अष्ट पदि ६ कुञ्जर तिलक || Ashta Padi 6 Kunjar Tilak

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कवि श्रीजयदेवजीकृत गीतगोविन्द द्वितीय सर्ग अक्लेश केशव में २ अष्टपदी है।जिसमे की पञ्चम प्रबन्ध के रूप में  ५ वें अष्ट पदि जिसका नाम मधुरिपुरत्नकण्ठिकाहै तथा षष्ठम प्रबन्ध के अष्ट पदि ६ वें अष्ट पदि जिसका नाम कुञ्जर तिलक है।

श्रीगीतगोविन्दम्‌ द्वितीयः सर्गः अक्लेश-केशवः अष्ट पदि ६ कुञ्जर तिलक  

श्रीगीतगोविन्द द्वितीय सर्ग अक्लेश केशव षष्ठम प्रबन्ध

अथ अक्लेश – केशवः

गणयति गुणग्रामं भ्रामं भ्रमादपि नेहते

वहति च परितोषं दोषं विमुञ्चति दूरतः ।

युवतिषु वलत्तृष्णे कृष्णे विहारिणि मां विना

पुनरपि मनो वामं कामं करोति करोमि किम् ॥१॥

इति श्रीगीतगोविन्दे पञ्चमः सन्दर्भः ।

अन्वय – [ ननु श्रीकृष्णस्त्वां विहाय अन्याभिश्चेत् विहरति तर्हि तं किमिति स्मरसीति स्वाभिप्रायं वक्ष्यमाणं सखीं प्रत्याह]सखि, युवतिषु (गोपाङ्गनासु) वलत्तृष्णे (वलन्ती प्रस्फुरन्ती तृष्णा रमणाकाङ्क्षा यस्य तादृशे ) [ अतएव मां बिना विहारिणि (मां विहाय अन्यया सह रममाणेऽपीति भावः) कृष्णे [मम] वामं (प्रतिकूलम् अवाध्यमिति यावत्) मनः पुनरपि कामं (अभिलाषं) करोति, गुणग्रामं (श्रीहरेःगुणसमूह) गणयति (विचारयति); भ्रमादपि भ्रामं (विस्मरणं) न ईहते (चेष्टते; न कथमपि विस्मरतीत्यर्थः); परितोषं (तृप्ति) [तत्स्मरणेन इति शेषः] वहति; [तथा] दोषं (अवज्ञाजनितमपराधं ) दूरतः मुञ्चति (परिहरति, न गणयतीत्यर्थः); किं करोमि [ नास्त्यन्या मे गतिरिति भावः ] ॥ १ ॥

अनुवाद – “श्रीकृष्ण ने तुम्हें प्रत्याख्यान किया है, फिर भी तुम क्यों उनके प्रेम में व्याकुल हो रही हो” – प्रियसखि के द्वारा इस प्रकार भर्त्सना किये जाने पर श्रीराधा कहने लगी- सखि ! श्रीकृष्ण मुझे परित्यागकर दूसरी-दूसरी युवतियों के साथ अतिशय अनुराग के साथ विहार कर रहे हैं, यह देखकर उनके प्रति अनुराग दिखाना व्यर्थ है, यह मैं जानती हूँ, फिर भी मैं क्या करूँ, उनके प्रति मेरी प्रबल आसक्ति किसी तरह से दूर नहीं होती है, मैं तो उनके गुणों की गणना ही करती रहती हूँ, अपने उत्कर्ष का अनुभवकर आनन्द में उन्मत्त हो जाती हूँ, भ्रम से भी मुझे उनके प्रति क्रोध नहीं होता, उनके दोषों को देखे बिना ही सन्तोष का अनुभव करती हूँ, उनकी बार-बार स्पृहा करती हूँ, सखि, वे मुझसे भुलाये नहीं जाते मैं क्या करूँ ?

