सुख प्रदान कर शीघ्रता पूर्वक उसे आगे बढ़ाती हैं ॥४९॥

ढं ढां बीजात्मिका विद्या रत्नमन्दिरसंस्थिता ।

ढक्‌कारी पाशहस्ता च साधक पाति सुन्दरी ॥५०॥

ढ वर्ण विचार — ढ की अधिष्ठातृ देवता ढं ढां बीजात्मिका विद्या हैं, जो रत्न मन्दिर में निवास करती हैं । ऐसी ढक्कारी सुन्दरी अपने हाथ में पाश लेकर ढकारोपासक साधक की रक्षा करती हैं ॥५०॥

णं णां णिं णीं जपति सुजनो जीवनीमध्यसंस्था

अष्टश्वैर्या प्रभवति ह्रदि क्षोभपुञ्जापहाय ।

वाराणस्यां सकलभयहा सन्ददातीह लक्ष्मीं

सूक्ष्मात्यन्तानलपथमुखीं कालजालं निहन्ति ॥५१॥

ण वर्ण विचार — जो सुजन णं णां णिं णीं इस मन्त्र का जप करता है उसके हृदय में समस्त क्षोभ पुञ्जों को विनष्ट करण की अधिष्ठात्री जीवनी मध्यसंस्था अष्टैश्वर्या देवी स्वयं उत्पन्न हो जाती हैं । वह वाराणसी में समस्त भया को विनष्ट करने वाली हैं और अपने साधक (णकारोपासक) को लक्ष्मी प्रदान करती हैं । वह सूक्ष्मा हैं । जाज्वल्यमान अग्नि के समान प्रदीप्त मुख वाली हैं तथा काल के जाल को नष्ट कर देती हैं ॥५१॥

तारारुपा तरुस्था त्रिनयन कुटिला तारकाख्या

निहन्त्री तन्वश्रेणी तरुवरकलात्राणहेतोरतीता ।

तालक्षेत्रा तडिदिव कलाकोटिसूर्यप्रकाशा

तोकादीनां बहलतरुणी तारकं पाति भक्तम् ॥५२॥

त वर्ण विचार — त की अधिष्ठात्री तारारुपा तरु पर स्थित रहने वाली, तीन नेत्रों से भयङ्कर, तारका नाम से प्रसिद्ध, संहार करने वाली, तन्त्र की श्रेणी (पंक्ति) के त्राण के लिये वर्तमान रहने वाली, तरुवर की काल, मन कर्म और वाणी से अगम्या, तालों के क्षेत्र में निवास करने वाली, बिजली के समान कलाओं से युक्त, करोड़ों सूर्य के समान दीप्तिमती, कन्या पुत्रादि सन्तानों के संरक्षण के लिए अत्यन्त तरुणी स्वरुपा ऐसी तकाराधिष्टातृ देवता तारा अपने तारक मन्त्रों के जप करने वाले भक्त की रक्षा करती हैं ॥५२॥

कालक्रमेणैव विमुक्तिदायिनी मनोरमा नीरजनेत्र कोमला

स्थिता क्ष (थ) कारक्षरमालिनीस्थला प्रपाति मुख्यं वरसाधकं शिवा ॥५३॥

थ वर्ण विचार — थकाराधिष्ठातृ देवी भी कालक्रम से विमुक्ति देने वाली हैं । अत्यन्त मनोहर तथा नीले कमल के समान कोमल नेत्र वाली है । सर्वदा स्थित रहने वाली, थकार रुप अक्षरों की माला धारण करने वाली, स्थल (पृथ्वी) स्वरुपा शिवा अपने मुख्य वार साधका (थकारोपासक) की रक्षा करती हैं ॥५३॥

