स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते |
लभते च तत: कामान्मयैव विहितान्हि तान् || गीता 7/22||

अर्थ : प्रभु कहते हैं कि जो श्रद्धा से युक्त होकर मेरी आराधना करता है, वह मेरे द्वारा बनाए गए भोगों को जरूर प्राप्त करता है ।

व्याख्या : हम भगवान को पाने के लिए उनकी पूजा नहीं करते, बल्कि उनसे कुछ मांगने या अपनी इच्छा को पूरा करने के लिए उनकी पूजा करते हैं। इंसान अपनी ऐसे देवता या परमात्मा की कृपा से टिका लेता है, जिससे उसे अपनी इच्छा की पूर्ति का विश्वास होता है। उसे ही वह इंसान अपना इष्ट मानता है।

इंसान अपनी सारी मुरादें पूरी करने के लिए उसकी पूजा करता रहता है। यहां भगवान कह रहे हैं कि जिस तरह का भोग इंसान चाहता है, उसे मैंने पहले से ही निश्चित कर दिया है। उन मनचाहे भोगों को वह श्रद्धा वाला इंसान जरूर प्राप्त करता है। हालांकि इंसान को यह जानना होगा कि उसकी श्रद्धा उस देवता में कितनी है या उस भोग को पाने के मामले में वह कितना कर्मठ है।

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मैं एक पत्नी होने के साथ साथ गृहिणी एवं माँ भी हुँ । लिखने का हुनर... ब्लॉग लिखती रहती हु... सनातन ग्रुप एक सकारात्मक ऊर्जा, आत्मनिर्भर बनाने की प्रेरणा देती जीवनी, राष्ट्रभक्ति गीत एवं कविताओं की माला पिरोया है । आग्रह :आपको पसन्द आये तो ऊर्जा देने के लिए शेयर एवं अपने सुझाव दीजिए ।

शालू सिंह

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