पद्यानुवाद-

सपनों में सुधि बनकर आते ।

सखि वे भुला भुला कर भाते ॥

निरगुणियाके गुण ही मनमें गुन-गुनस्वर भर जाते ।

पर-रत होने पर भी मुझमें रति बनकर ढर जाते ॥

सखि ! वे भुला – भुला कर भाते ।

सपनों में सुधि बन कर आते ॥

बालबोधिनी – षष्ठ प्रबन्ध के प्रारम्भ में अपनी रहः वार्त्ता की ओर अधिक विवृति करते हुए श्रीराधाजी कहती हैं – सखि ! अन्य गोपियों के साथ विहार करनेवाले उन श्रीकृष्ण के प्रति मेरे मन ने दाक्षिण्य भाव को धारण किया है, मेरे न चाहने पर भी यह उनकी गुणावली का स्मरण करता रहता है, उनको प्राप्त करने की कामना करता है।

भ्रामं भ्रमादपि नेहते‘- यहाँ भ्रामशब्द क्रोध का वाचक है । मेरा मन भूल से भी उनके प्रति क्रोध करना नहीं चाहता। उनकी परनायिकासक्ति‘, ‘मदुपेक्षाकारिताआदि दोषों को देखना नहीं चाहता, पूर्णरूपेण सन्तुष्ट ही रहता है, मैं क्या करूँ ?

इस श्लोक में श्रीराधा उत्कण्ठिता नायिका के रूप में प्रस्तुत है। उत्कण्ठिता का लक्षण है-

उत्का भवति सा यस्या वासके नागतः प्रियः ।

तस्यानागमने हेतुं चिन्तयन्त्याकुला यथा ॥

अर्थात् जिस नायिका की शय्या पर नायक नहीं आता है, वह अपने प्रियतम के नहीं आने के कारण के विषय में व्याकुल होकर सोचती रहती है-इसलिए उसे उत्कण्ठिता कहा जाता है।

इस श्लोक में हरिणी नामक छन्द, यमक नामक शब्दालङ्कार, संशय एवं दीपक नामक अर्थालङ्कार एवं क्रियौचित्य है। प्रस्तुत श्लोक षष्ठ प्रबन्ध की पुष्पिका मात्र है ॥ १ ॥

इति श्रीगीतगोविन्दे पञ्चमः सन्दर्भः ।

श्रीगीतगोविन्द द्वितीय सर्ग अक्लेश केशव प्रबन्ध ६ कुञ्जर तिलक  

अष्ट पदि ६ कुञ्जर तिलक  

गीतम् ॥६॥

मालव गौड़ रागेण एक ताली तालेन च गीयते

निभृत-निकुञ्ज-गृहं गतया निशि रहसि निलीय वसन्तं

चकित-विलोकित-सकल-दिशा रति-रभस-भरेन हसन्तं ॥ १ ॥

सखि हे केशि-मथनमुदारम् ।

रमय मया सह मदन- मनोरथ – भावितया सविकारम् ॥ध्रुवम् ॥

अन्वयसखि, निभृत-निकुञ्ज – गृहं गतया (निर्ज्जननिकुञ्ज- गृहं प्रस्थितया) [मया सह ] निशि ( रात्रौ ) [तदलाभात् मम वैकल्यादि-दिदृक्षया] रहसि (एकान्ते) निलीय ( आत्मानं संगोप्य ) वसन्तं (तिष्ठन्तं) [केशिमथनम्…..]; [तथा ] चकित-विलोकित- सकलदिशा (चकितं कृष्णं कुत्र निलीयते इति इति सशङ्कं यथा तथा विलोकिता दृष्टा सकला दिक् यया तादृश्या) [मया सह] रति-रभस-भरेण (रतौ यः रभसः औत्सुक्यं तस्य भरेण आतिशय्येन) हसन्तं ( मद्वैकल्यं समीक्ष्येतिशेषः) [केशिमथनम् ….] ; [तथाच] मदन- मनोरथ भावितया ( मदनेन प्रेम्णा यः मनोरथः अभिलाषः तेन भावितया युक्तया ) [ मया सह ] सविकारम् (कामवशेन भावान्तरगतम्) उदारः (महान्तं मनोरथदातारमित्यर्थः) केशिमथनं रमय ( रतिं कारय ) ॥ १ ॥

