आज हम आपको एक ऐसी सख्सियत के बारे में बताएँगे जो आज के युग में हमारे रोल मॉडल हो सकते है न की वो लोग जो चंद पैसो के लिए अपना रोल बार बार बदलते रहते है जी हां हम बात कर रहे हैं आलोक सागर जी की शायद यह नाम आपने पहले भी कभी सुना होगा परन्तु आप इनकी ख्यातियो से परिचित नहीं होंगे आइये चर्चा करते है आलोक सागर जी जिन्‍होंने आईआईटी दिल्‍ली से इंजीनियरिंग करने के बाद अमेरिका की मशहूर ह्यूसटन यूनिवर्सिटी से पीएचडी की पढ़ाई की. लेकिन आज वे मध्‍य प्रदेश के छोटे से गांव में आदिवासी बच्‍चों को पढ़ा रहे हैं.

आलोक सागर जी बचपन से ही काफी होनहार थे जब वो पीएचडी कर भारत लौटे तो उन्होंने लोगो को शिक्षित करने का काम शुरू किया इसी क्रम में आगे बढ़ते हुए उन्होंने दिल्ली आईआईटी के बच्चो को पढ़ाया लेकिन जब वो दिल्लीआईआईटी के बच्चो को शिक्षित कर रहे थे तभी उन्होंने स्वामी विवेकानद जी की किताब पढ़ी विवेकानन्द जी के विचार से आलोक सागर जी काफी प्रभावित हुए विवेकानद जी कहते है की मै उन भारतीयों को दोषी मानता हु जो समाज के संसाधनों से शिक्षा ग्रहण करते है लेकिन जब उन्हें लौटाने की बात आती है तो उसे भूल जाते है यह बात पढ़ने में छोटी सी लगे परन्तु इसके अंदर के छुपे हुए तथ्यः को आलोक सागर जी पहचान लिया था अब उनका भी मन बड़ी बड़ी कोठियों , गाड़ियों , विश्वविद्यालययो में नहीं लगता था अब वो भी संसार से मोह माया त्याग करके अशिक्षित भारतीय को शिक्षित करने के विषय में सोचा
उन्होंने तो अपना विषय चुन लिया था लेकिन स्थान चुनने में उन्हें बड़ी दुविधा हो रही थी तभी उन्होंने ईसाइयो के धरमांतरण के
षडयंत्र के बारे में पढ़ा हलाकि ये ये बहुत पहले से चला आ रहा है और आज भी धड्ड्ले से चल रहा है उन्होंने यह भी देखा की किस तरह से भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में ईसाइयो ने हिंदुवो को भारी संख्या में धर्मान्तरित कर लिया है ये कुछ आकड़े है मिजोरम में 87.2%, नागालैंड 98.2 %,मणिपुर 41.29%, इन सब आकड़ो को देखने के बाद आलोक सागर जी का माथा चकरा गया अब उन्होंने यह भी देखा की ईसाइयत छल कपट से अब मध्यप्रदेश व् छत्तीसगढ़ में किस प्रकार पैर फैला रहे है अब आलोक ने उनके हौसले को तोड़ने की ठान ली और वो एकाएक उठ खड़े हुए और घोषणा देते हुए कहा की अब मै अशिक्षित भारतीयों के साथ छलावा नहीं होने दूंगा मै आई आई टी के प्रोफ़ेसर पद को त्याग करके जंगलो में जाकर गरीब अशिक्षित भारतीयों क शिक्षित करूँगा और छल कपट से हो रहे धर्मांतरण की कमर तोडूंगा विलासिता का जीवन त्याग करके एक योगी का जीवन जीऊंगा। …..
एक मजेदार वाक्यांश तब घटता है जब आलोक सागर जी मध्यप्रदेश के बैतूल के पठार स्थित भौरा तहसील के एक छोटे से गांव में लोगो को शिक्षित करने का कार्य करते है तभी भारत के ख़ुफ़िया विभाग को उनके संदिघ्ध होने पे शक होता है और वो उनकी जांच करते है लेकिन उन्हें कुछ प्राप्त नहीं होता और उन्हें अपनी पहचान बताने के लिए कहा जाता है पहले तो उन्होंने अपनी पहचान नहीं बताई लेकिन जब उन्होंने अपनी पहचान बताई तो ख़ुफ़िया विभाफ के अधिकारी भौचक्के रह गए उन्होंने आलोक सागर के इस कार्य की खूब सराहना की
आलोक सागर जी बहुत से विद्यार्थियो को शिक्षित किया है उनसे शिक्षा प्राप्त करके कई विद्यार्थी देश विदेश की बड़ी बड़ी संस्थाओ में कार्यरत है हमारे भूतपूर्व रिजर्व बैंक गवर्नर रघुराम राजन जी को भी आलोक सागर जी ने ही पढ़ाया था आज बैतूल पत्थर में स्थित सभी गांव आलोक सागर जी को गुरूजी के नाम से जानती है , आलोक जी के इस प्रयास से उन्होंने उन ईसाई संगठनों की कमर तोड़ दी जो छल कपट के नाम से भोले भाले वनवासियो का धर्मांतरण करते थे
आइये जानते है आलोक सागर जी के कुछ निजी जीवन के बारे में
:-आलोक सागर, जिन्‍होंने आईआईटी दिल्‍ली से इंजीनियरिंग करने के बाद अमेरिका की मशहूर ह्यूसटन यूनिवर्सिटी से पीएचडी की पढ़ाई की. लेकिन आज वे मध्‍य प्रदेश के छोटे से गांव में आदिवासी बच्‍चों को पढ़ा रहे है
मूलत दिल्ली के रहने वाले आलोक सागर 26 सालों से बैतूल जिले में आदिवासी अधिकारों के लिए संघर्षरत हैं, वे भौरा तहसील के एक छोटे से गांव में झोपड़ी बना कर रहते है और बच्चों को पढ़ाते हैं.
1990 से बैतूल जिले के एक ही छोटे से आदिवासी गांव कोचामाऊ में रह रहे हैं. वो अपनी इस शैक्षणिक योग्यता को छिपाए, जंगल को हर-भरा करने के अपने मिशन में लगे हैं क्योंकि वो अपनी उच्‍च शिक्षा उस आधार पर औरों से अलग नहीं खड़े होना चाहते थे.
उनका जीवन आज लोगों के लिए प्रेरणा बन गया है. उनके पास पहनने के लिए बस तीन कुर्ते हैं और एक साइकिल. उन्‍हें कई भाषाएं बोलनी आती है लेकिन न सबके बावजूद वे बस इन पिछड़े इलाकों में शिक्षा का प्रसार करने में लगे हैं.

ऐसे महापुरुष राष्ट्र नायक आलोक सागर जी के चरणों में वंदन
सेवा परमो धर्मः

Ansu Dubey

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