श्रीगोविन्द दामोदर स्तोत्र || Shri Govinda Damodar Stotra

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श्रीगोविन्द दामोदर स्तोत्रम् की रचना श्रीबिल्वमंगल ठाकुर द्वारा की गयी है जिन्हें ‘श्रीलीलाशुक’ कहा जाता है। यह स्तोत्र ७१ श्लोकों का है किन्तु यहां इसके कुछ प्रचलित श्लोक ही हिन्दी अनुवाद सहित दिए जा रहे हैंऔर साथ में इनका मूल पाठ भी दिया जा रहा है ।

विपत्ति के समय श्रद्धाभक्तिपूर्वक इस श्रीगोविन्द दामोदर स्तोत्रम् का पाठ किया जाए तो मनुष्य के सारे दु:ख स्वयं भगवान हर लेते हैं। भगवान श्रीकृष्ण के इस स्तोत्र का नित्य पाठ करने से भगवान साधक के चित्त में प्रवेश कर विराजने लगते हैं जिससे उसके समस्त कल्मष धुल जाते हैं, चित्त व अन्त:करण रूपी दर्पण स्वच्छ हो जाता है और जो आनन्दामृत प्रदान करने के साथ मनुष्य को मोक्ष भी प्रदान करता है।

श्रीबिल्वमंगल का संक्षिप्त परिचय

सदियों पहले बिल्वमंगल नामक ब्राह्मण के मन को चिन्तामणि वेश्यारूपी ठगिनी माया ने ऐसा आसक्त किया कि वह अपने पिता की मृत्यु पर भी नहीं आया। गांव वालों ने उसे धर-पकड़कर पिता का श्राद्ध कराया। शाम होते ही बिल्वमंगल लोगों की कैद से छूटकर घनघोर बारिश में कोई नौका न मिलने से मुर्दे को पकड़कर नदी पार कर और काले नाग को रस्सी समझकर दीवार फांदकर चिन्तामणि वेश्या के घर पहुंचा। चिन्तामणि जिस प्रकार रूप की रानी थी उसी प्रकार संगीत की भी ज्ञानी थी। संगीत ने उसे भगवान के सौन्दर्य आदि गुणों व लीलाओं से परिचित करा दिया था। आज ब्राह्मण युवक के इस अध:पतन से अत्यधिक व्यथित होकर वह रोने लगी और उसके पैरों पर गिरकर बोली-‘तुम ब्राह्मण हो किन्तु मुझसे भी ज्यादा गिर गए हो। भगवान से प्रेम करके तुम मुझे और अपने को बचाओ। भगवान तो सौन्दर्य-माधुर्य आदि के सिन्धु हैं, उन सिन्धु के एक बिन्दु के किसी एक कतरे में सारी दुनिया की सुन्दरता, मृदुता और मधुरता है। तुम उधर बढ़ो और मेरा तथा अपना भी कल्याण करो। याद रखना, अब वेश्या समझकर मेरे घर में कभी कदम मत रखना।’ बिल्वमंगल ने अपने पतित पूर्व संस्कारों को मिटाने के लिए बेल के पेड़ के कांटे से अपनी आंखें फोड़ लीं।

चिन्तामणि के वचन सुनकर बिल्वमंगल के हृदय में भगवत्प्रेम का बीज प्रस्फुटित हुआ और वह चल दिया उस श्रीकृष्णप्रेमरूपी अमृतसिन्धु में डुबकी लगाने। उसने ऐसा सरस गीत गाया कि लाखों को तार दिया। बिल्वमंगल के वे रस आज भी हमें रसासिक्त कर रहे हैं। बिल्वमंगल ने चिन्तामणि को अपना गुरु माना और अपने ग्रन्थ ‘कृष्णकर्णामृत’ का मंगलाचरण ‘चिन्तामणिर्जयति’ से किया।

बालकृष्ण का ध्यान

करारविन्देन पदारविन्दं मुखारविन्दे विनिवेशयन्तम्।

वटस्य पत्रस्य पुटे शयानं बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि।।

जिन्होंने अपने करकमल से चरणकमल को पकड़ कर उसके अंगूठे को अपने मुखकमल में डाल रखा है और जो वटवृक्ष के एक पर्णपुट (पत्ते के दोने) पर शयन कर रहे हैं, ऐसे बाल मुकुन्द का मैं मन से स्मरण करता हूँ।
श्रीगोविन्द दामोदर स्तोत्रम्

