रुद्रयामल तंत्र पटल २४ , Rudrayamal Tantra Patal 24, रुद्रयामल तंत्र चौबीसवाँ पटल

रुद्रयामल तंत्र पटल २४ में बहुत से अन्य आसनों का वर्णन है। पृथ्वी पर सौ लाख हजार आसन कहे गए है। इनमें से कूर्मासन से लेकर वीरासन तक कुछ मुख्य आसन के स्वरूप का वर्णन है। जब तक चित्त स्थिर नहीं होता, तब तक शवासन का साधन साधक को नहीं करना चाहिए (११६-११८)। इसके बाद अष्टाङ्ग योग का महत्त्व वर्णित है (१३२-१४४)। अष्टाङ्ग योग की साधना में आसन से दीर्घं जीवन ओौर यम से ज्ञान एवं ज्ञान से कुलपतित्व प्राप्त होता है। नियम से पूजा में शुद्धता, प्राणायम से प्राणवायु का वश में करना, प्रत्याहार से चित्त में भगवान्‌ के चरण कमल की स्थापना, धारणा से वायुसिद्धि, ध्यान से मोक्ष सुख और समाधि से महाज्ञान प्राप्त होता है। अन्त में स्थिर चित्त में श्रीविद्या का ध्यान कहा गया है ।

रुद्रयामल तंत्र चौबीसवाँ पटल – योगसाधननिरुपण

रुद्रयामल तंत्र चतुर्विंशः पटलः – योगसाधननिरुपणम्

रूद्रयामल तंत्र शास्त्र

योगसाधननिरुपणम्

आनन्दभैरवी उवाच

अथ वक्ष्ये महादेव योगशास्त्रार्थनिर्णयम् ।

येन विज्ञानमात्रेण षट्चक्रग्रन्थिभेदकः ॥१॥

योगसाधननिरुपणम्

पर्व्वातिरिक्तदिवसे कुर्यात श्रीयोगसाधनम् ।

कालिकाकुलसर्वस्व कला कालसमन्वितम् ॥२॥

आनन्दभैरवी ने कहा — हे महादेव ! अब इसके अनन्तर योगशास्त्र के अर्थ का निर्णय कहती हूँ जिसके ज्ञानमात्र से पुरुष षट्‍चक्र का भेदन करने वाला बन जाता है । पर्व के दिनों को छोड़कर श्रीविद्या के योग का साधन करना चाहिए । यह श्रीयोग महाकाल से युक्त कालिका कुल सर्वस्व की कला है ॥१ – २॥

आसनं विधिना ज्ञानं कोटिकोटिक्रियान्वितम् ।

शतलक्षसहस्त्राणि आसनानि महीतले ॥३॥

स्वर्गे पातालमध्ये तु सम्मुक्तानि महर्षिभिः ।

भेदाभेदक्रमेणैव कुर्यान्नित्यं सदासनम् ॥४॥

करोड़ों करोड़ों क्रियाओं से युक्त आसन का ज्ञान विधिपूर्वक करना चाहिए । इस पृथ्वी पर ही सौ लाख हजार आसन कहे गए हैं । जिन्हें महर्षियों ने स्वर्ग में एवं पाताल में किया था । अतः भेदाभेद क्र क्रम से उन अच्छे अच्छे आसनों को सर्वदा करना चाहिए ॥३ – ४॥

तत्प्रकारं च विविधं तत्कृत्वा सोऽमरो भवेत् ।

अमरः सिद्ध इत्याहुरष्टैश्वर्यसमन्वितम् ॥५॥

प्रतिभाति स एवार्थो मूलमन्त्रार्थवेदिनः ।

अमरास्ते प्रशंसन्ति सर्वलोकनिरन्तरम् ॥६॥

अष्टैश्वर्य समन्वित उस आसन के अनेक प्रकार हैं, जिन्हें करने पर साधक अमर हो जाता है । ऐसा लोग कहते हैं कि देवता लोग आसन के प्रभाव से सिद्ध हो गए हैं । यही बात मूलमन्त्र के अर्थवेत्ताओं को भी भासित होती है । देवता लोग भी सभी लोकों में निरन्तर आसन की प्रशंसा करते हैं ॥५ – ६॥

देवाः श्रीकामिनीकान्ताः प्रभवन्ति जगत्त्रये ।

कालं हि वशमाकर्त्तुं नियुक्तो यश्च भावकः ॥७॥

ते सर्वे विचरन्तीह कोटिवह्सशतेषु च ।

तत्तदासननामानि श्रुणु तत्साधनानि च ॥८॥

येन विज्ञानमात्रेण साक्षादीशस्य भक्तिमान् ।

ऐसे तो देवता लोग श्री (कामिनी) में प्रेम करने वाले होते हैं, किन्तु जो आसन में भावना करने वाले हैं, वे काल को भी वश में करने में समर्थ हैं । ऐसे भावक इस लोक में सैकड़ों करोड़ों वर्षों तक विचरण करते हैं । अब हे सदाशिव ! उन-उन आसनों के नाम तथा उनके सिद्धि के सधनों को सुनिए, जिनके ज्ञानमात्र से साधक ईश्वर की भक्ति करने वाला बन जाता है ॥७ – ९॥

रुद्रयामल तंत्र पटल २४                 

Rudrayamal Tantra Patal 24

रुद्रयामल तंत्र चौबीसवाँ पटल – आसन निरुपण

रुद्रयामल तंत्र चतुर्विंशः पटलः

रूद्रयामल तंत्र शास्त्र

अथ कूर्मासनं नाथ कृत्वा वायुं प्रपूरयेत् ॥९॥

कामरुपो भवेत् क्षिप्रं कलिकल्मषनाशनम् ।

समानासनमाकृत्य लिङाग्रे स्वीयमस्तकम् ॥१०॥

नितम्बे हस्तयुगलं भूमौ सङ्केचित पतेत् ।

कुम्भीरासनमावक्ष्ये वायूनां धारणाय च ॥११॥

आसन निरुपण — हे नाथ ! कूर्मासन कर वायु से शरीर को पूर्ण करे । यह कूर्मासन कलि के समस्त पापों को नष्ट करने वाला है । इसके करने से साधक कामनानुसार रुप धारण करने वाला बन जाता है । समानासन ( द्र० . २३ , ७१ ) करके लिङ्ग के आगे अपना मस्तक तथा नितम्ब पर दोनों हाथ रखकर शरीर को सिकोड़ते हुए पृथ्वी पर गिर जावे ॥९ – ११॥

तिष्ठेत् कुण्डाकृतिर्भूमौ करौ शीर्षोपरि स्थितौ ।

पदोपरि पदं दत्त्वा शीर्षोपरि करद्वयम् ॥१२॥

तिष्ठेत कुण्डाकृतिर्भूमौ कुम्भीरासनमेव तत् ।

अथ मत्स्यासनं पृष्ठे हस्तोपरि कराङगुलिः ॥१३॥

पादयुग्मप्रमाणेन वृद्धाङ्‌गुष्ठस्य योजनम् ।

अब वायु धारण के लिए कुम्भीरासन कहती हूँ । दोनों हाथों को शिर के ऊपर रखे, पैर के ऊपर पैर रखकर कुण्ड की आकृति में पृथ्वी पर गिर जावे, यह कुम्भीरासन कहा जाता है । अब मत्स्यासन सुनिए । हाथ की फैली हुई अङ्गुलियों के ऊपर दोनो पैरों को फैलाकर शरीर को मयूर के समान बनाते हुए पैर के अंगुष्ठ का समायोजन मत्स्यासन कहलाता है ॥१२ – १४॥

मकरासनमावक्ष्ये वायुपानाय कुम्भयेत् ॥१४॥

पृष्ठे पादद्वयं दत्त्वा हस्ताभ्यां पृष्ठबन्धनम् ।

अथ सिंहासन नाथ कूर्परोपरि जानुनी ॥१५॥

स्थापयित्वा ऊद्र्ध्वमुखो वायुपानं समाचरेत् ।

अब मकरासन कहती हूँ जिससे वायुपान के लिए कुम्भक किया जाता है । पीठ पर दोनों पैर रखकर दोनों हाथों से पीठ को बाँध लेवे – यह मकरासन है । अब सिंहासन कहती हूँ । क्रमशः दोनों हाथ क केहुनी पर दोनों पैर का जानु स्थापित करे । तदनन्तर मुख को ऊपर कर वायु पान करे । यह सिंहासन है ॥१४ – १६॥