दाली दरिद्रातिनिकृष्टदुःखहा दान्तप्रिया दैत्यविदारिणी दहा ।

दानस्थलस्था दयिता जतत्पतेर्दयाम ददाति द्रवदेवदारा ॥५४॥

द वर्ण विचार — द की अधिष्ठात्री देवी दाली (दलन करने वाली) हैं । दरिद्रता तथा अत्यन्त निकृष्ट दुःख की हन्त्री हैं, दान्त (उदार पुरुषों) पर प्रेम करने वाली, दैत्य विदारिणी तथा दहन करने वाली हैं, दान स्थल में निवास करने वाली तथा जगत्पति की दयिता हैं । दकाराधिष्ठात्री ऐसी द्रवित होने वाली देवधरा अपने (दकारोपासकों) को दया प्रदान करती हैं ॥५४॥

धात्री धराधारणतत्परा धनी धनप्रद धर्मगतिर्धरित्री ।

दधार धीरं धनबीजमालिनी ध्यानस्थिता धर्मनिरुपणाय ॥५५॥

ध वर्ण विचार — धकाराधिष्ठात्री धात्री, धरा स्वरुपा, जगत् के धारण में तत्परा धनी, धनप्रदा, धर्म की एकमात्र गति तथा धरित्री स्वरुपा है । धन बीज की माला धारण करने वाली वे धीरों को धारण करती हैं किं बहुना धर्म के निरुपण के लिए ध्यान में स्थित रहती है ॥५५॥

नन्दस्य प्रतिपालनाय जगतामानन्दुपुञ्जोदया

योगिन्यो नयनाम्बुजोज्ज्वलशिखाशोभा प्रमालाक्षरा ।

नीता नावपथस्थिता मतिमती याः पालयन्तीह ताः

पान्तु श्रीमुखतेजसा खलु यथा कालक्रमात् साधकम् ॥५६॥

न वर्ण विचार — जिस नकाराधिष्ठात्री देवी का उदय नन्द के प्रति पालन के लिए जगत् के आनन्दपुञ्ज के रुप में हुआ है, जो योगिनी के नयनाम्बुज के लिए उज्ज्वल शिखा है, शोभा की माला धारण करने वाली तथा अक्षरा हैं, विनीत एवं नाव पथ में स्थित रहने वाली तथा मति सम्पन्ना हैं, ऐसी भगवती जिनका पालन करती हैं उनकी रक्षा भी अपने श्री मुख तेज से इस प्रकार करें जिस प्रकार कालक्रम से अपने साधक (नकारोपासक) की रक्षा करती हैं॥५६॥

पीता प्रेमविलासिनी वरपथाज्ञानाश्रया पालनात्

पूज्या पायसपा परापरपदा पीताम्बरा पोषणा ।

प्रौढा प्रेमवती पुराणकथना पायात् पुरा पावनी

या कामेश्वरपावनं परजनं श्री साधकं प्रस्थिता ॥५७॥

प वर्ण विचार — जो पकाराधिष्ठात्री देवी प्रसन्न रहने वाली, प्रेम में विलास करने वाली हैं, श्रेष्ठ मार्ग वाले ज्ञान का आश्रय करने वाली तथा पालन करने के कारण पूज्य हैं, पायस का पान करने वाली पर तथा अपर को देने वाली हैं । पीत वस्त्र धारण करने वाली, सबका पोषण करने वाली, पौढ़ा, प्रेमवती तथा पुराण का कथन करने वाली हैं, अतीत काल से वर्तमान रहने वाली, पावन करने वाली तथा प्रकर्ष रुप से स्थिति करने वाली हैं ऐसी वह जिसने कामेश्वर को पवित्र किया था अपने अनुत्तमजन श्री साधक की भी रक्षा करें ॥५७॥