श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव।

जिह्वे पिवस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति।।

हे जिह्वे ! तू ‘श्रीकृष्ण ! गोविन्द ! हरे ! मुरारि ! हे नाथ ! नारायण ! वासुदेव ! तथा गोविन्द ! दामोदर ! माधव !’-इस नामामृत का ही निरन्तर प्रेमपूर्वक पान करती रह।

विक्रेतुकामाखिलगोपकन्या मुरारिपादार्पितचित्तवृत्ति:।

दध्यादिकं मोहवशादवोचद् गोविन्द दामोदर माधवेति।।

जिनकी चित्तवृत्ति मुरारि के चरणकमलों में लगी हुई है, वे सभी गोपकन्याएं दूध-दही बेचने की इच्छा से घर से चलीं। उनका मन तो मुरारि के पास था; अत: प्रेमवश सुध-बुध भूल जाने के कारण ‘दही लो दही’ इसके स्थान पर जोर-जोर से ‘गोविन्द ! दामोदर ! माधव !’ आदि पुकारने लगीं।

गृहे गृहे गोपवधूकदम्बा: सर्वे मिलित्वा समवाप्य योगम्।

पुण्यानि नामानि पठन्ति नित्यं गोविन्द दामोदर माधवेति।।

व्रज के प्रत्येक घर में गोपांगनाएं एकत्र होने का अवसर पाने पर झुंड-की-झुंड आपस में मिलकर उन मनमोहन माधव के ‘गोविन्द, दामोदर, माधव’ इन पवित्र नामों को नित्य पढ़ा करती हैं।

सुखं शयाना निलये निजेऽपि नामानि विष्णो: प्रवदन्ति मर्त्या:।

ते निश्चितं तन्मयतां व्रजन्ति गोविन्द दामोदर माधवेति।।

अपने घर में ही सुख से शय्या पर शयन करते हुए भी जो लोग ‘हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव !’ इन विष्णुभगवान के पवित्र नामों को निरन्तर कहते रहते हैं, वे निश्चय ही भगवान की तन्मयता प्राप्त कर लेते हैं।

जिह्वे सदैवं भज सुन्दराणि नामानि कृष्णस्य मनोहराणि।

समस्त भक्तार्तिविनाशनानि गोविन्द दामोदर माधवेति।।

हे जिह्वे ! तू सदा ही श्रीकृष्णचन्द्र के ‘हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव !’ इन मनोहर मंजुल नामों को, जो भक्तों के समस्त संकटों की निवृत्ति करने वाले हैं, भजती रह।

सुखावसाने इदमेव सारं दु:खावसाने इदमेव ज्ञेयम्।

देहावसाने इदमेव जाप्यं गोविन्द दामोदर माधवेति।।

सुख के अंत में यही सार है, दु:ख के अंत में यही गाने योग्य है और शरीर का अंत होने के समय भी यही मन्त्र जपने योग्य है, कौन-सा मन्त्र? यही कि ‘हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव !’

जिह्वे रसज्ञे मधुर प्रिया त्वं सत्यं हितं त्वां परमं वदामि।

आवर्णयेथा मधुराक्षराणि गोविन्द दामोदर माधवेति।।

हे रसों को चखने वाली जिह्वे ! तुझे मीठी चीज बहुत अधिक प्यारी लगती है, इसलिए मैं तेरे हित की एक बहुत ही सुन्दर और सच्ची बात बताता हूँ। तू निरन्तर ‘हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव !’ इन मधुर मंजुल नामों की आवृत्ति किया कर।

त्वामेव याचे मम देहि जिह्वे समागते दण्डधरे कृतान्ते।

वक्तव्यमेवं मधुरं सुभक्त्या गोविन्द दामोदर माधवेति।।

हे जिह्वे! मैं तुझी से एक भिक्षा मांगता हूँ, तू ही मुझे दे। वह यह कि जब दण्डपाणि यमराज इस शरीर का अन्त करने आवें तो बड़े ही प्रेम से गद्गद् स्वर में ‘हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव !’ इन मंजुल नामों का उच्चारण करती रहना।

