Ham Ajadi Ke Rakhawale-हम आजादी के रखवाले

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हम आजादी के रखवाले बाधाओं की परवाह नहीं।
हम भारत माँ के सुत प्यारे पद यश की हमको चाह नहीं।

हम उस कानन के वासी हैं आजादी जिसमें खिलती है
समरस जीवन की गंगा की धाराएँ पग -पग मिलती हैं।
हम शाश्वत पथ के राही हैं छल कपट हमारी राह नहीं
हम भारत माँ के सुत प्यारे॥१॥

हम शान्ति प्रणेता शक्ति सुवन सत् पथ पर निशिदिन बढ़ते हैं
गिरि पर्वत नदी दरारों में हम निर्भय होकर चलते हैं
लहरों की छाती चीर चले कुछ संकट सिन्धु अथाह नहीं
हम भारत माँ के सुत प्यारे॥२॥

मुस्काते हरदम रहते हैं मन में सुलगाये चिनगारी
आदर्शो की भीषण ज्वाला भस्मित करती जड़ता सारी
पर अमृत हम छलकाते हैं फैलाते अन्तदहि नहीं
हम भारत माँ के सुत प्यारे ॥३॥

hama ājādī ke rakhavāle bādhāoṁ kī paravāha nahīṁ |
hama bhārata mā ke suta pyāre pada yaśa kī hamako cāha nahīṁ |

hama usa kānana ke vāsī haiṁ ājādī jisameṁ khilatī hai
samarasa jīvana kī gaṁgā kī dhārāe paga -paga milatī haiṁ |
hama śāśvata patha ke rāhī haiṁ chala kapaṭa hamārī rāha nahīṁ
hama bhārata mā ke suta pyāre ||1||

hama śānti praṇetā śakti suvana sat patha para niśidina baṛhate haiṁ
giri parvata nadī darāroṁ meṁ hama nirbhaya hokara calate haiṁ
laharoṁ kī chātī cīra cale kucha saṁkaṭa sindhu athāha nahīṁ
hama bhārata mā ke suta pyāre ||2||

muskāte haradama rahate haiṁ mana meṁ sulagāye cinagārī
ādarśo kī bhīṣaṇa jvālā bhasmita karatī jaṛatā sārī
para amṛta hama chalakāte haiṁ phailāte antadahi nahīṁ
hama bhārata mā ke suta pyāre ||3||

आओ !देखो! भारत के प्राणो में क्या उन्माद भरा है ।
शासन के प्रतिबन्ध व्यर्थ है,और व्यर्थ है सब धारायें ,
उन्हें तोङकर जनता के स्वर गुज रही हैं सभी दिशाएँ ।
नारी कंण्ठ पुकार रही है ,उनके उपर हो रहे जुर्म मिटाओ ,
जनता दाँत पिसती जाती , बंद हथेली उसकी खुल जाती ।
पर नेता के शासन में,देश की जनता चुप बैठकर आज तमाशा देखती जाती ।
एक हाथ जब उठता था,किसी देश भक्त नेता का, हाथ हजारो उठ जाते थे ,
पर जब आज का नेता अपना हाथ उठाता है ,जनता के दुसरे हाथ में जूता-चप्पल उठ जाता है ।
एक बार यदी उठ जाती, मिलकर आवाज ईस धरा से आती ।
रख देती वह पीस भ्रश्टाचारी लोगो को, चटनी कर उसको खाती ।
उठ नहीं रही है आवाज ईस धरा से,मैं क्या समझूँ सबको सूँघ गया है साँप ।
आजाद देश की जनता हो गयी गुलाम, सरकारी कुत्ते जनता के चुने नुमाईन्दे हो गये है साँप ।
सोचो, क्यो लोग अकारण ,आज गुलामी को अपनी ही मजबुरी बताएँ ।
क्यों न हिन्दूस्तान की जनता मिलकर करे विरोध, सब अपना रोष जताएँ ।
क्या हो गया है ,आज के ईस भारत को,यह भी चाहिए,वह भी चाहिए,सब कुछ चाहिए ।
भुजा(हाथ)उठा कर नेता जनता से बोले,हमें सिर्फ़ वोट चाहिए वोट चाहिए ।
आज देश की जनता की उठी भुजाएँ बोली,हमें सिर्फ़ नोट चाहिए नोट चाहिए ।
पर सोचो ऎसे में इस देश क्या होगा, वह दिन दुर नहीं जब ब्लैक मनी सबकी जेब में होगा ।
लाख तुम धर्मनिती की बाते कह डालो , फिर भी ब्लैक मनी कमाऊँगा ही ।
और देश के लिए कुछ कर न सका तो क्या,अपनी सात पुश्ते बिठा कर खिलाऊँगा ही ।
भरा कहाँ है, घडा पाप का उसको और भरना है, हर हिन्दूस्तानी को गुलाम बनाकर रखना है ।
क्यों अपनी पुण्य-भूमि को अपने ही पापी दल करें कलंकित ?
क्यों सच का दमन करें ये भोली-भाली जनता को करें आतंकित ?
क्यों न बम से जला देते,उन भ्रश्टाचारी लोगों को, निर्दोष को बनाते अपना निशाना ।
एक बार तो हमको दम दिखलाना ही होगा, अब नहीं चलेगा कोई बहाना ।
क्या हो गया है ईस आजाद देश को,भ्रष्टाचार नंगा नाच रहा है ।
भारत देश की जनता कि यह कैसी खामोशी ,सब कुछ भौचक्का देख रही है ।
मैंने तो संकल्प कर लिया है, मरना तो है ही फ़िर डर-डर कर क्यों जिना ।
ब्यर्थ है अपनो का मोह, छोड.प्राण के पंछी सभी को एक दिन है जाना ।
भूल न पायें जिसको सदियाँ, ऎसी क्रान्ती ज्योंति लेखनी जनता तक पहूँचाऊगा ।
अगर बे मौत मर गया तो,इस शासन की जड. भी हिल जायगी ।
मेरी क्रान्ती ज्योंति से आजाद हिन्दूस्तान के जीवन की फ़ुलवारी-सी खिल जायेगी ।
यह मिट्टी जो अमर शहिदों की, अपबित्र हो गयीं है भ्र्ष्टाचारी लोगों से ।
उसकी आजादी के लिए ,इस पर प्राण निछावर करते मन न तनिक हिचके ।
यह डर निकाल फेंको तुम अपने जीवन से, नहीं अधिकार और किसी का मेरे जीवन पर ।
भुल कर भी मत देना अधिकार अपने जीवन के ,जोर नहीं और किसी का मेरे जीवन पर ।
धिक्कार है ऎसे जीवन को जहाँ ,आजादी का कोई मोल नहीं ।
चिकनी-चुपडी. बातों से ईस देश का, अब उध्द्दार नहीं ।
ईन्सानों के दिलों में अब कोई देश प्रेंम का मोंल नहीं ।
जब से हिन्दूस्तान की आजादी को, बेईमानों ने अपना आशियाना बनाया ।
तब से अब तक एक भी माँई का लाल , लाल बहादुर , नेता सुभाष नहीं आया ।
भाषण से ही जनता को बेवकुफ़ बनाया जाता ,वहीं दुसरे दीन मिडियाँ और प्रेंस में दिखाया जाता ।