फुत्फणिवरमाला फेरवी फेरुरुपा

फणधरमुखकुल्याम्भोजवाक्यामृताब्धौ ।

निरवधिहरिकण्ठे वाक्यरुपा फलस्था

फलगतफणिचूडा पातु फुल्लारविन्दे ॥५८॥

फ कार वर्ण विचार — जो फकाराधिष्ठात्री फुत्कार करने वाले सर्प की श्रेष्ठ माला धारण करने वाली श्रृगाली तथा श्रृगाल रुप धारण करने वाली हैं, अनन्त के मुख कुल्या में विकसित कमल रुपी वाक्य के अमृत समुद्र के समान अपार श्रीविष्णु के कण्ठ में वाक्य स्वरुपा एवं फल में स्थित रहने वाली, फलगता (प्रग्रह के समान लटकते) फणि को अपने चूडा़ में धारण करने वाली हैं वहा फुल्लारविन्द में अपने फकारोपासक साधक की रक्षा करें ॥५८॥

वज्राख्यां वशकारिणीं यदि जपेत् श्रीपादसंसेवनात्

बाल्यं वेदविनिर्गतां भगवतीं श्रीरामदेवोर्व्वराम् ।

वश्या तस्य कराम्बुजे वसति सा वीरासनः स्था वशा

वक्त्राम्भोरुह कोमले भगवती भूतेश्वरी भूतगा ॥५९॥

बकार भकार वर्ण विचार — बकार की अधिष्ठात्री बज्रनाम से पुकारी जाने वाली, सबको वश में करने वाली, वेद से निकली हुई श्री रामदेव को उत्पन्न करने वाली, ऐसी भगवती का जो साधक बाल्यावस्था में जप करता है तो उस श्री पाद के संसेवन के प्रभाव से उसके कर कमल में वीरासन से स्थित रहने वाली वशा नाम वाली भगवती वश्य हो जाती हैं। किं बहुना भूतगा भूतेश्वरी भगवती उसके कोमल मुख कमल में निवास करती हैं ॥५९॥

माता मन्दिरमालिनी मतिमतामानन्दमालामला

मिथ्यामैथुनमोहिनी मनसि या(जा)मि(मे)महन्मेलनी ।

मानी तं वदते महेश्वरमहित्व तस्य वक्षःस्थले

स्थित्वा सा मरणं निहन्ति सहसा मौनावलम्बी भवेत् ॥६०॥

म वर्ण विचार — म की अधिष्ठात्री माता मन्दिर माला में निवास करने वाली बुद्धिमानों की आनन्द माला तथा अमला हैं । मिथ्या तथा मैथुन से मोहित करने वाली हैं मन से उत्पन्न काम स्वरुपा हैं, मेला स्वरुपा महान् लोगों को मिलाने वाली हैं, जो मानी उस मकार को महेश्वर की महनीयता कहते है उसके वक्षःस्थल पर स्थित हो कर वह मकारधिष्ठात्री उसके मृत्यु को मार डालती हैं और वह सहसा मौन का आलम्बन ग्रहण करता है ॥६०॥

यातप्रिया या प्रतिभाति योगिनी

यामास्थिता योगमुखास्पदा यथा ।

योनिस्थले सा यतिसाधकं

यशोयात्रा सदा पाति यमादिकं दहेत् ॥६१॥

य वर्ण विचार — जो यतियों से प्रेम करने वाली यकाराधिष्ठात्री योगिनी हैं जो यामा (रात्रि दिन के अष्टम भाग) में स्थित रहने वाली अथवा रात्रि स्वरुपा हैं वह जिस प्रकार योनि स्थल की मुख्य आस्पदा हैं उसी प्रकार योग की भी मुख्य आस्पदा हैं, यशः स्वरुपा तथा प्रव्रज्या स्वरुपा हैं, वह अपने यति साधक की सदैव रक्षा करती हैं और उसके यम (मुत्यु) को नष्ट कर देती हैं ॥६१॥