श्रीकृष्ण राधावर गोकुलेश गोपाल गोवर्धननाथ विष्णो।

जिह्वे पिवस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति।।

हे जिह्वे ! तू ‘श्रीकृष्ण ! राधारमण ! व्रजराज ! गोपाल ! गोवर्धन ! नाथ ! विष्णो ! गोविन्द ! दामोदर ! माधव !’-इस नामामृत का निरन्तर पान करती रह।

श्रीगोविन्ददामोदरस्तोत्र मूलपाठ

अग्रे कुरूणामथ पाण्डवानां दुःशासनेनाहृतवस्त्रकेशा ।

कृष्णा तदाक्रोशदनन्यनाथा गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ १॥

श्रीकृष्ण विष्णो मधुकैटभारे भक्तानुकम्पिन् भगवन् मुरारे ।

त्रायस्व मां केशव लोकनाथ गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ २॥

विक्रेतुकामा किल गोपकन्या मुरारिपादार्पितचित्तवृत्तिः ।

दध्यादिकं मोहवशादवोचद् गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ३॥

उलूखले सम्भृततण्डुलांश्च सङ्घट्टयन्त्यो मुसलैः प्रमुग्धाः ।

गायन्ति गोप्यो जनितानुरागा गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ४॥

काचित्कराम्भोजपुटे निषण्णं क्रीडाशुकं किंशुकरक्ततुण्डम् ।

अध्यापयामास सरोरुहाक्षी गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ५॥

गृहे गृहे गोपवधूसमूहः प्रतिक्षणं पिञ्जरसारिकाणाम् ।

स्खलद्गिरां वाचयितुं प्रवृत्तो गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ६॥

पर्य्यङ्किकाभाजमलं कुमारं प्रस्वापयन्त्योऽखिलगोपकन्याः ।

जगुः प्रबन्धं स्वरतालबन्धं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ७॥

रामानुजं वीक्षणकेलिलोलं गोपी गृहीत्वा नवनीतगोलम् ।

आबालकं बालकमाजुहाव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ८॥

विचित्रवर्णाभरणाभिरामेऽभिधेहि वक्त्राम्बुजराजहंसि ।

सदा मदीये रसनेऽग्ररङ्गे गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ९॥

अङ्काधिरूढं शिशुगोपगूढं स्तनं धयन्तं कमलैककान्तम् ।

सम्बोधयामास मुदा यशोदा गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ १०॥

क्रीडन्तमन्तर्व्रजमात्मजं स्वं समं वयस्यैः पशुपालबालैः ।

प्रेम्णा यशोदा प्रजुहाव कृष्णं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ११॥

यशोदया गाढमुलूखलेन गोकण्ठपाशेन निबध्यमानः ।

रुरोद मन्दं नवनीतभोजी गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ १२॥

निजाङ्गणे कङ्कणकेलिलोलं गोपी गृहीत्वा नवनीतगोलम् ।

आमर्दयत्पाणितलेन नेत्रे गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ १३॥

गृहे गृहे गोपवधूकदम्बाः सर्वे मिलित्वा समवाययोगे ।

पुण्यानि नामानि पठन्ति नित्यं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ १४॥

मन्दारमूले वदनाभिरामं विम्बाधरे पूरितवेणुनादम् ।

गोगोपगोपीजनमध्यसंस्थं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ १५॥

उत्थाय गोप्योऽपररात्रभागे स्मृत्वा यशोदसुतबालकेलिम् ।

गायन्ति प्रोच्चैर्दधि मन्थयन्त्यो गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ १६॥

जग्धोऽथ दत्तो नवनीतपिण्डो गृहे यशोदा विचिकित्सयन्ती ।

उवाच सत्यं वद हे मुरारे गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ १७॥

अभ्यर्च्य गेहं युवतिः प्रवृद्धप्रेमप्रवाहा दधि निर्ममन्थ ।

गायन्ति गोप्योऽथ सखीसमेता गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ १८॥

क्वचित् प्रभाते दधिपूर्णपात्रे निक्षिप्य मन्थं युवती मुकुन्दम् ।

आलोक्य गानं विविधं करोति गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ १९॥

क्रीडापरं भोजनमज्जनार्थं हितैषिणी स्त्री तनुजं यशोदा ।

आजूहवत् प्रेमपरिप्लुताक्षी गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ २०॥

सुखं शयानं निलये च विष्णुं देवर्षिमुख्या मुनयः प्रपन्नाः ।

तेनाच्युते तन्मयतां व्रजन्ति गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ २१॥

