ऋषि अगस्त्य कौन थे Story Rishi Agastya Kahani

हिंदू परंपराओं में ऋषि-मुनियों उच्च स्थान होता है। पुरातन काल में कई महान ऋषि हुए, इनमें से एक थे ऋषि अगस्त्य। कहते हैं कि उन्होंने एक बार समंदर का सारा पानी पी लिया था। उनमें इतनी ताकत थी कि विंध्याचल पर्वत को झुका लिया था। उन्होंने श्रीराम को ऐसा मंत्र दिया, जिससे रावण का वध करने में मदद मिली। पढ़िए ऐसे ऋषि की कहानी।

कौन थे अगस्त्य ऋषि?

कहते हैं कि जगदगुरु ब्रह्मा ने धरती पर संतुलन बनाए रखने के लिए सप्तर्षियों की उत्पत्ति की थी। अगस्त्य ऋषि उनमें से एक थे। हालांकि कुछ कथाओं में कहा गया है कि अगस्त्य ऋषि का जन्म अगस्त्यकुंड में हुआ था। उनका अधिकतर जीवन दक्षिण भारत के क्षेत्र में बीता। इसलिए दक्षिण भारत के ग्रंथों में उनकी महिमा का बखान मिलता है। उनकी शादी विदर्भ देश की राजकुमारी लोपमुद्रा से हुआ था। लोपमुद्रा भी बहुत ज्ञानी महिला थीं। अगस्त्य ऋषि को राजा दशरथ का गुरु माना जाता है। ये भी कहा जाता है कि ऋग्वेद में कई मंत्रों की रचना अगस्त्य ऋषि ने की थी।

अगस्त्य एक वैदिक ॠषि थे। ये वशिष्ठ मुनि के बड़े भाई थे। इनका जन्म श्रावण शुक्ल पंचमी (तदनुसार ३००० ई.पू.) को काशी में हुआ था। वर्तमान में वह स्थान अगस्त्यकुंड के नाम से प्रसिद्ध है। इनकी पत्नी लोपामुद्रा विदर्भ देश की राजकुमारी थी। इन्हें सप्तर्षियों में से एक माना जाता है। देवताओं के अनुरोध पर इन्होंने काशी छोड़कर दक्षिण की यात्रा की और बाद में वहीं बस गये थे। वैज्ञानिक ऋषियों के क्रम में महर्षि अगस्त्य भी एक वैदिक ऋषि थे। महर्षि अगस्त्य राजा दशरथ के राजगुरु थे। इनकी गणना सप्तर्षियों में की जाती है। महर्षि अगस्त्य को मं‍त्रदृष्टा ऋषि कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने अपने तपस्या काल में उन मंत्रों की शक्ति को देखा था। ऋग्वेद के अनेक मंत्र इनके द्वारा दृष्ट हैं। महर्षि अगस्त्य ने ही ऋग्वेद के प्रथम मंडल के 165 सूक्त से 191 तक के सूक्तों को बताया था। साथ ही इनके पुत्र दृढ़च्युत तथा दृढ़च्युत के बेटा इध्मवाह भी नवम मंडल के 25वें तथा 26वें सूक्त के द्रष्टा ऋषि हैं।

महर्षि अगस्त्य को पुलस्त्य ऋषि का बेटा माना जाता है। उनके भाई का नाम विश्रवा था जो रावण के पिता थे। पुलस्त्य ऋषि ब्रह्मा के पुत्र थे। महर्षि अगस्त्य ने विदर्भ-नरेश की पुत्री लोपामुद्रा से विवाह किया, जो विद्वान और वेदज्ञ थीं। दक्षिण भारत में इसे मलयध्वज नाम के पांड्य राजा की पुत्री बताया जाता है। वहां इसका नाम कृष्णेक्षणा है। इनका इध्मवाहन नाम का पुत्र था।

अगस्त्य के बारे में कहा जाता है कि एक बार इन्होंने अपनी मंत्र शक्ति से समुद्र का समूचा जल पी लिया था, विंध्याचल पर्वत को झुका दिया था और मणिमती नगरी के इल्वल तथा वातापी नामक दुष्ट दैत्यों की शक्ति को नष्ट कर दिया था। अगस्त्य ऋषि के काल में राजा श्रुतर्वा, बृहदस्थ और त्रसदस्यु थे। इन्होंने अगस्त्य के साथ मिलकर दैत्यराज इल्वल को झुकाकर उससे अपने राज्य के लिए धन-संपत्ति मांग ली थी।

‘सत्रे ह जाताविषिता नमोभि: कुंभे रेत: सिषिचतु: समानम्। ततो ह मान उदियाय मध्यात् ततो ज्ञातमृषिमाहुर्वसिष्ठम्॥ इस ऋचा के भाष्य में आचार्य सायण ने लिखा है- ‘ततो वासतीवरात् कुंभात् मध्यात् अगस्त्यो शमीप्रमाण उदियाप प्रादुर्बभूव। तत एव कुंभाद्वसिष्ठमप्यृषिं जातमाहु:॥