रत्नस्था रतिराजिता रणमुखे राज्ञः प्रियभीतिहा

रुक्ष्मा(क्या) लङ्‌कृतरडिणी रसवती रागापहा रोगहा ।

राजेन्द्रं रजनीस्थे प्रकुपिता राधामृता पाति तं

स्वाहारुपमनोरमा सुरमणी रामा रकारक्षरी ॥६२॥

र वर्ण विचार — र वर्ण की अधिष्ठात्री रत्नों में रहने वाली रति से शोभित होने वाली युद्धस्थल में राजाओं की प्रिय तथा भीति (भय) का हरण करने वाली हैं, सुर्वण के अलङ्कार से अलंकृत, नटों के वेशभूषा वाला स्थान रंगशाला में निवास करने वाली हैं । रस से पूर्ण, राग का अपहरण करने वाली तथा रोगों को दूर करने वाली हैं, राधा एवं अमृता हैं । राजेन्द्र की रक्षा करने वाली तथा रजनी (अन्धकार) या अज्ञान में रहने वाले पर कोप करती हैं । स्वाहा का स्वरुप, मनोरमा सुरमणी है ऐसी रकाराक्षर वाली रामा अपने उपासक की रक्षा करे॥६२॥

लक्ष्मीर्लाङलिलक्षणा सुललना लोलामला निर्भया

बालामूलमिवासतां लवनाकुला सिन्धूल्लासलीलाकुला ।

लोलाकोलकुलान्न जानलमुखी लग्नालघूराकुला

कौलार्काकुल लोचना लयकरी लीलालयं पाति माम् ॥६३॥

ल वर्ण का स्वरुप – जो लकाराधिष्ठात्री लक्ष्मी हैं लाङ्गलि (हल) लक्षण वाली हैं । सुललना, लोला, अमला (विमला) तथा निर्भया है, बाला हैं, असतों (दुष्टों) का अमूलीकरण करने वाली हैं, लावण्य युक्त तथा समुद्र के उल्लास के समान लीला से आकुल हैं । लोला, कोलकुलान्नजा, अनलमुखी लग्ना, लघू तथा आकुला हैं । कौल मार्ग की सूर्य स्वरुपा, आकुल नेत्रों वाली, लयकरी हैं – ऐसी भगवती लीला के आलयभूत मेरी रक्षा करती हैं ॥६३॥

विषासवस्थानरणस्थवासना

वश्यावहन्ती ललनावशार्थम् ।

सा पाति वीरं यदि तां भजेद्‍ वशी

विषाशनं ते निवसन्ति वारुणीम् ॥६४॥

वकार स्वरुप विचार — जो विष (पारद) के आसव की स्थान, रण स्थल में उत्पन्न वासना वाली, वश्या ललना के वेशभूषा वाले अर्थ (प्रयोजन) वहन करने वाली हैं, वशी वीर ऐसी देवी का भजन करे तो वह उस वीर की रक्षा करती हैं। हे देवि ! आपका विष (पारा) भोजन है, जिसमें वारुणी का निवास है ॥६४॥

शीतां शशीशोक विशेषनाशिनीं

भजेत् सुशीलां स भवेदि‌दवाकरः ।

शिवां शचीं शौचशुभां शवप्रियां

शवस्थितां शीतलदेशशेशोभिताम् ॥६५॥

श वर्ण विचार — शीत, शशी के शोक विशेष का नाश करने वाली ऐसी शकाराधिष्ठात्री शिवा, शची, पवित्रता से कल्याणकारिणी, शव से प्रेम करने वाली, शव में निवास करने वाली, शीतल देश में शोभित होने वाली सुशीला का जो साधक भजन करता है वह सूर्य के समान तेजस्वी हो जाता है ॥६५॥

षट्‌चक्रे षट्‌चक्रे षट्‌पदाषाढी षड्ङुस्था षडानना ।

षट्‌चक्रे सिद्धिदा पाति साधकं षोडशी मुदा ॥६६॥

ष वर्ण विचार — षकार की अधिष्ठात्री षट्‍चक्र में षट्‍पदा है आषाढ़ी (पलाश दण्ड धारण करने वाली ब्रह्म धारिणी) वेद के छः अङ्गों में रहने वाली तथा छः मुखों वाली हैं ऐसी षट्‍चक्र में रहने वाली सिद्धिदा षोडशी देवी प्रसन्नतापूर्वक अपने षकारोपासक साधक की रक्षा करती हैं ॥६६॥