अथ वक्ष्ये महादेव कुञ्चरासनमुत्तमम् ॥१६॥

करेणैकेन पादाभ्यां भूमौ तिष्ठेत् शिरः करः ।

व्याघ्रसनमथो वक्ष्ये क्रोधकालविनाशनम् ॥१७॥

एकपादं शेर्षमध्ये मेरुदण्डोपरि स्थितम् ।

हे महादेव ! अब इसके बाद सर्वश्रेष्ष्ठ कुञ्जरासन कहती हूँ – एक हाथ तथा दोनों पैरों के सहारे पृथ्वी पर स्थित रह कर शिर पर दूसरा पैर रखे तो सिंहास्न होता है । अब क्रोधरुपी काल को विनाथ करने वाले व्याघ्रासन को कहती हूँ । मेरुदण्ड के ऊपर से ले जाकर एक पैर शिर के मध्य में स्थापित करे तो व्याघ्रसन हो जाता है ॥१६ – १८॥

भल्लूकासनमावक्ष्ये यत्कृत्वा योगिराड्‌  भवेत् ॥१८॥

नितम्बे च पादगोष्ठी हस्ताभ्यामड्‌गुलीयकम् ।

अथ कामासनं वक्ष्ये कामसङेन हेतुना ॥१९॥

गरुडासनमाकृत्य कनिष्ठाग्रं स्पृशोद‌भवम् ।

वर्त्तुलासनमावक्ष्ये यत्कृत्त्वा भैरवो भवेत् ॥२०॥

आकाशस्थितपादाभ्यां पृष्ठदेशं निबन्धयेत् ।

अब भल्लूकासन कहती हूँ जिसके करने से साधक योगिराज बन जाता है । दोनो नितम्ब पर पैर रखकर हाथों से (पैर की) अंगुली पकड़ रखे- यह भल्लूकासन है । अब काम का मर्दन करने वाले कामासन को कहती हूँ । गरुड़ासन ( द्र० . २३ . ९९ ) कर उसे कनिष्ठा अंगुली से पकड़े रहे । अब वर्तुलासन कहती हूँ जिसके करने से साधक साक्षात् भैरव बन जाता है । दोनों पैर को आकाश में खडा़कर पीठ को बाँध लेवे ।॥१८ – २१॥

अथ मोक्षासनं वक्ष्ये यत्कृत्त्वा मोक्षमन्दिरम् ॥२१॥

दक्षहस्तं दक्षपादं केवलं स्थापयेत्सुधीः ।

अथ मालासनं नाथ यत्कृत्वा वायवीप्रियः ॥२२॥

शुभयोगं समाप्नोति एकहस्तस्थितो नरः ।

अथ दिव्यासनं वक्ष्ये पृष्ठं हस्तेन बन्धयेत् ॥२३॥

अब मोक्षासन कहती हूँ जिसके करने से मोक्षाधिकारी बन जाता है । सुधी साधक साधक दाहिना हाथ दाहिना पैर केवल पृथ्वी पर स्थापित करे । अब मालासन कहती हूँ जिसके करने से वायु देवता कुण्डलिनी प्रसन्न होती हैं। केवल एक हाथ के बल पृथ्वी पर स्थित रहने वाला साधक उत्तम योग प्राप्त कर लेता है । अब दिव्यासन कहती हूँ । पीठ को एक हाथ से बाँधे ॥२१ – २३॥

एकहस्तमध्यदेशं भूमिहस्तञ्च नासया ।

अर्द्धोदयासनं नाथ सर्वाङ खे नियोजयेत् ॥२४॥

केवलं हस्तयुगलं भूमिमालोक्य नासया ।

अथ चन्द्रासनं वक्ष्ये पादाभ्यां स्वशरीरकम् ॥२५॥

पुनः पुनः धारयेद् यो वायुधारणपूर्वकम् ।

अथ हंसासनं वक्ष्ये शरीरेण पुनः पुनः ॥२६॥

हे नाथ ! अर्द्धोदयासन उसे कहते हैं जिसमें अपने सभी अङ्गो को आकाश में स्थापित करे और नासिका से पृथ्वी का घर्षण करते हुए दोनों हाथों को पृथ्वी पर रखे । अब चन्द्रासन कहती हूँ । बारम्बार वायु को धारण करते हुए दोनों पैरों के बल पर अपना समस्त शरीर बारम्बार स्थापित करे ॥२४ – २६॥

भूमौ सन्ताड्येत् श्वासैः प्राणवायुदृढः सुधीः ।

अथ सूर्यासनं वक्ष्ये पृष्ठात् पादेन बन्धनम् ॥२७॥

पृष्ठे भेदान्वितं पादं तस्य हस्तेन बन्धयेत् ।

अथ योगासनं वक्ष्ये यत्कृत्वा योगिराड्‌ भवेत् ॥२८॥

अब हंसासन कहती हूँ । सुधी साधक प्राणवायु को दृढ़ करते हुए अपने शरीर से निर्गत श्वासों द्वारा पृथ्वी को बारम्बार प्रताड़ित करे । अब सूर्यासन कहती हूँ । इससे पीछे से पैर के द्वारा सारा शरीर बाँधा जाता है । पीठ पर भेदयुक्त पैर रखकर उसे हाथ से बाँध रखे । अब योगासन कहती हूँ जिसके करने से साधक योगिराज बन जाता है ॥२७ – २८॥

सर्वाः पादतलद्वन्द्वं स्वाङे बद्ध्वा करद्वयम् ।

गदासनमतो वक्ष्ये गदाकृतिर्वसेद् भुवि ॥२९॥

ऊद्र्ध्वबाहुर्भवेद्येन कायशोधनहेतुना ।

अथ लक्ष्म्यासनं वक्ष्ये लिङाग्रेऽघ्रितलद्वयम् ॥३०॥

गुह्यदेशे हस्तयुग्मं तलाभ्यां बन्धयेद् भुवि ।

अथ कुल्यासनं वक्ष्ये यत्कृत्वा कौलिको भवेत् ॥३१॥

दोनों ऊरु पर दोनों पैर के तलवे रखकर अपने गोद में दोनों हाथों को परस्पर बॉध लेवे । अब गदासन कहती हूँ। गदा आकृति में पृथ्वी पर स्थित हो जावे और कायशुद्धि के लिए बाहुओं को ऊपर उठाए रखे । 

अब लक्ष्म्यासन कहती हूँ — लिङ्ग के अग्रभाग पर दोनों पैर का तलवा रखे तथा गुह्मदेश पर दोनों हाथ रख कर उसके तलवे से भूमि को पकड़ लेवे । अब कुल्यासन कहती हूँ, जिसके करने से साधक कुलमार्ग का अधिकारी बन जाता है ॥३० – ३१॥

एकाहस्तं मस्तकस्थोऽधः शीर्षेऽभिन्नगे करम् ।

ब्राह्मणासनमावक्ष्ये यत्कृत्त्वा ब्राह्मणो भवेत् ॥३२॥

एकपादमूरौ दत्त्वा तिष्ठेद् दण्डकृतिर्भुवि ।

क्षत्रियासनमावक्ष्ये यत्कृत्त्वा धनवान भवेत् ॥३३॥

केशेन पाययुगलं बद्ध्वा तिष्ठेदधोमुखः ।

एक हाथ को मस्तक के ऊपर रखे, दूसरे हाथ को शीर्ष के नीचे भाग में रखे । अब ब्रह्मणासन कहती हूँ, जिसके करने से साधक ब्राह्मण बन जाता है । एक पैर को ऊरु पर स्थापित करे तथा दूसरे पैर को डण्डे के समान पृथ्वी पर खड़ा रखे । अब क्षत्रियासन कहती हूँ, जिसके करने से साधक धनी हो जाता है । केश से दोनों पैरों को बाँधकर नीचे अधोमुख स्थित रहे ॥३२ – ३४॥

