केदारनाथ मंदिर – हिमालय तू केदार

केदारनाथ धाम भारत के उत्तराखंड में केदारनाथ की मंदाकिनी नदी के पास वाली घरवाल हिमालय पर्वत श्रुंखालओ पर बना हुआ है। बहुत ठंडा मौसम होने के कारण यह मंदिर अप्रैल (अक्षय तृतीया) से कार्तिक पूर्णिमा (साधारणतः नवम्बर) तक ही खुला रहता है।

चरम सर्दियों के मौसम में केदारनाथ भगवान शिव की मूर्ति को उखीमठ ले जाया जाता है और वहाँ 6 महीनो तक उनकी पूजा की जाती है।

हिंदु धर्म में भगवान शिव का बहुत ऊँचा स्थान है | भगवान शिव के भगत शिव को अलग अलग रुपों में भारत के अलग अलग स्थानों में पूजा जाता है।

भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग है जिनमें से एक है केदरानाथ | भगतों की केदारनाथ धाम से जुडी अटूट आस्था है |

इनके अनुसार केदारनाथ धाम के दर्शन करने वाले भगत की हर मनोकामना तो पूरी होती ही है साथ ही मोक्ष की प्राप्ति होती है ।

केदारनाथ धाम का हिंदु धर्म में इतनी आस्था क्यों है इसके बारे में आपको निचे विस्तार से बताते है –

केदारनाथ मंदिर का इतिहास – History of Kedarnath Temple

यह हम सब जानते है केदारनाथ धाम भगवान शिव को समर्पित हिन्दू मंदिर है।

भगवान शिव यहाँ ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए थे और मन्दिर की पूजा श्री केदारनाथ द्वादश ज्योतिर्लिगों में से एक माना जाता है।

यह प्राचीन और पवित्र मंदिर रुन्द्र हिमालय की श्रुंखलाओ पर स्थापित है |

केदारनाथ मंदिर का निर्माण कब हुआ और इस मन्दिर का निर्माण किसने कराया, इसका कोई प्रामाणिक उल्लेख नहीं मिलता है,पुराणों में वर्णित मान्यताओं के अनुसार महाभारत की लड़ाई के बाद पाण्डवों को जब अपने ही भाइयों के मारे जाने पर भारी दुख हुआ तो वे पश्चाताप करने के लिए केदार की इसी भूमि पर आ पहुंचे, कहते हैं उनके ही द्वारा इस मंदिर की स्थापना हुई थी जिसकी कथा कुछ इस प्रकार से है :-

पंचकेदार की कथा ऐसी मानी जाती है कि महाभारत के युद्ध में विजयी होने पर पांडव भ्रातृहत्या का पाप के भोझ से चिंतित थे और इस पाप से मुक्ति पाना चाहते थे। इसके लिए वे भगवान शंकर का आशीर्वाद पाना चाहते थे, लेकिन भगवान शिव लोगों से रुष्ट थे।

इसलिए भगवान शंकर अंतर्ध्यान होकर केदार में जा बसे। पांडव उनका पीछा करते-करते केदार पहुंच गए।

भगवान शिव ने तब बैल का रूप धारण कर लिया और वे अन्य पशुओं में जा मिले। अत: भीम ने अपना विशाल रूप धारण कर दो पहाडों पर पैर फैला दिया।

अन्य सब गाय-बैल और भैंसे तो निकल गए, पर शंकर जी रूपी बैल भीम के पैर के नीचे से जाने को तैयार नहीं हुए।

भीम बलपूर्वक इस बैल पर झपटे, लेकिन बैल भूमि में अंतर्ध्यान होने लगा। तब भीम ने बैल की त्रिकोणात्मक पीठ का भाग पकड़ लिया।

भगवान शिव पांडवों की भक्ति, दृढ संकल्प को देखकर प्रसन्न हो गए। उन्होंने तत्काल दर्शन देकर पांडवों को पाप मुक्त कर दिया।