विहाय निद्रामरुणोदये च विधाय कृत्यानि च विप्रमुख्याः ।

वेदावसाने प्रपठन्ति नित्यं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ २२॥

वृन्दावने गोपगणाश्च गोप्यो विलोक्य गोविन्दवियोगखिन्नाम् ।

राधां जगुः साश्रुविलोचनाभ्यां गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ २३॥

प्रभातसञ्चारगता नु गावस्तद्रक्षणार्थं तनयं यशोदा ।

प्राबोधयत् पाणितलेन मन्दं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ २४॥

प्रवालशोभा इव दीर्घकेशा वाताम्बुपर्णाशनपूतदेहाः ।

मूले तरूणां मुनयः पठन्ति गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ २५॥

एवं ब्रुवाणा विरहातुरा भृशं व्रजस्त्रियः कृष्णविषक्तमानसाः ।

विसृज्य लज्जां रुरुदुः स्म सुस्वरं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ २६॥

गोपी कदाचिन्मणिपञ्जरस्थं शुकं वचो वाचयितुं प्रवृत्ता ।

आनन्दकन्द व्रजचन्द्र कृष्ण गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ २७॥

गोवत्सबालैः शिशुकाकपक्षं बध्नन्तमम्भोजदलायताक्षम् ।

उवाच माता चिबुकं गृहीत्वा गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ २८॥

प्रभातकाले वरवल्लवौघा गोरक्षणार्थं धृतवेत्रदण्डाः ।

आकारयामासुरनन्तमाद्यं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ २९॥

जलाशये कालियमर्दनाय यदा कदम्बादपतन्मुरारिः ।

गोपाङ्गनाश्चुक्रुशुरेत्य गोपा गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ३०॥

अक्रूरमासाद्य यदा मुकुन्दश्चापोत्सवार्थं मथुरां प्रविष्टः ।

तदा स पौरेर्जयसीत्यभाषि गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ३१॥

कंसस्य दूतेन् यदैव नीतौ वृन्दावनान्ताद् वसुदेवसूनुः ।

रुरोद गोपी भवनस्य मध्ये गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ३२॥

सरोवरे कालियनागबद्धं शिशुं यशोदातनयं निशम्य ।

चक्रुर्लुठन्त्यः पथि गोपबाला गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ३३॥

अक्रूरयाने यदुवंशनाथं सङ्गच्छमानं मथुरां निरीक्ष्य ।

ऊचुर्वियोगत् किल गोपबाला गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ३४॥

चक्रन्द गोपी नलिनीवनान्ते कृष्णेन हीना कुसुमे शयाना ।

प्रफुल्लनीलोत्पललोचनाभ्यां गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ३५॥

मातापितृभ्यां परिवार्यमाणा गेहं प्रविष्टा विललाप गोपी ।

आगत्य मां पालय विश्वनाथ गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ३६॥

वृन्दावनस्थं हरिमाशु बुद्ध्वा गोपी गता कापि वनं निशायाम् ।

तत्राप्यदृष्ट्वाऽतिभयादवोचद् गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ३७॥

सुखं शयाना निलये निजेऽपि नामानि विष्णोः प्रवदन्ति मर्त्याः ।

ते निश्चितं तन्मयतां व्रजन्ति गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ३८॥

सा नीरजाक्षीमवलोक्य राधां रुरोद गोविन्दवियोगखिन्नाम् ।

सखी प्रफुल्लोत्पललोचनाभ्यां गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ३९॥

जिह्वे रसज्ञे मधुरप्रिया त्वं सत्यं हितं त्वां परमं वदामि ।

आवर्णयेथा मधुराक्षराणि गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ४०॥

आत्यन्तिकव्याधिहरं जनानां चिकित्सकं वेदविदो वदन्ति ।

संसारतापत्रयनाशबीजं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ४१॥

ताताज्ञया गच्छति रामचन्द्रे सलक्ष्मणेऽरण्यचये ससीते ।

चक्रन्द रामस्य निजा जनित्री गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ४२॥

एकाकिनी दण्डककाननान्तात् सा नीयमाना दशकन्धरेण ।

सीता तदाक्रन्ददनन्यनाथा गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ४३॥