अथ वैश्यासनं वक्ष्ये यत्कृत्वा सत्यवान्भवेत् ॥३४॥

वृद्धाङगुष्ठेन यस्तिष्ठेत् हस्तयुग्मं स्वकोरसि ।

अथ शूद्रासनं वक्ष्ये यत्कृत्वा सेवको भवेत् ॥३५॥

धृत्वाङ्‌गुष्ठद्वयं योज्यं नासाग्रपादमध्यके ।

अथ जात्यासनं वक्ष्ये येन जातिस्मरो भवेत् ॥३६॥

हस्ताङ्‌घ्रियुग्मं भूमौ च गमनागमनं ततः ।

पाशवासनमावक्ष्ये कृत्त्वा पशुपतिर्भवेत् ॥३७॥

पृष्ठे हस्तद्वयं दत्त्वा कूर्पराग्रे स्वमस्तकम् ।

एतेषां साधनादेव चिरजीवी भवेन्नरः ॥३८॥

अब वैश्यासन कहती हूँ जिसे कर के वैश्य सत्यनिष्ठ हो जाता है । दोनों हाथों को वक्षः स्थल पर स्थापित करे और दोनों पैर के अंगूठे को एक में सटा पर पृथ्वी पर खड़ा रहे । अब शूद्रासन कहती हूँ, जिसे करके साधक सेवक बन जाता है । दोनों अंगूठों को पकड़कर एक को नासिका के अग्रभाग में तथा दुसरे को पैर के मध्य भाग में स्थापित करे। अब जात्यासन कहती हूँ, जिसे करने पर साधक को पूर्वजन्म का ज्ञान होता है । दोनों हाथ और दोनों पैर को पृथ्वी पर रखकर गमनागमन करे।

अब पाशावासन कहती हूँ, जिसके करने से साधक पशुपति बन जाता है । पीठ पर दोनों हाथ रखे, दोनों कूर्पर के आगे अपना मस्तक रखे, इन सभी आसनों की साधना से मनुष्य चिरञ्जीवी बन जाता है ॥३४ – ३८॥

संवत्सरं साधनाद्वै जीवन्मुक्तो भवेद् ध्रुवम् ।

श्रीविद्यासाधनं पश्चात् कथितव्य्म तब प्रभो ॥३९॥

आसनं योगसिद्धर्थं कायशोधनहेतुना ।

इदानीं श्रृणु देवेश रहस्यं कोमलासनम् ॥४०॥

योगसिद्धिविचाराय रहस्तं चर्मासनं शुभम् ।

अथ नरासनं वक्ष्ये षोडशादिप्रकारकम् ॥४१॥

येन साधनमात्रेण योगी भवति साधकः ।

प्रकारं षोडशप्रोक्तं मत्कुलागमसम्भवम् ॥४२॥

किं बहुना एक संवत्सर की साधना से निश्चित रुप से मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है । हे प्रभो ! अब इसके आगे श्री विद्या के आसन का साधन आपसे कहूँगी । आसन कायशुद्धि के लिए है । कायशुद्धि से योगसिद्धि होती हैं । हे देवेश ! अब कोमलासन के गुप्त रहस्य को श्रवण कीजिए । योगसिद्धि के लिए चर्मासन शुभकारक गोपनीय रह्स्य हैं ।

अब मैं सोलह प्रकार वाले नरासन को कहती हूँ, जिसके साधन से साधक योगी बन जाता है । नरासन का उक्त सोंलह प्रकार हमारे शाक्तागम से उत्पन्न हुआ हैं ॥३९ – ४२॥

येन साधनमात्रेण साक्षाद्योगी महीतले ।

एकमासाद् भवेत्कल्पो द्विमासे द्रुतकल्पनम् ॥४३॥

त्रिमासे योगकल्पः स्याच्चतुर्मासे स्थिराशयः ।

पञ्चमासे सूक्ष्मकल्पे षष्ठमासे विवेकगः ॥४४॥

सप्तमासे ज्ञानयुक्तो भावको भवति ध्रुवम् ।

अष्टमासेऽन्नसंयुक्तो जितेन्द्रियकलेवरः ॥४५॥

नवमे सिद्धिमिलनो दशमे चक्रभेदवान् ।

एकादशे महावीरो द्वादशे खेचरो भवेत् ॥४६॥

इसके साधन से पृथ्वी पर साधक एक मास में योगी के समान जो जाता है । दो मास में योग कल्पक, तीन मास में योगीकल्प, चार मास में स्थिराशय, पाँच मास में सूक्ष्मकल्प तथा षष्ठमास में ज्ञान का पात्र हो जाता है । भावक सात मास में निश्चित रुप से ज्ञानवान् हो जाता है । आठ महीने में सत्त्वसम्पन्न तथा इन्द्रिय विजेता बन जाता है । नव महीनें में सिद्धि का मिलन होता है, दश मास में चक्रों का भेदन करने वाला, एकादश में महावीर तथा द्वादश मास में खेचर हो जाता है ॥४३ – ४६॥

इति योगासनस्थश्च योगी भवति साधकः ।

नरासनं यः करोति स सिद्धो नात्र संशयः ॥४७॥

इस प्रकार योग और आसन से संयुक्त साधक योगी बन जाता है, जो नरासन करता है वह सिद्ध हो जाता है इसमें संशय नहीं ॥४७॥

रुद्रयामल तंत्र पटल २४                 

Rudrayamal Tantra Patal 24

रुद्रयामल तंत्र चौबीसवाँ पटल

रुद्रयामल तंत्र चतुर्विंशः पटलः – शवसिद्धिकथनम्

रूद्रयामल तंत्र शास्त्र

तत्प्रकारं प्रवक्ष्यामि येन सिद्धो भवेत्प्रभो ।

अधोमुखं महादेव नरासनस्य साधने ॥४८॥

शवसिद्धिकथन — हे प्रभो ! अब नरासन का प्रकार कहती हूँ, जिससे साधक सिद्ध बन जाता है । नरासन के साधन काल में अधोमुख रहना चाहिए ॥४८॥

करणीयं साधकेन्द्रैर्योगशास्त्रार्थसम्मतैः ।

अक्षीणं यौवनोद्दामं सुन्दरं चारुकुन्तलम् ॥४९॥

लोकानां श्रेष्ठमेवं हि पतितं रणसम्मुखे ।

तत्सर्वं हि समानीय मङले वासरे निशि ॥५०॥

चन्द्रसूर्यासनं कृत्वा साधयेत्तत्र कौलिकः ।

अथान्यत् सम्प्रवक्ष्यामि सर्वसिद्धिप्रकारकम् ॥५१॥

भेकासनं यः करोति स एव योगिनीपतिः ।

योगशास्त्र में निष्ठा रखने वाले साधकेन्द्रों को जिस प्रकार नरासन करना चाहिए उसका प्रकार कहती हूँ । जिसकी उत्कृष्ट जवानी क्षीण न हुई हो, जिसके केश अत्यन्त सुन्दर हों, जो शरीर से सुन्दर हो, युद्धभूमि में सामने मारा गया है, ऐसे लोक श्रेष्ठ युवक के शरीर को सर्वाङ्गतया लाकर मङ्गलवार के दिन रात्रि के समय चन्द्रासन और सूर्यासन कर कौलिक (शाक्त) साधक उसकी सिद्धि करे । इसके अतिरिक्त एक और सर्वसिद्धि का प्रकार कहती हूँ । जो उक्त शव पर बैठकर भेकासन करता है वही योगिनीपति होता है ॥४९ – ५२॥

अथान्यत् सम्र्पवक्ष्यामि यत्कृत्वा योगिराड्‌ भवेत् ॥५२॥

तत्सर्वोत्तरशिरसि स्थित्वा चन्द्रासने जपेत् ।

अथान्यत् तत्प्रकारञ्च महाविद्यादिदर्शनात् ॥५३॥

अब दूसरा आसन कहती हूँ जिसको करके साधक योगिराज बन जाता है । उस शव के शिर के पीछे चन्द्रासन पर स्थित हो जप करे । अब उसका और प्रकार कहती हूँ, जो महाविद्या के दर्शन में कारण है ॥५२ – ५३॥

मत्सरे गौरवर्णे च तत्र शैलासने जपेत् ।

अथान्यत्तत्प्रकारं च योगिकौलो न संशयः ॥५४॥

यद्येवं म्रियते सोऽपि तदा भद्रास्सने जपेत् ।

तत्तत्साधनकाले च एवं कुर्यादि‌दने दिने ॥५५॥

मत्स्र युक्त किन्तु गौरवर्ण के शवासन पर शैलासन से जप करे । अब उसका एक और प्रकार कहती हूँ, जिससे निस्सन्देह योगी शाक्त बन जाता है । जो उक्त प्रकार से मरा हुआ शव है उस पर भद्रासन से स्थित होकर जप करे । उसकी सिद्धिकाल में प्रतिदिन ऐसा करे ॥ ५४ – ५५॥

