पुण्य फलिभूत हुआ कल्प है नया
सोने की जीभ मिली
स्वाद तो गया

छाया के आदी हैं गमलों के पौधे
जीवन के मंत्र हुए सुलह और सौदे
अपनी जड़ भूल गई
द्वार की जया

हवा और पानी का अनुकूलन इतना
बंद खिड़किया बाहर की सोचें कितना
अपनी सुविधा से है
आँख में दया

मंजिल दर मंजिल है एक ज़हर धीमा
सीढ़ियाँ बताती हैं घुटनों की सीमा
मुझसे तो ऊंची है
डाल पर बया

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मैं एक पत्नी होने के साथ साथ गृहिणी एवं माँ भी हुँ । लिखने का हुनर... ब्लॉग लिखती रहती हु... सनातन ग्रुप एक सकारात्मक ऊर्जा, आत्मनिर्भर बनाने की प्रेरणा देती जीवनी, राष्ट्रभक्ति गीत एवं कविताओं की माला पिरोया है । आग्रह :आपको पसन्द आये तो ऊर्जा देने के लिए शेयर एवं अपने सुझाव दीजिए ।

शालू सिंह

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