अनुवाद – मालव राग तथा एकताली ताल के द्वारा यह गीत गाया जाता है, इसकी गति द्रुत है।

हे सखि ! वह केशिमथन श्रीकृष्ण, जो मदन- सन्ताप का शान्तिविधान करने में कभी अनुदार नहीं होते और जिनका मन मेरे प्रति अतिशय अनुराग के कारण विमोहित हुआ है, उनके साथ मेरा अनङ्ग विषयक मनोरथ कैसे सिद्ध होगा ? इसी भावना से मैं व्याकुल हो रही हूँ।

अब तुम उनके साथ मेरा मिलन सम्पादन करा दो। जो विहित पूर्व सङ्केतानुसार निशीथ में निभृत निकुञ्ज-गृह में आकर, मैं उनके लिए कैसी उत्कण्ठिता हूँ अथवा उनके अदर्शन से मुझमें कितनी तड़प है, इस कौतुक भाव के साथ निकुञ्जवन के गोपनतम स्थान में छिपकर देखनेवाले, वे कब आयेंगे? ऐसी चिन्ता में निमग्ना जब थकित चकित नेत्रों से देखती थी, तब मेरी कातरता को देखकर शृङ्गार रसभरी हास्यसुधा से मुझको आनन्दित करनेवाले उदार तथा केशी नामक दैत्य का वध करनेवाले श्रीकृष्ण का मुझ – कामकेलिक इच्छा से परिपूर्ण अन्तःकरणवाली तथा रतिचेष्टाएँ करनेवाली के साथ अनङ्ग सम्बन्धीय मनोरथ सिद्ध कराओ ॥ १ ॥

पद्यानुवाद-

निशि अन्धियारी ऋतु वसन्त सखि ! घन निकुञ्ज वन नन्दन री ।

खोज रहे कबसे दिशि दिशिमें, थकित चकित दृग् खंजन री ।

ले चल वहीं थमे जिससे यह शाश्वत जी का क्रन्दन री।

रति – रस- भीने जहाँ विहँसते छिपे खड़े नन्दनन्दन री ॥

बालबोधिनी – काम ज्वर से सन्तप्ता हृदया श्रीराधा सखी से कृष्णानुसन्धान की अभिलाषा व्यक्त करती हैं। प्रस्तुत श्लोक में उस प्रसङ्ग का प्रकाश है, जिसमें उन्होंने अपने प्राणनाथ को रतिक्रीड़ा के द्वारा सुख प्रदान किया था, यह गाढ़तम रहस्यपूर्ण लीला है।

सखि ! रमय केशिमथनमुदारम् मया सह‘ – हे सखि ! केशिनिसूदन के साथ मेरा रमण कराओ। यहाँ तो श्रीराधाजी की स्वाभिलाषा व्यक्त हुई है, अपने सुख की वासना प्रकट हुई है, यह शुद्धभक्ति की परिभाषा के विपरीत है। अतः ऐसी अभिलाषा क्यों ?

इसके उत्तर में कहते हैं कि गोपियों ने सब कुछ त्यागकर श्रीकृष्ण से प्रीति की है, उनमें अपने सुख का लेशमात्र भी नहीं है। पुनः जबतक परस्पर गाढ़ अनुराग न हो तबतक प्रेम परिस्फुट नहीं होता। प्रेमी के हृदय में प्रेम की वासना जाग्रत कराने हेतु प्रेयसी को स्वानुराग प्रदर्शित करना होता है, यह प्रेम का स्वभाव है।