न्रुत्यवाद्यगीतरागभोगोनविंशतौ दिने ।

चतुर्दशं न वीक्ष्येत भैरवाणां भयाद्र्दनात् ॥५६॥

मनोनिवेशमात्रेण योगी भवति भैरव ।

स्वेच्छासनं समाकृत्य मन्त्रं जपति यो नरः ॥५७॥

महासारो वीतरागः सिद्धो भवति निश्चितम् ।

अथान्यत् शवमाहात्म्यं श्रृणुष्वावहितो मम ॥५८॥

उन्नीसवें दिन साधक नृत्य, वाद्य, गीत, राग तथा भोग इन १४ का दर्शन न करे क्योंकि दर्शन से भैरवों का भय होता है। हे भैरव ! इस प्रकार मन के सन्निवेश मात्र से साधक योगी हो जाता है । स्वेच्छासन करके जो मनुष्य जप करता है, दृढ़ सत्त्ववान् ‍ वीतराग तथा निश्चित रुप से योगी होता है । अब हे सदाशिव ! सावधान हो कर अन्य प्रकार के शव माहात्म्य को सुनिए ॥५६ – ५८॥

तत्सर्वं गृहमानीयाच्छाद्य शार्दूलचर्मणा ।

तत्र मन्त्री महापूजां कृत्वा प्रविश्यं संजपेत् ॥५९॥

पद्मासनस्थस्तस्यैव झटिद् योगी न संशयः ॥६०॥

एतत्प्रकाररासनमाशु कृत्वा

जितेन्द्रियो योगफलार्थविज्ञः ।

भवेन्मनुष्यो मम चाज्ञया हि

सिद्धो गणोऽसौ जगतामधीशः ॥६१॥

उस शव को घर पर लाकर व्याघ्र चर्म से उसे आच्छादित करे । फिर उसकी महापूजा कर उस पर बैठ कर जप करे । पद्‍मासन लगाकर जप करने स शीघ्र ही योगी बन जाता है इसमें संशय नहीं । इस प्रकार शवसिद्धि का प्रकार सम्पादन कर साधक जितेन्द्रिय और योगफल के अर्थ का ज्ञाता हो जाता है । मेरी आज्ञा से ऐसा साधक सिद्ध हो जाता है, शिवगण हो जाता है तथा जगत् ‍ का स्वामी बन जाता है ॥५९ – ६१॥

मूलखड्‌ग यष्टिपरडितरवारादिना युतम् ।

भूतसर्पराज व्याघ्रं सद्यो मृतं यजेत् ॥६२॥

यस्य मृत्युर्भवेन्नाथ भैरवस्य सुरापतेः ।

रणे सम्मुखयुद्धस्य तदानीय जपं चरेत् ॥६३॥

तत्र कौलासनं कृत्वा अथवा कमलासनम् ।

महाविद्यामहामन्त्रं जप्त्वा लिङमवाप्नुयात् ॥६४॥

मरे हुए भूत, सर्प, राजा और व्याघ्र के शव पर मूल, खड्‍ग, यष्टि, परडि ?, तलवार लेकर जप करे । हे नाथ ! सुरा पीने वाले जिस भैरवोपासक की सम्मुख युद्ध करते हुए मृत्यु हो गई हो उसे लाकर जप किया जा सकता है । उस पर कौलासन अथवा कमलासन (= पद्‍मासन) से बैठकर महाविद्या के महामन्त्र का जप करे तो स्पष्ट रुप से महाविद्या के चिन्ह दिखाई पड़ने लगते हैं ॥६२ – ६४॥

रुद्रयामल तंत्र पटल २४- शवसाधना में त्याज्य शव               

Rudrayamal Tantra Patal 24

रुद्रयामल तंत्र चौबीसवाँ पटल

रुद्रयामल तंत्र चतुर्विंशः पटलः

रूद्रयामल तंत्र शास्त्र

एतत्सर्वं न गृहणीयाद् यदीच्छेदात्मनो हितम् ।

कुव्याधिमरणं कुष्ठं स्त्रीवश्यं पतितं मृतम् ॥६५॥

दुर्भिक्षमृतमुन्मत्तमव्यक्तलिङुमेव च ।

हीनाङ भूचरवृद्धं पलायनपरं तथा ॥६६॥

अन्यद्यो यद् विचारेण हत्त्वा लोकं जपन्ति ये ।

ते सर्वे व्याघ्रभक्षा स्युः खादन्ति व्याघ्ररुपिणः ॥६७॥

शवसाधना में त्याज्य शव — यदि साधक अपना कल्याण चाहे तो निम्न प्रकार के शवों को जप के लिए न ग्रहण करे। जिसकी कुव्याधि से मृत्यु हो, जो कोढ़ी हो, स्त्री- वश्य हो अथवा पतित होकर मरा हो, जो दुर्भिक्ष में मरा हो, उन्मत्त होकर मरा हो, जो स्त्री पुरुष के लिङ्ग से रहित (नपुंसक) होकर मरा हो, हीनाङ्ग होकर मरा हो, पृथ्वी पर विचरण करने वाला वृद्ध तथा युद्ध में भागते हुए मरा हो अथवा जिसने जिस विचार से किसी की हत्या कर दी हो, ऐसे शव पर बैठकर जो जप करते हैं वे सब व्याघ्र के भक्ष्य हो जाते हैं, उन्हें प्रेत बाघ का रुप धारण कर खा जाते हैं ॥६५ – ६७॥

पर्युषितं तथाश्वस्थमधिकाङु कुकुल्बिषम् ।

ब्राह्मणं गोमयं वीरं धार्मिक सन्त्यजेत् सुधीः ॥६८॥

स्त्रीजनं योगिनं त्यक्त्वा साधयेद्वीरसाधनम् ।

तदा सिद्धो भवेन्मन्त्री आज्ञया मे न संशयः ॥६९॥

जो शव बासी हो गया हो, अश्व पर स्थित होकर मरा हो, अधिकाङ्ग हो, बुरे से बुरा पाप किया हो ब्राह्मण हो, गोबर पर स्थित हो, वीरमार्ग में रहने वाला हो, धार्मिक हो ऐसे शव का परित्याग कर देना चाहिए । स्त्रीजन का शव और योगी का शव इन्हें छोड़कर वीर साधन करना चाहिए । तब मन्त्रज्ञ मेरी आज्ञा से सिद्ध हो जाता है इसमें संशय नहीं ॥६९॥

तरुणं सुन्दरं शूरं मन्त्रविद्यं समुज्ज्वलम् ।

गृहीत्वा जपमाकृत्य सिद्धो भवति नान्यथा ॥७०॥

मनुष्यश्वह्रत्पद्मे सर्वसिद्धिकुलाकुलाः ।

तत्र सर्वासनान्येव सिद्धयन्ति नात्र संशयः ॥७१॥

अथान्यत्तत्प्रकारं तु यत्क्रृत्वा योगिराट् भवेत् ।

कोमलाद्यासने स्थित्वा धारयन् मारुतं सुधीः ॥७२॥

तरुण, सुन्दर, शूर, मन्त्रवेत्ता, प्रकाश से उज्ज्वल शव को ग्रहण कर उस पर जप करने से साधक सिद्ध हो जाता है, अन्यथा नही । मनुष्य के हृत्पद्‍म में कुल अथवा अकुंल सभी सिद्धियाँ रहती है । उन पर उन-उन आसनों से जप करने से सिद्धि होती हैं इसमें संशय नहीं । इसके अतिरिक्त एक अन्य प्रकार है । कोमलादि आसन पर स्थित रहने वाला सुधी साधक वायु को धारण करने से योगिराज हो जाता है ॥७० – ७२॥

