सूट पहन कर हाथी दादा
चौराहे पर आए,
रिक्शा एक इशारा कर के
वे तुरंत रुकवाए।

चला रही थी हाँफ–हाँफ कर
रिक्शा एक गिलहरी
बोले हाथी दादा मैडम
ले चल मुझे कचहरी।

तब तरेर कर आँखें वह
हाथी दादा से बोली,
लाज नहीं आती है तुमको
करते हुए ठिठोली।

अपना रिक्शा करूँ कबाड़ा
तुमको यदि बैठा लूँ
जान बूच कर क्यों साहब
मैं व्यर्थ मुसीबत पालूँ?

माफ करो गुस्ताखी मिस्टर
कोई ट्रक रुकवाओ
तब तुम उस पर बड़े ठाठ से
बैठ कचहरी जाओ।

, , , , , , , , , ,

मैं एक पत्नी होने के साथ साथ गृहिणी एवं माँ भी हुँ । लिखने का हुनर... ब्लॉग लिखती रहती हु... सनातन ग्रुप एक सकारात्मक ऊर्जा, आत्मनिर्भर बनाने की प्रेरणा देती जीवनी, राष्ट्रभक्ति गीत एवं कविताओं की माला पिरोया है । आग्रह :आपको पसन्द आये तो ऊर्जा देने के लिए शेयर एवं अपने सुझाव दीजिए ।

शालू सिंह

🙏 सकारात्मक जानकारी को फेसबुक पर पाने के लिए लाइक करें 👇

Leave a Reply