एकदेशीय प्रेम में रसाभास दोष आ जाता है। कहा गया है-

अनुरागोऽनुरक्तायां रसावह इति स्थितिः ।

अभावेत्वनुरागस्य रसाभासं जुगुर्बुधाः ॥

अर्थात् प्रीति जब अनुरक्ता स्त्री में होती है, तब वह रसवर्द्धनकारी होती है, परन्तु अनुराग के अभाव में तो रसाभास ही हो जाता है, ऐसा विद्वानों का मत है।

अतः यहाँ श्रीराधा का श्रीकृष्ण के प्रति अनुराग रस- वर्द्धनकारी है।

सखि ! कृष्ण ने सर्वप्रथम मेरे साथ रमणकर रतिसुख का अनुभव किया था, उनके विरह में वही क्रीड़ा सुख मुझे बार-बार स्मरण हो रहा है, जिससे मेरा चित्त व्याकुल हो रहा है। सम्प्रति मेरा हृदय मादनाख्य मदन रस में विभावित हो रहा है। मनोरथ के प्रदाता केशीमथन का विरह मुझे असहनीय हो रहा है। सखि ! उनसे मेरा रमण कराओ।

इस प्रकार कवि ने श्रीराधा का श्रीकृष्ण के प्रति और श्रीकृष्ण का श्रीराधा के प्रति अनुराग प्रदर्शित किया है। यदि मिलन प्रसङ्ग पहले दिखाया होता तो रसाभास दोष हो जाता।

सविकारम्पद के द्वारा श्रीराधा कह रही हैं- मुझमें काम विकार उत्पन्न हो गये हैं। कामजनित विकार मन में उत्पन्न होने पर नारियाँ व्याजान्तर से अर्थात् बहाना बनाकर अपने प्रियतम को नाभि, स्तन आदि दिखाती हैं।

रसिक सर्वस्व नामक व्याख्या में कहा गया है कि-

नाभिमूलकुचोदरप्रकटनव्याजेन यद्योषितां

साकांक्षं मुहुरीक्षणं स्खलितता नीवीनिबन्धस्य च ।

केशभ्रंसन संयमौ चकमितुर्मित्रादि सन्दर्शनैः

सौभाग्यादि गुण प्रशस्ति कथनैः तत्सानुरागेङ्गिकतम् ॥

अर्थात् कामविकार उत्पन्न होने पर स्त्रियाँ अनुरागपूर्ण चेष्टाएँ करती हैं। जैसे किसी माध्यम से अपनी नाभि स्तन तथा उदर दिखलाती हैं, अपने प्रेमी को सस्पृह दृष्टि से बारम्बार देखती हैं, नीवी-बन्धन स्खलित हो जाता है, केशों का भ्रंशन और संयमन होता है, प्रियतम के मित्रों को सम्यक् प्रकार से देखती हैं, उनके साथ अपने इष्ट के सौभाग्य तथा गुणों की प्रशंसा करती हैं। इस प्रकार की रतिपूर्ण चेष्टा करनेवाली मेरे साथ श्रीकृष्ण को मिला दो।

मदन मनोरथ भावितया – मेरा अन्तःकरण कामजनित कामनाओं से परिपूर्ण हो गया है।

चेष्टा भवति पुन्नार्यो रत्युत्थानातिसक्तयोः ।

सम्भोगो विप्रलम्भश्च स शृङ्गारो द्विधामतः ॥

अर्थात् जहाँ पर रति की उद्दीपन क्रिया में अत्यासक्त स्त्री तथा पुरुष शृङ्गारिक चेष्टाएँ किया करते हैं, वहाँ पर शृङ्गार दो प्रकार का होता है – सम्भोग तथा विप्रलम्भ । मुझ विरहिणी की जैसी अभिलाषा श्रीकृष्ण में है, वैसी ही अभिलाषा वे मुझमें रखते हैं, सखि ! मुझे उनसे मिला दो । यहाँ पर शृङ्गार रस की सम्पूर्ति हुई है।