तत्कोमलासनं वक्ष्ये श्रृणुष्व मम तद्वचः ।

अवृद्धक मृतं बालं षण्मासात् कोमलं परम् ॥७३॥

तद्विभेदं प्रवक्ष्यामि गर्भच्युत महाशवम् ।

तद्धि व्याघ्रत्वचारुढं कृत्वा तत्र जपेत् स्थितः ॥७४॥

अब मैं उस कोमलासन को कहती हूँ, मेरी बात सुनिए । जो बहुत बड़ा न हुआ हो ऐसा ६ महीने के भीतर का मरा हुआ बालक अत्यन्त कोमल कहा जाता है । उनके भेदों को कहती हूँ । गिरे हुए गर्भ वाला बालक महाशव कहा जाता है । उसे वाद्य के चमडे़ के ऊपर रख कर सुधी साधक जप करे ॥७३ – ७४॥

षण्मासानन्तरं यावद्दशमासाच्च पूर्वकम् ।

मृतं चारुमुखं बालं गर्भाष्टमपुरः सरम् ॥७५॥

एकहस्ते द्विहस्ते वा चतुर्हस्ते समन्वतेः ।

विशुद्ध आसने कुर्यात् संस्कारं पूजनं ततः ॥७६॥

६ महीने के बाद दश महीने की अवस्था वाले सुन्दर मुख वाले मरे बालक को जो आठवें गर्भ से उत्पन्न हो, उसे लाकर एक हाथ, दो हाथ, अथवा चार हाथ वाले विशुद्ध आसन पर बैठकर उसका संस्कार तथा पूजन करे ॥७५ – ७६॥

पूर्णे पञ्चमवर्षे च साधको वीतभीः स्वयम् ।

हीनवीतोपनयनो यो मृतस्तं हि कोमलम् ॥७७॥

गर्भच्युतफलं नाथ श्रृणु तत्फलसिद्धये ।

अणिमाद्यष्टसिद्धिः स्यात् संवत्सरस्य साधनात् ॥७८॥

पाँच वर्ष पूर्ण हो जाने पर साधक सर्वथा सर्वथा निर्भय हो जाता है । बिन यज्ञोपवीत हुए अथवा वीतोपनयन (?) वाला मरा हुआ बालक भी कोमल कहा जाता है । हे नाथ ! अब गिरे हुए गर्भ वाले बालकों के विषय में होने वाले फलों को सुनिए । जिस पर एक संवत्सर पर्यन्त साधन करने से अणिमा आदि अष्टसिद्धियों की सिद्धि होती है ॥७७ – ७८॥

मृतासने जपेन्मन्त्री महाविद्याममुं शुभम‌ ।

अचिरात्तस्य सिद्धिः स्यान्नात्र कार्या विचारणा ॥७९॥

अथान्यत् शवमाहात्म्यं श्रृणु सिद्धिश्च साधनात् ।

साधको योगिराट् भूत्त्वा मम पादतले वसेत् ॥८०॥

गर्भच्युत मरे हुए बालक के आसन पर बैठकर साधक महाविद्या के मन्त्र का जप करे तो उसे शीघ्र ही सिद्धि होती है इसमें विचार की आवश्यकता नहीं है । अब हे नाथ ! अन्य प्रकार से शव माहात्म्य का श्रवण कीजिए, जिसकी साधना से सिद्धि होती है । ऐसा साधक योगिराज बन कर मेरे पैर के नीचे निवास करता है ॥७९ – ८०॥

दशसंवत्सरे पूर्णे यो म्रियेत शुभे दिने ।

शनौ मङुलवारे च तमानीय प्रसाधयेत् ॥८१॥

तत्र वीरासनं कृत्त्वा यो जपेद् भद्रकालिकाम् ।

अथवा बद्धपद्मे च स सिद्धो भवति ध्रुवम् ॥८२॥

ठीक दश वर्ष बीत जाने पर जो किसी शुभ दिन में मरा हो साधक उसे शनिवार अथवा मङ्गलवार के दिन लाकर सिद्ध करे । इस प्रकार के शव पर वीरासन लगाकर भद्रकाली मन्त्र का जप करे अथवा पद्‍मासन लगाकर जप करे तो वह निश्चित रुप से सिद्ध हो जाता है ॥८१ – ८२॥

अथ भावफलं वक्ष्ये येन शवादिसाधनम् ।

अकस्मात् प्राप्तिमात्रेण शवस्य विहितस्य च ॥८३॥

यं पञ्चदशवर्षीयं सुन्दरं पतितं रणे ।

तमानीय जपेद्वद्यां निशि वीरासने स्थितः ॥८४॥

शीघ्रमेव सुसिद्धेः स्यात् खेचरी वायुपूरणी ।

धारनाशक्तिसिद्धिः स्यात् करोतीह साधनम् ॥८५॥

अथ षोडशवर्षीयं सर्वसिद्धिअक्रं नृणाम् ।

भोगमोक्षी करे तस्य शवेन्दस्य च साधनात् ॥८६॥

शव के अकस्मात् प्राप्त होने पर उसकी साधना से होने वाले फल कहती हूँ, जो शवादि के साधन से प्राप्त होता है। सुन्दर १५ वर्ष की अवस्था वाला जो रणभूमि में मारा गया हो, ऐसे शव को लाकर वीरासन पर स्थित हो रात्रि के समय महाविद्या मन्त्र का जप ऐसा करने से खेचरी वायुपूरणी सिद्धि होती है । इस प्रकार से साधन करने वाले की धारणा शक्ति की सिद्धि होती है । ऐसे ही षोडश वर्षीय शव पर वीरासन से स्थित हो साधना करे तो पुरुष को सारी सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं । ऐसे शवेन्द्र साधन करने से साधक के हाथ में भोग और मोक्ष दोनों हो जाते हैं ॥८५ – ८६॥

एवं क्रमेण पञ्चाशद् वर्षीयं सुन्दरं वरम् ।

आनीय साधयेद्यस्तु स योगी भवति ध्रुवम् ॥८७॥

शवं रणस्थमानीय साधयेत्सुसमाहितः ।

इन्द्रुतुल्यो भवेन्नाथ रणस्थशवसाधणात् ॥८८॥

इसी प्रकार क्रमशः पचास वर्ष तक की अवस्था वाले युद्ध में मरे हुए श्रेष्ठ शव को लाकर उसके ऊपर जो साधना करता है, वह निश्चित रुप से योगी हो जाता है । रण में मरे हुए शव को लाकर बड़ी सावधानी के साथ सिद्ध करना चाहिए । हे नाथ ! रण में मरे हुए शव के साधन से साधक इन्द्र के समान बलवान् हो जाता है ॥८७ – ८८॥

यदि सम्मुखयुद्धे श्रृणु पट्टीशघातनम् ।

शवमानीय वीरेन्द्रो जपेद्वीरासनस्थितः ॥८९॥

तत् शवं तु महादेव पूजार्थं निजमन्दिरे ।

देवालये निर्णये च स्थापयित्वा जपं चरेत् ॥९०॥

हे नाथ ! और भी सुनिए । यदि सम्मुख युद्ध में पट्टिश अस्त्र से कोई मर गया हो तो ऐसे शव को लाकर उस पर वीरेन्द्र साधक वीरासन से स्थित होकर जप करे । हे महादेव ! उस शव को पूजा के लिए अपने घर पर देवालय में अथवा किसी निर्जन स्थान में स्थापित कर जप करना चाहिए ॥८९ – ९०॥

तत्र वीरासनं किं वा योनिमुद्रासनादिकम् ।

पद्मासनं तथाकृत्य वायुं धृत्वा जपं चरेत् ॥९१॥

मासैकेन भवेद्योगी विप्रो गुणधरः शुचिः ।

सूक्ष्मवायुधारज्ञो जपेद् योवनगे शवे ॥९२॥

उस पर न केवल वीरासन अपितु योनिमुद्रासनादि अथवा पद्‍मासन लगाकर वायु को धारण करते हुए जप करे । ऐसा करने से ब्राह्मण साधक गुणी, पवित्र और योगी बन जाता है । युवावस्था वाले शव पर जप करने से सूक्ष्म वायु के धारण का ज्ञान हो जाता हो जाता है ॥९१ – ९२॥

शवसाधनकालेन यद्यत् कर्म करोति हि।

तत्कर्मसाधनदेव योगी स्यादमरो नरः ॥९३॥

शव साधन काल से लेकर साधक जो जो कर्म करता है उस कर्म की साधना से मनुष्य योगी तथा अमर हो जाता है ॥९३॥