रामाद्वियुक्ता जनकात्मजा सा विचिन्तयन्ती हृदि रामरूपम् ।

रुरोद सीता रघुनाथ पाहि गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ४४॥

प्रसीद विष्णो रघुवंशनाथ सुरासुराणां सुखदुःखहेतो ।

रुरोद सीता तु समुद्रमध्ये गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ४५॥

अन्तर्जले ग्राहगृहीतपादो विसृष्टविक्लिष्टसमस्तबन्धुः ।

तदा गजेन्द्रो नितरां जगाद गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ४६॥

हंसध्वजः शङ्खयुतो ददर्श पुत्रं कटाहे प्रतपन्तमेनम् ।

पुण्यानि नामानि हरेर्जपन्तं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ४७॥

दुर्वाससो वाक्यमुपेत्य कृष्णा सा चाब्रवीत् काननवासिनीशम् ।

अन्तः प्रविष्टं मनसा जुहाव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ४८॥

ध्येयः सदा योगिभिरप्रमेयः चिन्ताहरश्चिन्तितपारिजातः ।

कस्तूरिकाकल्पितनीलवर्णो गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ४९॥

संसारकूपे पतितोऽत्यगाधे मोहान्धपूर्णे विषयाभितप्ते ।

करावलम्बं मम देहि विष्णो गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ५०॥

भजस्व मन्त्रं भवबन्धमुक्त्यै जिह्वे रसज्ञे सुलभं मनोज्ञम् ।

द्वैपायनाद्यैर्मुनिभिः प्रजप्तं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ५१॥

त्वामेव याचे मम देहि जिह्वे समागते दण्डधरे कृतान्ते ।

वक्तव्यमेवं मधुरं सुभक्त्या गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ५२॥

गोपाल वंशीधर रूपसिन्धो लोकेश नारायण दीनबन्धो ।

उच्चस्वरैस्त्वं वद सर्वदैव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ५३॥

जिह्वे सदैवं भज सुन्दराणि नामानि कृष्णस्य मनोहराणि ।

समस्तभक्तार्तिविनाशनानि गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ५४॥

गोविन्द गोविन्द हरे मुरारे गोविन्द गोविन्द मुकुन्द कृष्ण ।

गोविन्द गोविन्द रथाङ्गपाणे गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ५५॥

सुखावसाने त्विदमेव सारं दुःखावसाने त्विदमेव गेयम् ।

देहावसाने त्विदमेव जाप्यं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ५६॥

दुर्वारवाक्यं परिगुह्य कृष्णा मृगीव भीता तु कथं कथञ्चित् ।

सभां प्रविष्टा मनसा जुहाव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ५७॥

श्रीकृष्ण राधावर गोकुलेश गोपाल गोवर्धन नाथ विष्णो ।

जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ५८॥

श्रीनाथ विश्वेश्वर विश्वमूर्ते श्रीदेवकीनन्दन दैत्यशत्रो ।

जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ५९॥

गोपीपते कंसरिपो मुकुन्द लक्ष्मीपते केशव वासुदेव ।

जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ६०॥

गोपीजनाह्लादकर व्रजेश गोचारणारण्यकृतप्रवेश ।

जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ६१॥

प्राणेश विश्वम्भर कैटभारे वैकुण्ठ नारायण चक्रपाणे ।

जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ६२॥

हरे मुरारे मधुसूदनाद्य श्रीराम सीतावर रावणारे ।

जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ६३॥

श्रीयादवेन्द्राद्रिधराम्बुजाक्ष गोगोपगोपीसुखदानदक्ष ।

जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ६४॥

धराभरोत्तारणगोपवेष विहारलीलाकृतबन्धुशेष ।

जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ६५॥

बकीबकाघासुरधेनुकारे केशीतृणावर्तविघातदक्ष ।

जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ६६॥

श्रीजानकीजीवन रामचन्द्र निशाचरारे भरताग्रजेश ।

जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ६७॥

नारायणानन्त हरे नृसिंह प्रह्लादबाधाहर हे कृपालो ।

जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ६८॥

लीलामनुष्याकृतिरामरूप प्रतापदासीकृतसर्वभूप ।

जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ६९॥

श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव ।

जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ७०॥

वक्तुं समर्थोऽपि न वक्ति कश्चिदहो जनानां व्यसनाभिमुख्यम् ।

जिह्वे पिबस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥ ७१॥

इति श्रीबिल्वमङ्गलाचार्य विरचितं श्रीगोविन्ददामोदर स्तोत्रं सम्पूर्णम्॥

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