श्रीराधाजी कह रही हैं- जब मैं निशीथ रात्रि में निभृत निकुञ्ज के अभिसार स्थान में पहुँची, तब उस लतागृह में श्रीश्यामसुन्दर को न देखकर बड़ी विकलता से चतुर्दिग् देखने लगी, उस समय सघन कुञ्ज में छिपकर निवास करनेवाले श्रीकृष्ण मेरी उत्कण्ठा को देखने लगे।

जब मैं चकित नेत्रों से उनका अनुसन्धान करने लगी, तब वे रति के उत्साह से युक्त होकर समस्त दिशाओं को उल्लसित कर हँसते-हँसते मेरे सामने प्रकट हो गये। सखी री, उन्हीं कृष्ण से मुझे मिला दो ॥ १ ॥

प्रथम समागम लज्जितया पटु-चाटु-शतैरनुकूलम् ।

मृदु-मधुर- स्मित- भाषितया शिथिलीकृत – जघन – दुकूलम् –

सखि हे केशीमथनमुदारम्…… ॥२॥

अन्वय– प्रथम – समागम लज्जितया (प्रथमः आद्यः यः समागमः सङ्गमः तेन लज्जितया जातलज्जया ) [मया सह] पटुचाटुशतैः (पटूनि नारी-मनोहरण- निपुणानि – निपुणानि यानि चाटूनां प्रियवादनां शतानि तैः) अनुकूलं (अनुकूलयन्तं कृतापराधं मां क्षमस्वेति असकृत् कथयन्तं ) [ केशिमथनम्..], [तथा] मृदु-मधुर-स्मित- भाषितया (मृदु मधुरं यत् स्मितम् ईषद्धासः तेन सह भाषितं भाषणं यस्याः तथाभूतया ) [ मया सह] शिथिलीकृत – जघन – दुकूलं ( शिथलीकृतं प्रभ्रंशितं जघनस्थं दुकूलं वसनं येन तादृशं) [केशिमथनम्…..]॥२॥

अनुवाद – प्रथम मिलन में स्वभावसुलभ लज्जा से अत्यन्त विमुग्ध देखकर मेरी लज्जा को दूर करने के लिए उन्होंने अनेक प्रकार की अनुनय-विनयरूप वचन परम्परा का प्रयोग किया। उनकी चाटुकारितापूर्ण बातों से विमुग्ध होकर मैं कोमल तथा मधुर मुस्कान के साथ उनसे वार्तालाप करने लगी, उस समय मेरे जघन- प्रदेश के वस्त्र को हटानेवाले विदग्ध श्रीकृष्ण से मुझे मिला दो ॥ १ ॥

पद्यानुवाद-

प्रथम मिलनकी बेला आयी, चढू ब्रीड़ाके स्यन्दन री ।

किन्तु मधुर बोलोंसे उनके, बनी स्वयं रस- रञ्जन री ॥

बालबोधिनी – श्रीराधा सखी से कहती हैं- यद्यपि प्रियतम श्रीकृष्ण से यह मेरा प्रथम मिलन नहीं था, फिर भी मैं उनके समक्ष ऐसी चेष्टा कर रही थी, जिस प्रकार कोई नायिका प्रथम समागम के काल में अपने प्रियतम के समीप बहुत लज्जित होती है। श्रीकृष्ण उसी समय अपने चाटुवाक्यों से मुझे अपने मनोनुकूल बनाते जाते थे। मैं उनके उन मधुर वचनों से आह्लादित होती थी और मधुर मुस्कान के साथ उनसे मृदु भाषण करती थी। जैसे ही वे मुझे मनोनुकूल देखते थे तभी मेरी जंघा के वस्त्रों को उन्मोचित कर देते थे। मैं उन्हीं श्रीकृष्ण के साथ रमण करना चाहती हूँ- सखी! मुझे उनसे मिलाओ ।