रुद्रयामल तंत्र पटल २४                 

रुद्रयामल तंत्र चौबीसवाँ पटल

रुद्रयामल तंत्र चतुर्विंशः पटलः –

रूद्रयामल तंत्र शास्त्र

आनन्दभैरवी उवाच

कालक्रियादिकं ज्ञात्त्वा सूक्ष्मानिलनिधारणम् ।

साधको विचरेद्वीरो वीराचारविवेचकः ॥९४॥

आनन्दभैरवी ने पुनः कहा – कला-क्रिया का ज्ञानकर सूक्ष्म वायु धारण करना चाहिए । ऐसा वीराचार का विवेचन करने वाला वीर साधक भूमण्डल में विचरण करे ॥९४॥

शवादे रणयातस्य क्रियामाहात्म्यमुत्तमम् ।

श्रृणु सङ्केभाषाभिः शिवेन्द्रचन्द्रशेखर ॥९५॥

एकहस्तार्द्धमाने तु भूम्यधोविधिमन्दिरे ।

संस्थाप्य सुशवं नाथ मायादवगतः प्रभो ॥९६॥

अब हे शिवेन्द्र ! हे चन्द्रशेखर ! रण में मरे हुए शव की उत्तम क्रिया के माहात्म्य को सुनिए । पृथ्वी में डेढ़ हाथ नीचे खने हुए गढ़डे में विधिपूर्वक मन्दिर बनाकर उसमें शव स्थापन कर हे प्रभो ! माया मन में निम्न धारणा करे ॥९५ – ९६॥

एकाहं जगदाधारा आधारान्तर्गता सती ।

पतिहीना सूक्ष्मरुपादधरादिचराचरम् ॥९७॥

मदीयं साधकं पुण्यं धर्मकामार्थमोक्षगम् ।

प्रकरोमि सदा रक्षां धात्रीरुपा सरस्वती ॥९८॥

आधार के अन्तर्गत रहने वाली जगत् ‍ की आधारभूता केवल मैं ही हूँ । मेरा कोई स्वामी नहीं है । यह सारा चराचर जगत सूक्ष्मरुप से मेरा ही है । मेरा साधक बहुत पुण्य वाला है । वह धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष का अधिकारी है । सरस्वती रुप से मैं उसकी धात्री बनकर रक्षा करती हूँ ॥९७ – ९८॥

केवलं तदभावेन शम्भो योगपरायण ।

मग्ना संसारकरनात्त्वयि त्वञ्चाहमेव च ॥९९॥

यद्यत‌पदार्थनिकरे तिष्ठसि त्वं सदा मुदा ।

तत्रैव संस्थिरा ह्रष्ट चाहमेव न संशयः ॥१००॥

हे योगपरायण शम्भो ! केवल मेरा ज्ञान न होने से अपके द्वारा संसार बनाने के कारण लोग आप में मग्न हो जाते हैं, ऐसे जो आप हैं वही मैं भी हूँ । हे सदाशिव ! जिन पदार्थ समूहों में आप प्रसन्नता से निवास करते हो, उन-उन पदार्थों में प्रसन्नता पूर्वक मैं भी निवास करती हूँ, इसमें संशय नहीं ॥९९ – १००॥

एतद्भावं त्वं करोषि कस्य हेतोस्तव प्रिया ।

वामाङे संस्थिरा नित्यं कामक्रोधविवर्जिता ॥१०१॥

आप भी यही भावना करते हो, इसी हेतु से मैं भी आपको प्यारी हूँ और काम क्रोधादि दोषों से वर्जित रहकर नित्य आपके वामाङ्ग में स्थित रहती हूँ ॥१०१॥

रुद्रयामल तंत्र पटल २४                 

रुद्रयामल तंत्र चौबीसवाँ पटल

रुद्रयामल तंत्र चतुर्विंशः पटलः 

रूद्रयामल तंत्र शास्त्र

आनन्दभैरव उवाच

किं प्रयोजनमेवं हि शवादीनाञ्च साधनात् ।

यदि ते श्रीपदाम्भोजमधून्मत्तो भवेद्यतिः ॥१०२॥

आनन्दभैरव ने कहा – हे भद्रे ! शवादि के साधन से क्या प्रयोजन है? साधक यदि तुम्हारे चरण कमलों के मधु को पीकर उन्मत्त बना रहे ॥१०२॥

त्रैलोक्यपूजिते भीमे वाग्वादिनीस्वरुपिणी ।

शवसाधनमात्रेण केन योगी भवेद्वय ॥१०३॥

आनन्दरस लावण्यमन्द हासमुखाम्बुजे ।

योगी भजति योगार्थं केन तत्फलमावद ॥१०४॥

हे त्रैलोक्यपूजिते ! हे भीमे ! हे वाग्वादनस्वरुपिणि ! किस प्रकार शव साधन मात्र से साधक योगी बन जाता है उसे कहिए । आनन्द रस के लावण्य़ से युक्त मुखाम्बुज से मन्द हास्य करने वाली हे देवी ! साधक लोग योग के लिए जब योगी होते हैं, फिर किस प्रकार शव साधन करते हैं उसका फल कहिए ॥१०३ – १०४॥

आनन्दभैरवी उवाच

यदि शङ्कर भक्तोऽसि मम जापपरायणः ।

तथापि शवभावेन शववत् शवसाधनम् ॥१०५॥

रात्रियोगे प्रकर्त्तव्यं दिवसे न कदाचन ।

शवे स्थिरो यो बभूव स भक्तो मे न संशयः ॥१०६॥

आनन्द भैरवी ने कहा — हे शङ्कर ! यद्यपि आप मेरे भक्त हैं, मुझ शक्ति के जप में परायण हैं फिर भी शव भाव से शव के समान बनकर शव साधन करना चाहिए । शव साधन रात्रि में ही करे । दिने में कदापि न करे जो शव पर स्थिर रह गया वह मेरा भक्त है इसमें संशय नहीं ॥१०५ – १०६॥

मे शवाकृतिमद्द्रव्यं मम तुष्टिनिबन्धनम् ।

ममज्ञापालेन योग्यः कुर्याद् वीरः शवासनम् ॥१०७॥

यद्यहं तत्र गच्छति तदैव स शिवो भवेत् ।

निःशेषत्यागमात्रेण शवत्वं प्रलयं तनोः ॥१०८॥

शव के समान आकृति वाली वस्तु सदैव मेरे संतुष्टि का साधन है । मेरी आज्ञा पालन की योग्यता रखने वाला वीर साधक शव साधन करे । मैं जिस समय उसके पास जाती हूँ, उसी समय वह शिव स्वरुप बन जाता है । शरीर का सब कुछ त्याग देने पर अथवा प्रलय कर देने पर शवत्व प्राप्त होता है ॥१०७ – १०८॥

यः करोति भावराशि मयि देव्यां महेश्वर ।

त्रैलोक्यपूजितायां तु स शिवः शवमाश्रयेत् ॥१०९॥

अधिकारी तु भक्तस्य पालनं परपृष्ठतः ।

करोनि कामिनीनाथ सन्देहो नात्र भूतले ॥११०॥

हे महेश्वर ! त्रैलोक्य पूजित मुझ देवी में जो साधक अपनी समस्त भावराशि समर्पित कर देता है और शव का आश्रय ले लेता है, वह शिव है । हे कामिनी नाथ ! मैं पृथ्वी पर भक्त पर अधिकार रखती हूँ और शव की पीठ से उसका पालन करती हूँ इसमें संदेह नहीं ॥१०९ – ११०॥

यदाहं त्यज्यते गात्र्म पशूनां मारणाय च ।

तदैते च मृताः सर्वे जीवन्ते केन हेतुना ॥१११॥

तदाहुतिमहाद्रव्यं शवेन्द्रं रणहानिगम् ।

आनीय साधयेद्यस्तु स स्थिरो मे सुभक्तिगः ॥११२॥

पशुमारण के लिए जब शरीर उपस्थित किया जाता है तभी वह अहङ्कर त्याग देता है । इसी प्रकार सभी मरे हुए अपना अहङ्कार त्याग देते हैं वे किस हेतु के बल पर जीवित रहें । रण में प्राण त्याग करने वाला शवेन्द्र हमारी आहुति का महान् ‍ द्रव्य है । अतः उसको लाकर जो साधक उससे साधन करता है वह स्थिर रुप से मेरी भक्ति का अधिकारी हो जाता है ॥१११ – ११२॥