उसी समय से भगवान शिव बैल की पीठ की आकृति-पिंड के रूप में श्री केदारनाथ में पूजे जाते हैं।

लेकिन ऐसी मान्यता है कि इसकी स्थापना आदि गुरु शंकराचार्य ने की थीने दसवीं ईसवी में करवाया था | कहा जाता है की यह मंदिर जो 400 वर्षों तक बर्फ में दबा रहा था |

केदारनाथ से जुड़ी एक और मान्यत्ता है की रुद्रप्रयाग जिले के इस स्थान पर भगवान विष्णु के रुप नर और नारायण ने इसी जगह तपस्या की थी |

उनके प्रार्थनानुसार ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा वास करने का वर प्रदान किया। यह स्थल केदारनाथ पर्वतराज हिमालय के केदार नामक श्रृंग पर अवस्थित है।

यही नर नारायण द्वापर युग में अर्जुन और कृष्ण के रुप में अवतरित हुए थे।

हजारो साल पुराना यह मंदिर विशाल पत्थरो से बना हुआ है। मंदिर की सीढियों पर हमें प्राचीन शिलालेख भी दिखाई देते है।

मंदिर के पवित्र स्थल की आंतरिक दीवारे पौराणिक कथाओ और बहुत से देवी-देवताओ की चित्रकला से विभूषित है।

प्रतिष्टित मंदिर की उत्पत्ति के प्रमाण हमें महान महाकाव्य महाभारत में दिखाई देते है।

भगवान शिव के इस मंदिर का क्यों पड़ा नाम ‘केदारनाथ धाम – Kedarnath Dham’

पौराणिक कथाओं के अनुसार असुर देवताओं का विनाश करना चाहते थे | असुरों से बचने के लिए देवताओं ने भगवान शिव से उनकी रक्षा करने के लिए प्रार्थना की थी।

इसी कारण भगवान शिव बैल के रूप में अवतरित हुए। इस बैल का नाम था ‘कोदारम’ जो असुरों का सम्पूर्ण विनाश करने की ताकत रखता था।

बैल रुपी शिव के सींग और खुरों से असुरों का सर्वनाश हुआ था जिन्हें भगवान शिव ने मंदाकिनी नदी में फेंक दिया था। उसी कोदारम नाम से लिया गया है केदारनाथ धाम का नाम।

केदारनाथ धाम मंदिर 3581 मीटर की ऊंचाई पर स्तीथ है, मंदिर तक जाने के लिए गौरीकुंड से होकर जाना पड़ता है | इसमें आपको 21 किलोमीटर की पहाड़ी यात्रा करनी पड़ती है।

केदारनाथ मंदिर 85 फुट ऊंचा, 187 फुट लंबा और 80 फुट चौड़ा है। इसकी दीवारें 12 फुट मोटी हैं और बेहद मजबूत पत्थरों से बनाई गई है। मंदिर को 6 फुट ऊंचे चबूतरे पर खड़ा किया गया है।

केदारनाथ धाम से जुडी पौराणिक कथा – Kedarnath Story in Hindi

‘स्कंद पुराण’ में भगवान शिव माता पार्वती से कहते हैं, ‘हे प्राणेश्वरी! यह क्षेत्र उतना ही प्राचीन है, जितना कि मैं हूं। मैंने इसी स्थान पर सृष्टि की रचना के लिए ब्रह्मा के रूप में परब्रह्मत्व को प्राप्त किया, तभी से यह स्थान मेरा चिर-परिचित आवास है। यह केदारखंड मेरा चिरनिवास होने के कारण भू-स्वर्ग के समान है।

केदारखंड में उल्लेख है, ‘अकृत्वा दर्शनम् वैश्वय केदारस्याघनाशिन:, यो गच्छेद् बदरी तस्य यात्रा निष्फलताम् व्रजेत्’ अर्थात् बिना केदारनाथ भगवान के दर्शन किए यदि कोई बदरीनाथ क्षेत्र की यात्रा करता है तो उसकी यात्रा व्यर्थ हो जाती है।

