Salma Siddiqui Autobiography | सलमा सिद्दीक़ी का जीवन परिचय : कवयित्री ही नहीं एक स्वतंत्रता सेनानी भी

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सलमा सिद्दीक़ी को अधिकतर लोग कृष्णन चंदर की हमसफ़र के रूप में ही जानते हैं। लेकिन उनकी एक अलग पहचान भी थी एक लेखिका के रूप में। लेकिन जैसा हमेशा पितृसता समाज मर्दों की आड़ में औरतों के अस्तित्व को छिपाता आया है, इससे सलमा और उनका लेखन भी नहीं बच सका था। आज के इस लेख में हम सलमा सिद्दीकी पहचान है और उनके काम के बारे में चर्चा करेंगे।

सलमा सिद्दीकी का जन्म साल 1931 में वाराणसी, उत्तर प्रदेश में हुआ था। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से उर्दू में मास्टर डिग्री हासिल की थी। साथ ही कुछ समय के लिए वहां के महिला कॉलेज में भी पढ़ाया। उनके पिता राशिद अहमद सिद्दीकी एक प्रसिद्ध निबंधकार, शिक्षाविद् और फिल्म निर्माता केए अब्बास और कवि अली सरदार जाफरी और जन निसान अख्तर जैसी प्रमुख हस्तियों के गुरु रह चुके थे।

अलीगढ़ में सलमा का पैतृक घर ज़ाकिर हुसैन और ईएम फोस्टर जैसे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय कद के मेहमानों से भरा हुआ रहता था। उस समय में अलीगढ़ अपने आप में एक काव्य और साहित्यिक केंद्र बना हुआ था जो युवा कवियों और लेखकों को प्रेरित करता था और कला और नाटक को फलने-फूलने के लिए जगह प्रदान करता था ताकि वहां युवा अपना साहित्य कौशल को दिखा सके।

सलमा सिद्दीकी की पहली शादी के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है, सिवाय इसके कि यह जल्दी खत्म हो गई। फिर उनकी दूसरी शादी एक प्रमुख उर्दू और हिंदी लेखक कृष्णन चंदर से हुई थी। सलमा तेरह साल की उम्र में चंदर की लघुकथा ‘अन्नदाता’ से प्रभावित हो गई थीं। उन्होंने साल 1957 में नैनीताल में कृष्ण चंदर से शादी की थी। इसके बाद साल 1962 में ह बॉम्बे में रहने आ गई और वही अपना आशियाना बनाया और वे दोनों उर्दू साहित्य के ‘पहले जोड़े’ बन गए थे।

सलमा सिद्दीकी की सबसे मशहूर कृति में से एक है ‘सिकंदरनामा’ जो उनके घरेलू सहायका सिकंदर से प्रेरित था। मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बदायूं की रहनेवाली सिकंदर 55 से अधिक वर्षों से उनके परिवार के साथ था। उनके अनोखे व्यवहार ने सलमा को आकर्षित किया।

सलमा सिद्दीकी और उनके पति दोनों ही प्रगतिशील लेखक आंदोलन का हिस्सा थे। यह साहित्य में सबसे महत्वपूर्ण समूहों में से एक था जिसमें इस्मत चुगताई, मंटो और अमृता प्रीतम जैसे लेखक भी शामिल थे। इसे साल 1936 में सामाजिक न्याय और समानता की वकालत करने वाले युवा कवियों और लेखकों द्वारा स्थापित किया गया था। इस आंदोलन के कई सदस्यों को ब्रिटिश शासन के दौरान जेल की सज़ा भुगतनी पड़ी थी।

सलमा की कृतियां और लेखन

सलमा सिद्दीकी की सबसे मशहूर कृति में से एक है ‘सिकंदरनामा‘ जो उनके घरेलू सहायका सिकंदर से प्रेरित था। मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बदायूं की रहनेवाली सिकंदर 55 से अधिक वर्षों से उनके परिवार के साथ था। उनके अनोखे व्यवहार ने सलमा को आकर्षित किया। उन्होंने प्रतिष्ठित पत्रिका ‘धर्मयुग’ में सिकंदर पर आधारित लघु कथाओं की एक श्रृंखला प्रकाशित करनी शुरू की और अंत में इसे एक उपन्यास के रूप में प्रकाशित किया।

मानसून की बारिश में तीन पूरी पांडुलिपियां नष्ट हो जाने के बाद सलमा सिद्दीकी ने लेखन और प्रकाशन में रुचि खो दी। भारतीय साहित्य के स्वर्ण युग पर प्रकाश डालने वाली उनकी आत्मकथा के अंश भी नष्ट हो गए।

सलमा सिद्दीकी एक इंटरव्यू में सिकंदर के साथ हुई ऐसी ही एक घटना के बारे में बताती हैं, “एक बार, प्रसिद्ध उपन्यासकार ईएम फोस्टर अलीगढ़ में हम से मिलने आए। सिकंदर ने उसका स्वागत करने के लिए उसे एक पान भेंट किया और जब वह उसे खाने ही वाले थे तो उसने टिप्पणी की कि यह पहली बार है कि मैं किसी विदेशी को पान खाने की इतनी गंदी आदत में लिप्त देख रहा हूं। हमने उसे किसी बहाने से विदा कर दिया, कहीं ऐसा न हो कि वह ऐसी और बातें करे।”

उनकी अन्य रचनाओं में गिलहरी की बहन, भरोसा और मंगलसूत्र भी शामिल थे। मानसून की बारिश में तीन पूरी पांडुलिपियां नष्ट हो जाने के बाद सलमा सिद्दीकी ने लेखन और प्रकाशन में रुचि खो दी। भारतीय साहित्य के स्वर्ण युग पर प्रकाश डालने वाली उनकी आत्मकथा के अंश भी नष्ट हो गए।

साल 1977 में कृष्णन चंदर के निधन के बाद से सलमा सिद्दीकी मुंबई में अकेले रहने लगीं। वह बंबई की अंतिम प्रगतिशील लेखक संगठन की सदस्या थीं, जो अलीगढ़ और उर्दू साहित्य के प्रति अपने प्रेम और आज के भारतीय साहित्य पर अपनी राय ज़ाहिर करने के लिए हमेशा तैयार रहती थीं। फरवरी 2017 में 89 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।

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