दक्षिण भारत में अगस्त्य तमिल भाषा के आद्य वैय्याकरण हैं। यह कवि शूद्र जाति में उत्पन्न हुए थे इसलिए यह ‘शूद्र वैयाकरण’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। यह ऋषि अगस्त्य के ही अवतार माने जाते हैं। ग्रंथकार के नाम परुनका यह व्याकरण ‘अगस्त्य व्याकरण’ के नाम से प्रख्यात है। तमिल विद्वानों का कहना है कि यह ग्रंथ पाणिनि की अष्टाध्यायी के समान ही मान्य, प्राचीन तथा स्वतंत्र कृति है जिससे ग्रंथकार की शास्त्रीय विद्वता का पूर्ण परिचय उपलब्ध होता है।

भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार में उनके विशिष्ट योगदान के लिए जावा, सुमात्रा आदि में इनकी पूजा की जाती है। महर्षि अगस्त्य वेदों में वर्णित मंत्र-द्रष्टा मुनि हैं। इन्होंने आवश्यकता पड़ने पर कभी ऋषियों को उदरस्थ कर लिया था तो कभी समुद्र भी पी गये थे।

जब अगस्त्य ऋषि ने पी लिया समंदर का सारा पानी

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार एक बार देवताओं और राक्षसों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। देवताओं ने वृतासुर नाम के प्रमुख राक्षस का वध कर दिया। अपने भयभीत होकर राक्षस इधर-उधर छिपने लगे। कुछ राक्षस समंदर में जाकर छिप गए। वे अंधेरे में बाहर निकलते और ऋषि-मुनियों, देवताओं एवं अन्य महान पुरुषों का वध करके वापस समंदर में छिप जाते।

इससे परेशान होकर सभी देवता विष्णुजी के पास पहुंचे। विष्णु ने कहा कि इसका एक ही उपाय है, अगर सारा समुद्र सूख जाए तो राक्षस बाहर आ जाएंगे। इस काम में सिर्फ एक ही महापुरुष मदद कर सकते हैं, वो हैं अगस्त्य ऋषि। इसके बाद सभी देवता अगस्त्य ऋषि के पास पहुंचे और अपनी चिंता बताई। अगस्त्य ने उनकी बातें सुनी और उनके साथ चल दिए।

अगस्त्य ऋषि ने समंदर का सारा पानी पी लिया। फिर छिपे हुए राक्षस नजर आ गए और देवताओं ने उनका वध कर लिया। जब समंदर पूरा सूख गया तो, देवताओं ने अगस्त्य ऋषि से पानी वापस भरने की अपील की। मगर अगस्त्य ने उनके सामने हाथ जोड़ लिए और कहा कि ये उनके बस का नहीं है। धरती पर अकाल का संकट आ गया। सभी देवी-देवता वहां ब्रह्माजी के पास पहुंच गए। ब्रह्मा ने कहा कि जब भागीरथ धरती पर स्वर्ग से गंगा लाने की कोशिश करेंगे, तब समुद्र फिर पानी से भर जाएगा।

जब ऋषि के सामने झुक गया पर्वत

अगस्त्य ऋषि से जुड़ी एक और कथा है। कहते हैं कि एक बार भारत के मध्य में बसे विंध्य पर्वत को मेरु पर्वत से जलन हो गई। वह मेरु पर्वत जितना बड़ा बनना चाहता था। विंध्य पर्वत ने खुद को इतना ऊंचा उठा लिया कि वो आसमान तक जा पहुंचा। इससे सूरज-चंद्रमा सारे छिप गए और धरती पर अंधेरा छाने लगा। तब कुछ लोग अगस्त्य ऋषि के पास आए और इसका उपाय निकालने के लिए कहा।

अगस्त्य ऋषि उस समय उत्तर भारत में रहा करते थे। उन्होंने विंध्य पर्वत से कहा कि नीचे झुको, मुझे दक्षिण की ओर जाना है। ऋषि की महानता को देख विंध्य पर्वत ने तुरंत हामी भर दी और अपना कद छोटा कर दिया। इससे धरती पर फिर से सूरज और चंद्रमा चमकने लगे। ऋषि ने ये भी कहा कि जब तक वे दक्षिण से उत्तर की ओर वापस न लौटें, तब तक वह अपना कद न बढ़ाए। विंध्य पर्वत ने उनकी ये बात भी मान ली। ऋषि अगस्त्य फिर दक्षिण आए और वहीं बस गए। वे कभी उत्तर की ओर नहीं गए और विंध्य पर्वत ने भी अपना कद नहीं बढ़ाया।

मार्शल आर्ट में योगदान

महर्षि अगस्त्य केरल के मार्शल आर्ट कलरीपायट्टु की दक्षिणी शैली वर्मक्कलै के संस्थापक आचार्य एवं आदि गुरु हैं। वर्मक्कलै निःशस्त्र युद्ध कला शैली है। मान्यता के अनुसार भगवान शिव ने अपने पुत्र मुरुगन (कार्तिकेय) को यह कला सिखायी तथा मुरुगन ने यह कला अगस्त्य को सिखायी। महर्षि अगस्त्य ने यह कला अन्य सिद्धरों को सिखायी तथा तमिल में इस पर पुस्तकें भी लिखी। महर्षि अगस्त्य दक्षिणी चिकित्सा पद्धति ‘सिद्ध वैद्यम्’ के भी जनक हैं।

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