कुछ लोग अपनी जिंदगी में ऐसा मुकाम हासिल कर लेते हैं कि उन पर विश्वास ही नहीं होता है। लगता है ऐसा तो हो ही नहीं सकता। ऐसे इंसान ने इतनी लंबी दूरी कैसे तय कर ली। एक पिता का ना होना उसके बच्चों से पुछो कितना दुखदायी है। अपने बच्चों के पालन-पोषण के लिए उसकी मां को दिन-रात मेहनत करना पड़ता है तब जाकर वह अपने बच्चों की जरूरतों को पूरा करती है। यह कहानी अनाथ आश्रम में पलने वाले एक लड़के की है जिसके पिता नहीं थे फिर भी उनकी मां ने मेहनत किया और 6 बच्चों को सम्भाला। उन बच्चों में से एक बच्चा “अब्दुल” है जो 17 वर्ष की उम्र तक अनाथालय में पला-बड़ा और IAS ऑफिसर बना। आज 32 साल बाद अब्दुल ने केरल के कोल्लम जिले में कलेक्टर का पद ग्रहण किया।

केरल के थालासेरी में एक आश्रय गृह से आईएएस अधिकारी बनने की उनकी आकर्षक यात्रा उन लोगों के लिए प्रेरणा है जो अपने जीवन में गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।

नासर (Nasar) सिर्फ पांच साल के थे जब उनके पिता गुजर गयें और उनकी मां के ऊपर उनके 6 बच्चों के लालन-पालन का जिम्मा आ गया। इनकी मां ने खुद को अलग कर लिया। वह चाहती थी कि उसके बच्चे अच्छी नौकरी पाने के लिए पढ़ाई करें और सफल इंसान बनें। इसे हासिल करने के लिए उन्होंने थालासेर (Thalassery) में नौकरी की। छह बच्चों की देखरेख करने वाली विधवा माँ के लिए काम को संतुलित करना निश्चित रूप से एक आसान काम नहीं था। घर का काम खत्म कर डयूटी पर जाना और घर आने के बाद यहां का काम देखना सब कठिन था। कुछ लोगो ने और शुभचिंतकों के आग्रह पर उन्होंने अपने सबसे छोटे बेटे अब्दुल (Abdul) को स्थानीय अनाथालय (Local oraphanage) में भेजने का फैसला किया।

हमारे माता-पिता हमें एक अच्छा जीवन प्रदान करने के लिए बहुत मेहनत करते हैं। एक बच्चे के रूप में Nasar ने वास्तव में उतना संघर्ष नहीं किया जितना उनकी माँ ने किया।

अब्दुल नासर बी

अब्दुल नासर ( Abdul Nasar) जब थालासेरी अनाथालय में भर्ती हुयें तब वह सिर्फ 5 वर्ष के थे और संघर्ष का जीवन व्यतीत करना नहीं जानते थे। जिंदगी के इस मोड़ पर क्या सही है क्या गलत, यही भी अच्छे से नहीं पता था। वह तो अनाथालय में थे लेकिन बड़ा भाई और 4 बहनें अम्मा के साथ रहती थी, जिससे कम लोग के कारण परिवार का भरन-पोषण थोड़ी आसानी से हो सके। नसर की बहनों ने अम्मा के साथ बीड़ी (एक सस्ती सिगरेट) कार्यकर्ता के रूप में काम किया और इनके भाई ने मजदूर का काम किया। नासर को उनके परिवार ने कहा था कि वह अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करें।

एक I कियाAS ऑफिसर ने प्रेरित

यह नासर के लिए यह समय बहुत कठिन था क्योंकि वह अभी इस व्यवस्था को समझने के लिए बहुत छोटा थे। लेकिन उन्होंने अपने नए परिवेश के साथ तालमेल बिठाने की कोशिश की। अपनी दिन भर की कक्षाओं में सबसे अधिक समय देते थे। अनाथालय में इन-हाउस प्राइमरी (In House Primary) और हाई स्कूल (High school) की कक्षाएं थीं। इसलिए इनकी मां ने अपने बेटे को शिक्षा प्राप्त करने यहां भेजा था। पांच साल बाद एक आईएएस अधिकारी ने आश्रय का दौरा किया और नासर को प्रेरित किया।

आईएएस बनने का किया फैसला

IAS अधिकारी उस समय तक का सबसे चतुर व्यक्ति था जिससे Nasar मिलें। वह आत्मविश्वास के साथ चलते थे और उनके द्वारा किया गया हल्का इशारा उनके आसपास के लोगों के लिए पर्याप्त निर्देश था कि वे क्या चाहते हैं। सिर्फ 10 साल के बच्चे के लिए यह अनुग्रह उस चीज से परे था जिसकी नासर कभी कल्पना भी नहीं कियें थे वह उनके साथ हो रहा था। उस दिन नासर ने एक IAS अधिकारी बनने का फैसला किया। उस IAS अधिकारी का नाम अमिताभ कांत (Amitabh Kant) है, जो केवल 2 साल सिविल सर्विसेज में थे। जब उन्होंने थालासेरी अनाथालय का दौरा किया और तत्कालीन 10 वर्षीय नासर को अपने नक्शेकदम पर चलने के लिए प्रेरित किया।