सा मा सूक्ष्म वहति सुजलं सप्तनाकस्थलाढ्या

सारा साक्षात् सुखसमरसोज्ज्वालसाहलादसाम्या ।

साकारा साम्बुजमधुगिरा पूरयन्ती महार्थं

वेदा सौरा सुरमतिनिवहा सामवेदान्तरस्था ॥६७॥

सकार वर्ण विचार — सकार की वही अधिष्ठात्री माँ (लक्ष्मी) हैं, सुन्दर जल धारण करती है, पात, आकाश अथवा स्वर्ग स्थल में निवास करने वाली हैं, वस्तुओं की सार हैं, साक्षात् सुख की समता वाली रस से उत्कृष्ट ज्वाला से आह्लाद सहित, समतायुक्त साकारस्वरुप वाली, कमल में रहने वाली, मधुरता के समान कोमल वाणी वाली, सबके महान् अर्थों को पूर्ण करती हुई, वेद स्वरुपा सूर्य की किरणों के समान देदीप्यमान देवताओं के समान मति वाली सामवेद के अन्तर में निवास करने वाली अपने सकरोपासक की रक्षा करें ॥६७॥

हठात्कारेण सहारा हरति प्राणहं जनम् ।

निहारिणं न सा हन्ति हिरण्याहारमालिनी ॥६८॥

हकार वर्ण विचार — जो हकाराधिष्ठात्री हठ पूर्वक हार (माला) के सहित हो जाती हैं, दुसरे के प्राण लेने वाले जन को मार डालती हैं, किन्तु जो दूसरे के प्राणों की रक्षा करता है उसे वह हिरण्यहार मालिनी नहीं मारती॥६८॥

आलोका लक्षजपदा लाक्षरंल्लक्षणा समा ।

आलग्दानाल सालापा? पाति तं यो भजेल्लघु ॥६९॥

क्षकार वर्ण विचार — जो क्षकाराधिष्ठात्री प्रकाश स्वरुपा हैं, एक लाख जप करने वाले को दान करती हैं, ल अक्षर से युक्त हैं सर्वलक्षण तथा समता वाली कोश हैं आलग्नादानाल सालापा (आलम्लोल्वान इति जीवनन्दपाठः?) है जो शीघ्रता से उनका भजन करता है उसकी वह शीघ्रता से रक्षा करती हैं ॥६९॥

क्षयं क्षितौ याति सुसूक्ष्मभावनं

विहाय मन्त्री क्षयरोगहारिणी

सूक्ष्मातिसूक्ष्मान्यतमं विचिन्तयेत्

क्षोभादिकं पक्षकलाक्षयन्ती ॥७०॥

जो मन्त्री क्षयरोग का हरण करने वाली क्षकाराधिष्ठात्री देवी को छोड़कर सुसूक्ष्मभावना करता है वह इस पृथ्वी में ही विनष्ट हो जाता है अतः सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म सब से अन्यतम क्षकाराधिष्ठात्री की भावना करनी चाहिए, जो क्षोभादि समस्त दोषों को तथा पक्ष की कलाओं को विनष्ट करती हैं ॥७०॥

रुद्रयामल तंत्र पटल १८

अष्टादशः पटलः – षोडशस्वरफलकथनम्

रुद्रयामल तंत्र अट्ठारहवां पटल – षोडशस्वरफलकथन

षोडशस्वरभेदेन फलं श्रृणु महाप्रभो ।

संक्षेपेण प्रवक्तव्यमुत्कृष्टं फलकाङि‌क्षणाम् ॥७१॥

हे महाप्रभो ! अब सोलह स्वर के भेद से वर्णों के फल को सुनिए, उसे मैं उत्कृष्ट फल चाहने वाले अपने भक्तो के लिए संक्षेप में कहती हूँ ॥७१॥

