षट्पदी स्तोत्र || Shat Padi Stotra

षटपदी अर्थात् छः चरण वाला एक मात्रिक छंद जिसके प्रथम चार चरण रोला तथा अंतिम दो चरण उल्लाला के होते हैं । भगवान विष्णु को समर्पित षट्पदी स्तोत्र में श्रीमद् आदिशंकराचार्य भक्ति के उच्चतम शिखर पर पहुंचने के लिए साधक के मानसिक विकास की सीढ़ियों का वर्णन करते हैं-

▪️ श्रीमद् आदिशंकराचार्य का कहना है-‘मन की जीत मनुष्य की सबसे बड़ी जीत है । जिसने अपने मन को जीत लिया है उसने सारे जगत पर विजय प्राप्त कर ली है ।’ हमारा मन ही हमारे जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण बिन्दु है । यही हमें हंसाता है, यही हमें रुलाता है । यही खुशियों के ढेर लगा देता है तो कभी यही दुखों की गहरी खाई में ढकेल देता है । मानव मन अग्नि के समान है जो मनुष्य को बुरे और नकारात्मक विचारों में फंसाकर जीवन में आग लगा सकता है या अच्छे और सकारात्मक विचारों की ज्योति से जीवन को प्रकाशित भी कर सकता है । मन की मजबूती के आगे निर्धनता, दुर्भाग्य, मुसीबतें या बाधाएं टिक ही नहीं सकतीं । मजबूत मन और दृढ़ आत्मविश्वास को कोई नहीं हरा सकता । इसलिए भक्ति के मार्ग पर जाने के लिए मन की चंचलता को दूर करना होगा ।

▪️ उन्होंने भोग-वासना को दु:ख का कारण माना है । जो भोगों में आसक्त है, वह सदा दु:खी है इसलिए मनुष्य को अपने को परोपकारमय बनाना चाहिए और समस्त प्राणियों में दया भावना रखनी चाहिए ।

▪️ विनयी व्यक्ति का सदा अभ्युदय होता है और जो अभिमान के मद में डूबा रहता है, उसका पतन होता है ।

▪️ मनुष्य जीवन पाकर व्यक्ति को रात-दिन केवल भगवान के चरणारविन्दों का ही स्मरण करना चाहिए । संसार का चिन्तन मनुष्य को संसारी बना देता है और भगवान का चिन्तन उसे भगवान के धाम में पहुंचा देता है ।

▪️ मनुष्य को मुकुन्द (विष्णु, कृष्ण, राम) की भक्ति से ही मुक्ति मिलती है । शंकराचार्यजी का कहना है-‘यदि तुझे मोक्ष की इच्छा है तो विषयों को दूर से ही त्याग दे और संतोष, दया, क्षमा, सरलता तथा शम-दम का अमृत की तरह नित्य सेवन कर ।’

सच्चे हृदय से इन नियमों का पालन क्रमश: मनुष्य के मन को सच्ची भक्ति की ओर ले जाता है । इन एक-एक सोपानों (सीढ़ियों) पर चढ़ते हुए मन धीरे-धीरे पूर्णता की ओर अर्थात् मोक्ष की ओर अग्रसर होता है ।

श्रीमद् आदिशंकराचार्य द्वारा रचित षट्पदी स्तोत्र (हिन्दी अर्थ सहित)

षट्पदी स्तोत्र

अविनयमपनय विष्णो दमय मन: शमय विषयमृगतृष्णाम् ।

भूतदयां विस्तारय तारय संसारसागरत: ।। १ ।।

अर्थात्-हे विष्णु भगवान ! मेरी उद्दण्डता दूर कीजिये, मेरे मन का दमन कीजिये और विषयों (भोग-विलासों) की मृगतृष्णा को शान्त कर दीजिये, प्राणियों के प्रति मेरा दया भाव बढ़ाइये और इस संसार-समुद्र से मुझे पार लगाइये ।

दिव्यधुनीमकरन्दे परिमलपरिभोगसच्चिदानन्दे ।

श्रीपतिपदारविन्दे भवभयखेदच्छिदे वन्दे ।। २ ।।

अर्थात्-भगवान लक्ष्मीपति के उन चरणकमलों की वन्दना करता हूँ, जिनका मकरन्द गंगा और सौरभ (खुशबू) सच्चिदानन्द है तथा जो संसार के भय और खेद (दु:ख) का छेदन करने वाले हैं ।

सत्यपि भेदापगमे नाथ तवाहं न मामकीनस्त्वम् ।

सामुद्रो हि तरंग: क्वचन समुद्रो न तारंग: ।। ३ ।।

अर्थात्-हे नाथ ! मुझमें और आपमें भेद न होने पर भी, मैं ही आपका हूँ, आप मेरे नहीं; क्योंकि तरंग ही समुद्र की होती है, तरंग का समुद्र कहीं नहीं होता ।

उद्धृतनग नगभिदनुज दनुजकुलामित्र मित्रशशिदृष्टे ।

दृष्टे भवति प्रभवति न भवति किं भवतिरस्कार: ।। ४ ।।

अर्थात्-हे गोवर्धनधारिन् ! हे इन्द्र के अनुज (वामन) ! हे राक्षसकुल के शत्रु ! हे सूर्य-चन्द्ररूपी नेत्र वाले ! आप जैसे प्रभु के दर्शन होने पर क्या संसार के प्रति उपेक्षा नहीं हो जाती ? अर्थात् अवश्य हो जाती है ।

मत्स्यादिभिरवतारैरवतारवतावता सदा वसुधाम् ।

परमेश्वर परिपाल्यो भवता भवतापभीतोऽहम् ।। ५ ।।

अर्थात्-हे परमेश्वर ! मत्स्यादि अवतारों से अवतरित होकर पृथ्वी की सदा रक्षा करने वाले आपके द्वारा संसार के त्रिविध तापों से भयभीत हुआ मैं रक्षा करने के योग्य हूँ ।

दामोदर गुणमन्दिर सुन्दरवदनारविन्द गोविन्द ।

भवजलधिमथनमन्दर परमं दरमपनय त्वं मे ।। ६।।

अर्थात्-हे गुणमन्दिर दामोदर ! हे मनोहर मुखारविन्द गोविन्द ! हे संसार-समुद्र का मन्थन करने के लिए मन्दराचलरूप ! मेरे महान भय को आप दूर कीजिये ।

नारायण करुणामय शरणं करवाणि तावकौ चरणौ ।

इति षट्पदी मदीये वदनसरोजे सदा वसतु ।। ७ ।।

अर्थात्-हे करुणामय नारायण ! मैं सब प्रकार से आपके चरणों की शरण लूं । यह षट्पदी (छ: पदों की स्तुति) रूपी भ्रमरी सदा मेरे मुख-कमल में निवास करे ।

।।इति श्रीमच्छंकराचार्य विरचितं षट्पदी स्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।

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