शुद्ध चित्त होकर माँ भगवती के प्रसननार्थ व माता के चरणों में प्रीति के लिए पूजन या सप्तशती के पाठ के समय या नित्य प्रति श्री भगवती स्तोत्रम् का पाठ करें।

जय भगवति देवि नमो वरदे जय पापविनाशिनि बहुफलदे ।
जय शुम्भनिशुम्भकपालधरे प्रणमामि तु देवि नरार्तिहरे ॥१॥

जय चन्द्रदिवाकरनेत्रधरे जय पावकभूषितवक्त्रवरे ।
जय भैरवदेहनिलीनपरे जय अन्धकदैत्यविशोषकरे ॥२॥

जय महिषविमर्दिनि शुलकरे जय लोकसमस्तकपापहरे ।
जय देवि पितामहविष्णुनते जय भास्करशक्रशिरोऽवनते ॥३॥

जय षण्मुखसायुध ईशनुते जय सागरगामिनि शम्भुनुते
जय दुःखदरिद्रविनाशकरे जय पुत्रकलत्रविवृद्धिकरे ॥४॥

जय देवि समस्तशरीरधरे जय नाकविदर्शिनि दुःखहरे ।
जय व्याधिविनाशिनि मोक्षकरे जय वाञ्छितदायिनि सिद्धिवरे ॥५॥

एतद्व्यासकृतं स्तोत्रं यः पठेन्नियतः शुचि ।
गृहे वा शुद्धभावेन प्रीता भगवती सदा ॥६॥

॥ श्री भगवती स्तोत्रम् समाप्त ॥

मैं एक पत्नी होने के साथ साथ गृहिणी एवं माँ भी हुँ । लिखने का हुनर... ब्लॉग लिखती रहती हु... सनातन ग्रुप एक सकारात्मक ऊर्जा, आत्मनिर्भर बनाने की प्रेरणा देती जीवनी, राष्ट्रभक्ति गीत एवं कविताओं की माला पिरोया है । आग्रह :आपको पसन्द आये तो ऊर्जा देने के लिए शेयर एवं अपने सुझाव दीजिए ।

शालू सिंह

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