jay hind yadav | Sep 2 2011 – 15:59

{ रीमिक्श राश्र्टीय़ गीत } लीडर १.
अपनी आजादी को हम भुला सकते हैं , लेकिन देश को बर्बादी से बचा सकते नहीं !
हमने कई वर्षो के बाद ये कुर्सी पायी है , सैकडो गरीबो का खून चूँस कर ये दौलत कमाई है !
न जाने कितने सुहागनो का सुहाग हमने जन्नत में पहुचायी है !
खाक में अपनो की ईज्जत मिला सकते लेकिन है , देश को वर्वादी से बचा सकते नही !
अपनी आजादी को याद तो कर सकते है , लेकिन देश के लिए कुछ कर सकते नहीं !
क्या चलेगी , दुसरो की मर्जी मेरी गुन्डा गर्दी के सामने !
लाखों की रिश्वत लेकर अगर आये कोई , बच कर जा नहीं सकता मेरी चतुराई के सामने !
हम ऎसॆ देश द्रोही नेता है , जिसे हमारे देश की जनता अब हरा सकती नहीं !
अपनी आजादी को याद तो कर सकते है , देश को आबाद कर सकते नहीं !
संसद भवन में अब जूता और चप्पलो की भरमार करते जायंगे !
देश की जनता के साथ हम खिलवाड़ करते जायेगें !
अगर देश में मिलेगें देश भक्त नेता कोई , अपने पैसो की गर्मी से हम उन्हे खत्म करते जायेगें !
अपनी आजादी को याद तो कर सकते है , लेकिन देश के लिए कुछ कर सकते नहीं !

jay hind yadav | Jul 27 2011 – 18:51

आओ !देखो! भारत के प्राणो में क्या उन्माद भरा है ।
शाशन के प्रतिबन्ध व्यर्थ है,और व्यर्थ है सब धारायें ,
उन्हें तोङकर जनता के स्वर गुज रही हैं सभी दिशाएँ ।
नारी कंण्ठ पुकार रही है ,उनके उपर हो रहे जुर्म मिटाओ ,
जनता दाँत पिसती जाती , बंद हथेली उसकी खुल जाती ।
पर नेता के शाशन में,देश की जनता चुप बैठकर आज तमाशा देखती जाती ।
एक हाथ जब उठता था,किसी देश भक्त नेता का, हाथ हजारो उठ जाते थे ,
पर जब आज का नेता अपना हाथ उठाता है ,जनता के दुसरे हाथ में जूता-चप्पल उठ जाता है ।
एक बार यदी उठ जाती, मिलकर आवाज ईस धरा से आती ।
रख देती वह पीस भ्रश्टाचारी लोगो को, चटनी कर उसको खाती ।
उठ नहीं रही है आवाज ईस धरा से,मैं क्या समझूँ सबको सूँघ गया है साँप ।
आजाद देश की जनता हो गयी गुलाम, सरकारी कुत्ते जनता के चुने नुमाईन्दे हो गये है साँप ।
सोचो, क्यो लोग अकारण ,आज गुलामी को अपनी ही मजबुरी बताएँ ।
क्यों न हिन्दूस्तान की जनता मिलकर करे विरोध, सब अपना रोष जताएँ ।
क्या हो गया है ,आज के ईस भारत को,यह भी चाहिए,वह भी चाहिए,सब कुछ चाहिए ।
भुजा(हाथ)उठा कर नेता जनता से बोले,हमें सिर्फ़ वोट चाहिए वोट चाहिए ।
आज देश की जनता की उठी भुजाएँ बोली,हमें सिर्फ़ नोट चाहिए नोट चाहिए ।

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