अतिथी देवो भव

अमिताभ 1980 बैच के एक IAS जो वर्तमान में NITI Aayog के सीईओ हैं। यह सिविल सेवक के रूप में अपने लंबे समय के करियर में “अतुल्य भारत” (Incredible India) और “गॉड्स ओन कंट्री” ( Gods Own Country) जैसे कई पर्यटन अभियानों का नेतृत्व कर चुके हैं – केरल का वर्णन बेहद लोकप्रिय है। उन्होंने एक ऐसे अभियान की भी परिकल्पना की, जिसने पर्यटन उद्योग में हर क्षेत्र को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की पर्यटन छवि को संवारने के लिए कार्य किया है। आव्रजन अधिकारियों (Immigratiom Officer) से लेकर टैक्सी चालकों (Taxi Driver) तक को कांत ने देश को एक पसंदीदा पर्यटन स्थल के रूप में बढ़ावा देने के लिए सभी को एक समान भागीदार बनाया। यह अभियान, बेतहाशा लोकप्रिय हुआ है “अतिथि देवो भव” जो सभी के लिए परिचित है।

किया रेस्टोरेंट में काम

हालांकि आने वाले वर्षों में युवा Nasar को पैसा कमाने में अधिक रुचि होने लगी और आईएएस अधिकारी बनने का सपना कई बार लड़खड़ाया। उन्होंने अनाथालय से चुपके और कुछ 30-40 किलोमीटर कन्नूर (Kannur) की यात्रा के लिए मन बनाया। वहां होटल और रेस्टोरेंट में नौकरी करना युवा लड़को के लिए आसान था। वह कुछ दिनों के लिए वहां काम करने लगे और जब कुछ गलत हुआ तो बिना किसी नसर की गलती के कारण रेस्टरान के मालिक ने उन्हें डांटा। यह बात उन्हें बहुत बुरी लगी और वह अपनी मजदूरी लियें और अनाथालय के लिए रवाना हो गए। उस समय वह अपनी शिक्षा पूरी करने के लिए उत्सुक नहीं थे लेकिन उनका परिवार अपने फैसले पर अडिग था।

पार्ट टाइम जॉब किया

STD बूथ ऑपरेटर, अखबार वितरक और एक डिलीवरी बॉय के रूप में अंशकालिक काम करते हुए, नासर ने अंग्रेजी साहित्य में अपने BA और MA की डिग्री के लिए आवश्यक पुस्तकों को खरीदने के लिए पैसे बचाए। अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद 1995 में उन्हें केरल स्वास्थ्य विभाग (Keral Health Department) में एक जूनियर हेल्थ इंस्पेक्टर ( Junior Health Inspector) के रूप में नौकरी मिली। यह वह वर्ष भी था जब नासर ने रुक्साना (Ruksana) से शादी की, उनकी पत्नी ने ही उन्हें आगे बढ़कर नागरिक सेवाओं के लिए प्रेरित किया।

बने डिप्टी कलक्टर

नासर ने बताया कि अम्मा पहली महिला थीं जिन्होंने मुझे अध्ययन करने के लिए प्रोत्साहित किया और रुक्साना दूसरी महिला थी। जब-जब मेरा दृढ़ संकल्प लड़खड़ाया इन दोनों ने मुझे संभाला। वह जोर देकर कहती रही कि मुझे कलेक्टर बनना चाहिए और मुझे बेहतर करने के लिए उकसाया। उस वर्ष केरल राज्य सिविल सेवा कार्यकारी ने डिप्टी कलेक्टर के पद के लिए आवेदन आमंत्रित किए थे। हजारों आवेदन होने जा रहे थे और यद्यपि मैंने अध्ययन नहीं किया था, तो मुझे यकीन था कि मुझे चुना नहीं जाएगा। जूनियर टाइम स्केल की स्थिति में प्रशिक्षण, परिवीक्षा और उनकी नियुक्ति को पूरा होने में लगभग 10 साल लग गए और नासर को 2006 में डिप्टी कलेक्टर ( Depty Collector) के रूप में नियुक्त किया गया।

मैं एक पत्नी होने के साथ साथ गृहिणी एवं माँ भी हुँ । लिखने का हुनर... ब्लॉग लिखती रहती हु... सनातन ग्रुप एक सकारात्मक ऊर्जा, आत्मनिर्भर बनाने की प्रेरणा देती जीवनी, राष्ट्रभक्ति गीत एवं कविताओं की माला पिरोया है । आग्रह :आपको पसन्द आये तो ऊर्जा देने के लिए शेयर एवं अपने सुझाव दीजिए ।

शालू सिंह

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