सदा क्रोधी भवेद्यस्तु स क्रूरो नात्र संशयः ।

स कथं वीररात्रौ च साधयेद् विहवलः शवम् ॥११३॥

भयविहलचेता यः स क्रोधी नात्र संशयः ।

नास्ति क्रोधसमं पापं पापात् क्षिप्तो भवेत्  शवे ॥११४॥

जो सर्वदा क्रोध करता है वही क्रुर है इसमें संशय नहीं । ऐसा विहवल (क्रुर) वीर साधक रात्रि में किस प्रकार शव साधान करने में समर्थ हो सकता है? जिसका चित्त भय से विह्वल है वही क्रोधी है इसमें संशय नहीं । क्रोध के समान कोई पाप नहीं है अतः पाप से शव साधन करने वाला साधक विक्षिप्त हो जाता है ॥११३ – ११४॥

रुद्रयामल तंत्र पटल २४               

Rudrayamal Tantra Patal 24

रुद्रयामल तंत्र चौबीसवाँ पटल- शवसाधना के अधिकारी

रुद्रयामल तंत्र चतुर्विंशः पटलः

रूद्रयामल तंत्र शास्त्र

यो भक्तः पापनिर्मुक्तः सिद्धरुपी निराश्रयः ।

विवेकी ध्याननिष्ठश्च स्थिरः संसाधयेत् शवम् ॥११५॥

यावत्कालं स्थिरचित्तं न प्राप्नोति जितेन्द्रियः ।

तावत्कालं नापि कुर्यात् शवेन्द्रस्यापि साधनम् ॥११६॥

शवसाधना के अधिकारी — जो भक्त पाप से निर्मुक्त है और किसी (क्रोधादि) का आश्रय नहीं लेता वह सिद्ध का स्वरुप है, विवेकी है और ध्यान निष्ठ है । अतः स्थिर रहने के कारण वह शव साधन का अधिकारी है । जब तक चित्त स्थिर न हो जब तक इन्द्रियाँ अपने वश में न हों तब तक शवेन्द्र का साधन कदापि नहीं करना चाहिए ॥११५ – ११६॥

शवमानीय तद्द्वारे तेनैव परिखन्य च ।

तदि‌दनात्तद्दिनं यावत् यद्बद्ध्वा व्याप्य साधयेत् ॥११७॥

एवं कृत्वा हविष्याशी महाविद्यादिसाधनम् ।

जितेन्द्रियो मुदा कुर्याद अष्टाङुसाधनेन च ॥११८॥

साधक उस शव को द्वार पर ले आवे, उसे खन कर पृथ्वी में गाड़ देवे, फिर उसी से उस दिन से आरम्भ कर उसी दिन पर्यन्त अर्थात् ‍ संवत्सर पर्यन्त साधना करनी चाहिए । इस प्रकार जितेन्द्रिय होकर हविष्यान्न भोजन करते हुए प्रसन्नता के साथ अष्टाङ्ग साधन द्वारा महाविद्या की साधना करे ॥११७ – ११८॥

रुद्रयामल तंत्र पटल २४               

Rudrayamal Tantra Patal 24

रुद्रयामल तंत्र चौबीसवाँ पटल

रुद्रयामल तंत्र चतुर्विंशः पटलः – शवसाधनाफलश्रुतिकथनम्

रूद्रयामल तंत्र शास्त्र

तदष्टाङुफलं ह्योतत् यत्कृत्त्वा सिद्धिभाग भवेत् ।

नाडीमुद्राभेद्कञ्च कुलाचारफलन्वितम् ॥११९॥

अष्टाङुसाधनदेव सिद्धरुपो महीतले ।

पश्चादन्य स्वर्गगामी भवेन्न भूतलं बिना ॥१२०॥

शवसाधन की फलश्रुति — अष्टाङ्ग साधन योग की साधना का यही फल है कि साधक सिद्धि का सत्पात्र हो जावे । अष्टाङ्ग साधना से कुलाचार के फल से संयुक्त नाडी भेद तथा मुद्रा भेद का ज्ञान हो जाता है । इसी पृथ्वी पर साधक सिद्ध हो जाता है । इसके पश्चात् ‍ वह भूलोक को छोड़कर स्वर्गगामी हो जाता है ॥११९ – १२०॥

आदौ भूतलसिद्धिः स्याद्भुवोलोकस्य सिद्धिभाक्‍ ।

जनलोकस्य सिद्धीशस्तपोलोकस्य सिद्धिभाक्‍ ॥१२१॥

सत्यलोकस्य सिद्धीशः पश्चाद् भवति साधकः ।

एवं क्रमेण सिद्धिः स्यात् स्वर्गादीनां महेश्वर ॥१२२॥

प्रथम भूलोक में सिद्धि, फिर भुवर्लोक में सिद्धि, फिर जनलोक में सिद्धि, फिर तपोलोक में वह सिद्धि का पात्र बन जाता है । इसके बाद वही साधक सत्यलोक में सिद्धेश्वर हो जाता है । हे महेश्वर ! इसी प्रकार स्वर्गादि लोकों में वह साधक सिद्धि प्राप्त कर लेता है ॥१२१ – १२२॥

अष्टाङ्गसाधनार्थाय देवा भवन्ति भूतले ।

भूतले सिद्धिमाह्रत्य गच्छन्ति ब्रह्ममन्दिरे ॥१२३॥

क्रमेणैवं विलीनास्ते अतो भूतलसाधनम् ।

इस अष्टाङ्ग योग की सिद्धि के लिए देवता भी पृथ्वी तल पर अवतार लेते हैं फिर भूतल में सिद्धि प्राप्त कर वे ब्रह्मलोक चले जाते हैं । इस प्रकार क्रमशः वे ब्रह्मलोक में विलीन हो जाते है । अतः भूतल ही भूतलसाधन के लिए श्रेष्ठ है । साधक दिन में ब्रह्मचारी और पवित्र रहे ॥१२३ – १२४॥

रुद्रयामल तंत्र पटल २४                 

रुद्रयामल तंत्र चौबीसवाँ पटल – शवसाधक विधिनिषेध

रुद्रयामल तंत्र चतुर्विंशः पटलः

रूद्रयामल तंत्र शास्त्र

भूतले शवमास्थाय ब्रह्माचारी दिवा शुचिः ॥१२४॥

निशायां पञ्चतत्त्वेन दिवसेऽष्टाङसाधनम् ।

जितेन्द्रियो निर्विकारो वित्तवानपरो नरः ॥१२५॥

शवं संसाधयेद्धीश्चिन्तालस्यविवर्जितः ।

चिन्ताभिर्जायते लोभो लोभात् कामः प्रपद्यते ॥१२६॥

कामाद्भवति सम्मोहो मोहादालस्य सञ्चयः ।

आलस्यदोषजालेन निद्रा भवति तत्क्षणात् ॥१२७॥

रात्रि के समय शव पर बैठकर पञ्चतत्त्च की साधना करे और दिन में अष्टाङ्ग योग करे । जितेन्द्रिय एवं विकाररहित पुरुष चाहे वह धनवान् ‍ हो चाहे दरिद्र हो धीर होकर चिन्ता आलस्य का त्याग कर शव सिद्धि करे। चिन्ता से लोभ, लोभ से काम उत्पन्न होता है । काम से मोह, मोह से आलस्य का सञ्चय होता है, आलस्य दोष समूहों से सद्यः तत्क्षण निद्रा उत्पन्न होती है ॥१२५ – १२७॥

महानिद्राविपाकेन मृत्युर्भवति निश्चितम् ।

अपक्षनिद्राभङेन क्रोधी भवति निश्चितम् ॥१२८॥

तत्क्रोधाच्चित्तविकलो विकलात् श्वासवर्द्धनः ।

वृथायुः क्षयमाप्नोति विस्तरे श्वाससंक्षये ॥१२९॥

महानिद्रा के परिणाम स्वरुप निश्चित रुप में मृत्यु होती है । असमय में निद्रा भङ्ग होने से निश्चित रुप से क्रोध उत्पन्न होता है । क्रोध से चित्त विकल होता है, चित्त विकल होने से श्वास की वृद्धि होती है, फिर जो अधिक श्वास के संक्षय होते ही आयु का क्षय होने लगता है ॥१२८ – १२९॥

