धर्मग्रंथो के अनुसार सूर्य की पत्नी संज्ञा की छाया के गर्भ से शनि देव का जन्म हुआ, जब शनि देव छाया के गर्भ में थे तब छाया भगवान शंकर की भक्ति में इतनी ध्यान मग्न थी की उसने अपने खाने पिने तक शुध नहीं थी जिसका प्रभाव उसके पुत्र पर पड़ा और उसका वर्ण श्याम हो गया !शनि के श्यामवर्ण को देखकर सूर्य ने अपनी पत्नी छाया पर आरोप लगाया की शनि मेरा पुत्र नहीं हैं ! तभी से शनि अपने पिता से शत्रु भाव रखते थे ! शनि देव ने अपनी साधना तपस्या द्वारा शिवजी को प्रसन्न कर अपने पिता सूर्य की भाँति शक्ति प्राप्त की और शिवजी ने शनि देव को वरदान मांगने को कहा, तब शनि देव ने प्रार्थना की कि युगों युगों में मेरी माता छाया की पराजय होती रही हैं, मेरे पिता सूर्य द्वारा अनेक बार अपमानित किया गया हैं ! अतः माता की इच्छा हैं कि मेरा पुत्र अपने पिता से मेरे अपमान का बदला ले और उनसे भी ज्यादा शक्तिशाली बने ! तब भगवान शंकर ने वरदान देते हुए कहा कि नवग्रहों में तुम्हारा सर्वश्रेष्ठ स्थान होगा ! मानव तो क्या देवता भी तुम्हरे नाम से भयभीत रहेंगे !

शनैश्चरस्तवराजः के पाठ से शनि दशा में हो रही परेशानियों से मुक्ति मिलती है ।

|| शनैश्चरस्तवराजः ||

नारद उवाच ॥

ध्यात्वा गणपतिं राजा धर्मराजो युधिष्ठिरः ।

धीरः शनैश्चरस्येमं चकार स्तवमुत्तमम् ॥ १॥

शिरो मे भास्करिः पातु भालं छायासुतोऽवतु ।

कोटराक्षो दृशौ पातु शिखिकण्ठनिभः श्रुती ॥ २॥

घ्राणं मे भीषणः पातु मुखं बलिमुखोऽवतु ।

स्कन्धौ संवर्तकः पातु भुजौ मे भयदोऽवतु ॥ ३॥

सौरिर्मे हृदयं पातु नाभिं शनैश्चरोऽवतु ।

ग्रहराजः कटिं पातु सर्वतो रविनन्दनः ॥ ४॥

पादौ मन्दगतिः पातु कृष्णः पात्वखिलं वपुः ।

रक्षामेतां पठेन्नित्यं सौरेर्नामबलैर्युताम् ॥ ५॥

सुखी पुत्री चिरायुश्च स भवेन्नात्र संशयः ।

सौरिः शनैश्चरः कृष्णो नीलोत्पलनिभः शनिः ॥ ६॥

शुष्कोदरो विशालाक्षो दुर्निरीक्ष्यो विभीषणः ।

शिखिकण्ठनिभो नीलश्छायाहृदयनन्दनः ॥ ७॥

कालदृष्टिः कोटराक्षः स्थूलरोमावलीमुखः ।

दीर्घो निर्मांसगात्रस्तु शुष्को घोरो भयानकः ॥ ८॥

नीलांशुः क्रोधनो रौद्रो दीर्घश्मश्रुर्जटाधरः ।

मन्दो मन्दगतिः खंजो तृप्तः संवर्तको यमः ॥ ९॥

ग्रहराजः कराली च सूर्यपुत्रो रविः शशी ।

कुजो बुधो गुरुः काव्यो भानुजः सिंहिकासुतः ॥ १०॥

केतुर्देवपतिर्बाहुः कृतान्तो नैरृतस्तथा ।

शशी मरुत्कुबेरश्च ईशानः सुर आत्मभूः ॥ ११॥

विष्णुर्हरो गणपतिः कुमारः काम ईश्वरः ।

कर्ता हर्ता पालयिता राज्यभुग् राज्यदायकः ॥ १२॥

छायासुतः श्यामलाङ्गो धनहर्ता धनप्रदः ।

क्रूरकर्मविधाता च सर्वकर्मावरोधकः ॥ १३॥

तुष्टो रुष्टः कामरूपः कामदो रविनन्दनः ।

ग्रहपीडाहरः शान्तो नक्षत्रेशो ग्रहेश्वरः ॥ १४॥

स्थिरासनः स्थिरगतिर्महाकायो महाबलः ।

महाप्रभो महाकालः कालात्मा कालकालकः ॥ १५॥

आदित्यभयदाता च मृत्युरादित्यनन्दनः ।

शतभिरुक्षदयिता त्रयोदशीतिथिप्रियः ॥ १६॥

तिथ्यात्मा तिथिगणनो नक्षत्रगणनायकः ।

योगराशिर्मुहूर्तात्मा कर्ता दिनपतिः प्रभुः ॥ १७॥

शमीपुष्पप्रियः श्यामस्त्रैलोक्याभयदायकः ।

नीलवासाः क्रियासिन्धुर्नीलाञ्जनचयच्छविः ॥ १८॥

सर्वरोगहरो देवः सिद्धो देवगणस्तुतः ।

अष्टोत्तरशतं नाम्नां सौरेश्छायासुतस्य यः ॥ १९॥

पठेन्नित्यं तस्य पीडा समस्ता नश्यति ध्रुवम् ।

कृत्वा पूजां पठेन्मर्त्यो भक्तिमान्यः स्तवं सदा ॥ २०॥

विशेषतः शनिदिने पीडा तस्य विनश्यति ।

जन्मलग्ने स्थितिर्वापि गोचरे क्रूरराशिगे ॥ २१॥

दशासु च गते सौरौ तदा स्तवमिमं पठेत् ।

पूजयेद्यः शनिं भक्त्या शमीपुष्पाक्षताम्बरैः ॥ २२॥

विधाय लोहप्रतिमां नरो दुःखाद्विमुच्यते ।

बाधा याऽन्यग्रहाणां च यः पठेत्तस्य नश्यति ॥ २३॥

भीतो भयाद्विमुच्येत बद्धो मुच्येत बन्धनात् ।

रोगी रोगाद्विमुच्येत नरः स्तवमिमं पठेत् ॥ २४॥

पुत्रवान्धनवान् श्रीमान् जायते नात्र संशयः ॥ २५॥

नारद उवाच ॥

स्तवं निशम्य पार्थस्य प्रत्यक्षोऽभूत् शनैश्चरः ।

दत्त्वा राज्ञे वरः कामं शनिश्चान्तर्दधे तदा ॥ २६॥

॥ इति श्री भविष्यपुराणे शनैश्चरस्तवराजः सम्पूर्णः ॥

मैं एक पत्नी होने के साथ साथ गृहिणी एवं माँ भी हुँ । लिखने का हुनर... ब्लॉग लिखती रहती हु... सनातन ग्रुप एक सकारात्मक ऊर्जा, आत्मनिर्भर बनाने की प्रेरणा देती जीवनी, राष्ट्रभक्ति गीत एवं कविताओं की माला पिरोया है । आग्रह :आपको पसन्द आये तो ऊर्जा देने के लिए शेयर एवं अपने सुझाव दीजिए ।

शालू सिंह

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