प्राण तुम्हारी पदरज फूली
मुझको कंचन हुई तुम्हारे चंचल चरणों की यह
धूली!

आईं थीं तो जाना भी था–
फिर भी आओगी‚ दुख किसका?
एक बार जब दृष्टिकरों से पदचिन्हों की रेखा
छू ली!

वाक्य अर्थ का हो प्रत्याशी‚
गीत शब्द का कब अभिलाषी?
अंतर में पराग सी छाई है स्मृतियों की आशा
धूली!
प्राण तुम्हारी पदरज फूली!

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मैं एक पत्नी होने के साथ साथ गृहिणी एवं माँ भी हुँ । लिखने का हुनर... ब्लॉग लिखती रहती हु... सनातन ग्रुप एक सकारात्मक ऊर्जा, आत्मनिर्भर बनाने की प्रेरणा देती जीवनी, राष्ट्रभक्ति गीत एवं कविताओं की माला पिरोया है । आग्रह :आपको पसन्द आये तो ऊर्जा देने के लिए शेयर एवं अपने सुझाव दीजिए ।

शालू सिंह

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