श्लोकत्रयेण(द्वयेन)तत्सर्वं फलमत्यन्तसाधनम् ।

ये कुर्वन्ति महादेव कामचक्रोत्सवं यथा ॥७२।

अत्यन्त साधना से युक्त वह फल मात्र दो तीन श्लोक में ही कहती हूँ । हे महादेव ! जो कामचक्र का उत्सव करते है, यह उन्हीं के समान हैं ॥७२॥

अ आ इ ई उ ऊ ऋ ऋ

आद्याष्टस्वमङुल जपति यः श्रीनाथवक्त्राम्बुजां

प्राप्य श्रीधरनायकः क्षितितले सिद्धो भवेत् तत्क्षणात् ।

राजा राजकुलेश्वरो जयपथे दीपोज्वलामायला

सम्पश्येत् परमां कलां जयति सः कामानलं ताडयेत् ॥७३॥

आदि के आठ स्वर ( अ आ इ ई उ ऊ ऋ ऋॄ ) जो मङ्गल देने वाले हैं उनका जो जप करता है वह श्रीनाथ के मुख कमल में रहने वाली अष्ट स्वराधिष्ठात्री देवी को प्राप्त कर पृथ्वी में सम्पत्तिवानों का नायक बन जाता है । तत्क्षण सिद्धि प्राप्त कर लेता है, राजकुलों का ईश्वर तथा राजा बन जाता है । वह जय के पथ में दीप की उज्ज्वल माला से परमा कला को प्राप्त करता है । किं बहुना कामानल को प्रताड़ित भी करता है ॥७३॥

लृ लृ ए ऐ ओ औ अं अः ।

शेषाष्टौ स्वरपावनी प्रियजनानन्देन मन्दोदरी

मन्त्रं हन्ति मदानना त्रिजगतां साधूत्तमानां सुखम्

दत्त्वा पालयाति प्रभा प्रलयके कौटिल्यविद्यापहा

भक्तये क्षितिपालनं निजजपध्यानाकुलामङुलम् ॥७४॥

शेष आठ स्वर लृ लॄ ए ऐ ओ औ अं अः की अधिष्ठात्री पावन करने वाली हैं । प्रियजनों को आनन्द देने से मन्द उदर वाली हैं । वह मद्य के मुख वाली, मन्त्र को नष्ट कर देती हैं । तीनों जगत् में रहने वाले उत्तम साधुओं को सुख देकर उनका पालन करती हैं, इस प्रकार पृथ्वी का पालन करती हुई जो अपने जप एवं ध्यान में आकुल भक्तों का मङ्गल करती हैं ॥७४॥

इति वर्णफलं ज्ञात्वा गृहणाति मनूत्तमम् ।

स भवेत् कुलयोगार्थी सिद्धज्ञानी महीतले ॥७५॥

इस प्रकार वर्णों के फल को जान कर जो साधक उत्तम मन्त्र ग्रहण करता है वह पृथ्वीतल में कुल योग (शाक्त सम्प्रदाय प्रचलित योग) का अर्थी (याचक) हो जाता है । किं बहुना ऐसा करने से सिद्ध ज्ञानी हो जाता है ॥७५॥

वर्गे वर्गे फलं नाथ श्रृणु वक्ष्यामि अद्‌भुतम् ।

प्रश्नादीनाञ्च कथनं यो जानाति स साधकः ॥७६॥

हे नाथ ! अब प्रत्येक क वर्गादि वर्गों का अद्भुत फल कहती हूँ उसे सुनिए । यह उस साधक के लिए है जो प्रश्नादि के कथन की विधि जानता है ॥७६॥