केदारनाथ मंदिर से जुड़ी अहम बातें – Facts about Kedarnath Dham

उत्तराखंड में स्थित तीर्थस्थल केदारनाथ भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग में से एक है और उत्तराखंड के चार धामों में से एक है।

दीपावली महापर्व के दूसरे दिन (पड़वा) के दिन शीत ऋतु में मंदिर के द्वार बंद कर दिए जाते हैं। 6 माह तक दीपक मंदिर के अन्दर जलता रहता है। पुरोहित ससम्मान केदारनाथ के कपाट बंद कर भगवान के विग्रह एवं दंडी को 6 माह तक पहाड़ के नीचे ऊखीमठ में ले जाते हैं।

6 माह मंदिर और उसके आसपास कोई नहीं रहता है, यहाँ रहने वाले लोगो को बापिस निचे भेज दिया जाता है | बस कुछ ही साधु संतो को यहाँ रहने की अनुमति दी जाती है | जिनको फौज वहां रहने के लिए जरुरी सामान दे दिया जाता है |

उत्तराखंड में भगवान बद्रीनाथ के दर्शन बिना केदारनाथ के दर्शन भी अधूरे माने जाते है। इसलिए बद्रीनाथ जाने वाले भक्त पहले केदारनाथ जाते है।

केदारनाथ के कपाट भी साल में केवल अप्रैल से नवंबर महीने तक ही खुलते है। मई माह में केदारनाथ के कपाट खुलते हैं तब उत्तराखंड की यात्रा आरंभ होती है।

केदारनाथ मंदिर की आयु के ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है लेकिन तथ्यों के अनुसार केदारनाथ यात्रा पिछले एक हजार साल से चली आ रही है।

यह भी माना जाता है कि केदारनाथ मंदिर का निर्माण आदि गुरु शँकराचार्य ने करावाया था।

केदारनाथ का ये मंदिर पंच केदार का हिस्सा है जो पांच धार्मिक स्थल भगवान शिव को समर्पित हैं। ये सभी गढ़वाल हिमालय में स्तिथ हैं। जो भी पंच केदार की यात्रा करता है उसे सबसे पहले केदारनाथ, तुंगनाथ, फिर रुद्रनाथ और मध्यमाहेश्वर और फिर आखिर में कल्पेश्वर के दर्शन करने होते हैं।

भगवान शिव ने जब बैल रुप धारण किया था तो उनका पीठ का भाग यहां पर प्रकट हुआ था। जबकि उनके धड़ के ऊपर का भाग काठमाण्डू में प्रकट हुआ था जहां पर भगवान शिव पशुपतिनाथ के रुप में पूजे जाते है।

यहां पर नर नारायण की तपस्या के बाद भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया था कि वो यहां ज्योंतिर्लिंग के रुप में सदैव यहाँ वास करेंगे।

केदारनाथ से जुड़ा एक तथ्य ये भी है कि बाबा भैरो नाथ केदारनाथ मंदिर की रक्षा करते हैं। ये केदारनाथ मंदिर के करीब है और जब मंदिर सर्दियों में ६ महीने के लिए बंद रहता है तब केदारनाथ की रक्षा करने के लिए भैरोनाथ मौजूद रहते हैं। इसीलिए जब केदारनाथ के दर्शन को श्रद्धालु जाते हैं तो भैरोनाथ के दर्शन जरूर करते हैं।

मैं एक पत्नी होने के साथ साथ गृहिणी एवं माँ भी हुँ । लिखने का हुनर... ब्लॉग लिखती रहती हु... सनातन ग्रुप एक सकारात्मक ऊर्जा, आत्मनिर्भर बनाने की प्रेरणा देती जीवनी, राष्ट्रभक्ति गीत एवं कविताओं की माला पिरोया है । आग्रह :आपको पसन्द आये तो ऊर्जा देने के लिए शेयर एवं अपने सुझाव दीजिए ।

शालू सिंह

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