बलबुद्धिक्षयं याति बुद्धिहीनो जडात्मकः ।

जडभावेन मन्त्राणां जपहीनो भवेन्नरः ॥१३०॥

जपहीने श्वासनाशः श्वासानाशे तनुक्षयम् ।

अतस्तनुं समाश्रित्य जपनिष्ठो भवेत् शुचिः ॥१३१॥

श्वास की अधिकता से बल एवं बुद्धि का क्षय होने लगता है । बुद्धि के नष्ट होने से जड़ता आती है । जड़ता से मन्त्र का जप नहीं हो पाता। जपहीन होने से श्वास का नाश और श्वसन प्रश्वसन का नाश होने पर मृत्यु होती है। इसलिए शरीर की रक्षा करते हुए पवित्रता पूर्वक जप करना चाहिए ॥१३० – १३१॥

रुद्रयामल तंत्र पटल २४ – अष्टांगयोगनिरूपण               

रुद्रयामल तंत्र चौबीसवाँ पटल

रुद्रयामल तंत्र चतुर्विंशः पटलः

रूद्रयामल तंत्र शास्त्र

अष्टाङ्गधारणेनैव सिद्धो भवति नान्यथा ।

अष्टाङ्गलक्षणं वक्ष्ये साक्षात् सिद्धिकरं परम् ॥१३२॥

जन्मकोटिसहस्त्राणाम फलेन कुरुते नरः ।

यमेन लभ्यते ज्ञानं ज्ञानांत कुलपतिर्भवेत् ॥१३३॥

अष्टाङ्गयोग निरुपण — मनुष्य अष्टाङ्ग योग से ही सिद्ध होता है । सिद्ध होने का और कोई दूसरा उपाय नहीं है । अब साक्षात् ‍ सिद्धि देने वाले अष्टाङ्ग योग के विषय में कहती हूँ । मनुष्य करोड़ों जन्म के पुण्य के फल से अष्टाङ्ग योग में प्रवृत्त होता है अष्टाङ्ग योग के प्रथम सोपानभूत यम से ज्ञान उत्पन्न होता है । ज्ञान से कुलपति बनता है ॥१३२ – १३३॥

यो योगेशः स कुलेशः शिशुभावस्थनिर्मलः ।

नियमेन भवेत पूजा पूजया लभते शिवम् ॥१३४॥

यत्र कल्याण सम्पूर्णा सम्पूर्णः शुचिच्यते ।

आसनेन दीर्घजीवी रोगशोकविवर्जितः ॥१३५॥

वही कुलेश्वर योगेश्वर बनता है, जो शिशुभावापन्न होकर सर्वथा निर्मल रहता है । द्वितीय सोपानभूत नियम का फल यह है कि नियम से ठीक प्रकार से पूजा होती है और पूजा से कल्याण होता है । जहां पूर्ण रुप से कल्याण होता है वहां संपूर्ण शुचिता होती है । आसन का यह फल है कि आसन से दीर्घ जीवन प्राप्त होता है । रोग और शोक सन्निकट नहीं आते ॥१३४ – १३५॥

ग्रन्थिभेदनमात्रेण साधकः शीतलो भवेत् ।

प्राणायामेन शुद्धः स्यात् प्राणवायुवशेन च ॥१३६॥

वशी भवति देवेश आत्मारामेऽपि लीयते ।

प्रत्याहारेण चित्तं तु चञ्चलं कामनाप्रियम् ॥१३७॥

साधक जब नाड़ियों की ग्रन्थि तोड़ देता है तो वह शीतल हो जाता है । चतुर्थ सोपानभूत प्राणायाम से प्राणवायु को वश में कर लेने से वह शुद्ध हो जाता है । हे देवेश ! वह जितेन्द्रिय हो जाता है और आत्माराम होकर आत्मा में रमण करता है। चित्त स्वभावतः चञ्चल और कामना चाहता रहता है ॥१३६ – १३७॥

तत्कामनाविनाशाय स्थापयेत् पदपङ्कजे ।

धारणेन वायुसिद्धिरष्ट सिद्धिस्ततः परम् ॥१३८॥

अतः उस काम के विनाश के लिए प्रत्याहार द्वारा भगवत्पादपङ्कज में चित्त को स्थापित करें । षष्ठ सोपानभूत धारणा से वायुसिद्धि, फिर वायुसिद्धि से अष्टसिद्धि प्राप्त होती है ॥१३८॥

अणिमासिद्धिमाप्नोति अणुरुपेण वायुना ।

ध्यानेन लभते मोक्षं मोक्षेण लभते सुखम् ॥१३९॥

सुखेनानन्दवृद्धिः स्यादानन्दो ब्रह्माविग्रहः ।

समाधिना महाज्ञानी सूर्याचन्द्रमसोर्गतिः ॥१४०॥

इतना ही नहीं, अणुरुप वायु से अष्टसिद्धियाँ प्राप्त होती हैं । सप्तम सोपान ध्यान से मोक्ष प्राप्ति होती है । मोक्ष से सुख प्राप्त होता है । सुख से आनन्द की वृद्धि होती है और आनन्द साक्षात् ‍ ब्रह्म का स्वरुप हैं । अष्टम सोपान समाधि से महाज्ञानी होता है । सूर्य तथा चन्द्रमा तक समाधि के बल से जा सकता है ॥१३९ – १४०॥

महाशून्ये लयस्थाने श्रीपदानन्दसागरः ।

तत्तरङे मनो दत्त्वा परमार्थविनिर्मले ॥१४१॥

श्रीपदमूर्तिमाकल्प्य ध्यायेत् कोटिरवीन्दुवत् ।

श्रीमूर्तिं कोटिचपलां समुज्ज्वलां सुनिर्मलाम् ॥१४२॥

महाशून्य में जहाँ लय का स्थान है वहाँ महाश्री के चरणों में आनन्द का सागर प्रवाहित होता है, उस परमार्थ विनिर्मल आनन्द सागर की तरंगों में मन को स्थापित करना चाहिए । करोड़ों सूर्य एवं चन्द्रमा के समान प्रकाशमान् ‍ भगवती महाश्री के पादारविन्द की कल्पना करे तथा करोड़ों विद्युत के समान प्रभा से उज्ज्वल शुभ्र श्री मूर्ति की भी कल्पना करे ॥१४१ – १४२॥

ध्यायेद्योगी सहस्त्रारे कोटिसूर्येन्दुमन्दिराम् ॥१४३॥

श्रीविद्यामतिसुन्दरीं त्रिजगतामानन्दपुञ्जेश्वरीं

कोट्यर्कायुत तेजसि प्रियकरीं योगादरीं शाङ्करीम् ।

तां मालां स्थिरचञ्चला गुरुघनां व्यालाचलां केवलां

ध्यायेत् सूक्ष्मसमाधिना स्थिरमतिः सश्रीपतिर्गच्छति ॥१४४॥

योगी को सहस्त्रार चक्र में रहने वाली करोड़ों सूर्य तथा चन्द्रमा के समान मन्दिर में रहने वाली भगवती महा श्रीविद्या की मूर्ति का ध्यान करना चाहिए । श्रीविद्या अत्यन्त सुन्दरी हैं और तीनों जगत् ‍ के आनन्द पुञ्ज की स्वामिनी हैं । वह करोड़ों अयुत सूर्य तेज में निवास करती हैं । स्वामिनी सब का प्रिय करती हैं योग का आदर करने वाली हैं और शङ्कर वल्लभा हैं । ऐसी स्थिर तथा चञ्चल रहने वाली, महाविद्या का स्थिर चित्त से समाधि द्वारा ध्यान करना चाहिए । इस प्रकार ध्यान करने वाला साधक श्रीपति श्रीविद्या को प्राप्त कर लेता है ॥१४३ – १४४॥

॥ इति श्रीरुद्रयामले उत्तरतन्त्रे महातन्त्रोद्दीपने भावनिर्णय पाशवकल्पे षट्चक्रसारसङ्केते योगविद्याप्रकरणे मन्त्रसिद्धिशक्त्युपाये भैरवीभैरवसंवादे चतुर्विशं पटलः ॥२४॥

इस प्रकार श्रीरुद्रयामल के उत्तरतंत्र में महातंत्रोद्दीपन में भावनिर्णय में पाशवकल्प में षट्चक्रसारसङ्केत में  योगविद्या प्रकरण में भैरवी भैरव संवाद में चौबीसवें पटल की डॅा० सुधाकर मालवीय कृत हिन्दी व्याख्या पूर्णं हुई ॥ २४ ॥

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