रुद्रयामल तंत्र पटल १८
रुद्रयामल तंत्र अष्टादश पटल – वर्गे वर्गे फलकथन

कवर्गे कामसम्पत्तिं श्रिया व्याप्तं सुमन्दिरम् ।

प्राप्नोति कामचक्रार्थं राशिनक्षत्रसम्मतम् ॥७७॥

कवर्ग में प्रश्न करने वाला काम सम्पत्ति तथा श्री (लक्ष्मी) से परिपूर्ण सुन्दर एवं धवल गृह प्राप्त करता है । यह कामचक्र में कहा गया अर्थ है और राशि तथा नक्षत्र से भी सम्मत है ॥७७॥

चवर्गे दीर्घजीवी स्यात् दृढसम्पदमेव च ।

वृत्तिं प्राप्नोति गमनादनुदि‌दश्य शरीरिणः ॥७८॥

चवर्ग में प्रश्न करने वाला दीर्घजीवी होता है, पर्याप्त सम्पत्ति प्राप्त करता है, विदेशादि में गमन से उत्तम वृत्ति प्राप्त करता है किसी शरीरधारी का आश्रय लिए बिना वह अपनी यात्रा में अपने परिवार का समाचार प्राप्त करता है, इस प्रकार प्रवास गमन में उसे लाभ प्राप्त होता है ॥७८॥

समाचारं समाप्नोति गमने सर्वमुत्तमम् ।

टवर्गं सम्भवे नाथ महदुच्चाटनादिकम् ॥७९॥

हे नाथ ! टवर्ग में प्रश्न करने पर बहुत बड़ा उच्चाटन प्राप्त करता है, त वर्ग में प्रश्न करने पर पुत्रादि की वृद्धि तथा धन का लाभ होता है ॥७९॥

पुत्राणामपि वृद्धिः स्यात् तवर्गे धनलाभकम् ।

पवर्गे मरणं नाथ यादि-क्षान्ते महागुणी ॥८०॥

हे नाथ ! पवर्ग में प्रश्न करने से मरण की प्राप्ति होती है, य से लेकर क्षान्त वर्णों में प्रश्न करने पर साधक महागुणी हो जाता है ॥८०॥

कामचक्रफलं नाथ राशिदण्डेन योजयेत् ।

निजगेहस्थितं राशिं ज्ञात्वा हि दिनदण्डतः ॥८१॥

गणयित्वाशुभं ज्ञानी अनुलोमविलोमतः ।

घतस्थं सकलं सन्धिकोणस्थं पार्श्वके शुभम् ॥८२॥

शुभमन्त्रं गृहीत्वा तु सिद्धिमाप्नोति साधकः ॥८३॥

हे नाथ ! कामचक्र के फल को राशि तथा दण्ड से युक्त करना चाहिए दिन में दण्ड के अनुसार अपने गेह में स्थित राशि तक ज्ञानी अनुलोम विलोम क्रम से (दायें तथा बायें क्रम) से गणना करे । कुम्भ में रहने वाला सभी सान्धिकोणस्थ, वर्ण तथा पार्श्व में रहने वाले वर्ण ये सभी शुभ कारक है । साधक शुभ मन्त्र के ग्रहण से ही सिद्धि प्राप्त करता है ॥८१ – ८३॥

॥ इति श्रीरुद्रयामले उत्तरतन्त्रे महातन्त्रोद्‌दीपने भावप्रश्नार्थनिर्णये पाशवकल्पे कामचक्रसारसङ्केते सिद्धिमन्त्रप्रकरण चतुर्वेदोल्लासे भैरवभैरवी संवादे अष्टादशः पटलः ॥१८॥

इस प्रकार श्रीरुद्रयामल के उत्तरतंत्र में महातंत्रोद्दीपन के भावप्रश्नार्थनिर्णय में पाशवकल्प में कामचक्रसारसङ्कत सिद्धमन्त्र प्रकरण के चतुर्वेदोल्लास में भैरवी भैरव संवाद में अट्ठारहवें पटल की डॅा० सुधाकर मालवीय कृत हिन्दी व्याख्या पूर्णं हुई ॥ १८ ॥

Leave a Reply