प्रथम समागमयह रति रस नवनवायमान रूप में ही नित्य अनुभूत होता है ॥ २ ॥

किशलय – शयन – निवेशितया चिरमुरसि ममैव शयानम् ।

कृत – परिरम्भण – चुम्बनया परिरभ्य कृताधरपानम्-

सखि हे केशीमथनमुदारम् ……..॥३॥

अन्वय– किशलय – शयन- निवेशितया पल्लव – शय्याशायितया )[ मया सह ] चिरं (बहुक्षणं) ममैव उरसि (वक्षसि ) शयानं [केशिमथनम्…..] [तथा] कृत- परिरम्भण- चुम्बनया ( कृतं परिरम्भणं चुम्बनञ्च यया) [मया सह] पररिभ्य [आलिङ्ग्य] कृताधरपानं (कृताधरचुम्बनं ) [ केशिमथनम्…..]॥३॥

अनुवाद – मनोरम, नवीन एवं कोमल पल्लवों की शय्यापर जिन्होंने मुझे सुलाकर मेरे हृदय के ऊपर बड़े उल्लसित होकर सुख से शयन किया था, जिनका मैंने प्रगाढ़रूप से आलिङ्गन एवं चुम्बन किया था, पुनः जिन्होंने उसी प्रबलतर अनङ्ग रस में निमज्जित होते हुए मेरा परिरम्भण कर मेरे अधरसुधा का बारम्बार पान किया था, सखि ! उन्हीं प्राणप्रियतम श्रीकृष्ण से मुझे मिला दो ॥ ३ ॥

पद्यानुवाद-

भूली वदन वसनकी सुधि सब, भूली पूजा- वन्दन री ।

मेरी शय्या किशलय उनकी, मेरे उरका स्पन्दन री ॥

भूली किन अधरोंने किनका लिया मधुर कब चुम्बन री ।

किन घड़ियोंमें हुआ हमारा, युग-युगका परिरम्भण री ॥

बालबोधिनी – सखि ! वे श्रीकृष्ण सङ्केत-स्थान में मुझे कोमल पल्लवों से रचित शय्यापर सुला देते थे, इसके पश्चात् वे मेरे वक्षःस्थल पर चिरकाल तक रमण करते थे। मैं उन श्रीकृष्ण का आलिङ्गन कर उनका चुम्बन कर लेती थी । उस समय श्रीकृष्ण भी मुझे आलिङ्गन करके मेरे अधरसुधा का पान करते थे। सखी मुझे उन श्रीकृष्ण से मिलन करा दो।

कृत परिरम्भण – इस प्रकार के आलिङ्गन को रसमञ्जरीकार ने क्षीरनीर नामक आलिङ्गन बताया है और कथन की पुष्टि के लिए पञ्चसायक नामक ग्रन्थ का प्रमाण दिया है। रसिकप्रियाकार ने इस प्रकार के आलिङ्गन को तिल-तण्डुल नामक आलिङ्गन माना है और अपने कोकशास्त्र का प्रमाण दिया है ॥ ३ ॥

अलस-निमीलित- लोचनया पुलकावलि – ललित-कपोलम्

श्रमजल – सकल- कलेवरया वरमदन-मदादतिलोलम्-

सखि हे केशीमथनमुदारम् …॥४॥

अन्वय- अलस-निमीलित-लोचना (अलसेन सुरतश्रमजातेन आलस्येन निमीलिते मुकुलिते विलोचने यस्याः तादृश्या) [मया सह] पुलकावलि – ललित-कपोलं (पुलकानां रोमाञ्चानाम् आवल्या श्रेण्या चुम्बनादिति भावः ललितौ कपोलौ गण्डौ यस्य तादृशं ) [ केशिमथनम् …..] [तथा] श्रमजल – सकल- कलेवरया (श्रमजलं स्वेदाम्बु सकलकलेवरे यस्याः तादृश्या) [ मया सह ] वर मदनमदात् (प्रवृद्ध मनसिज-विकारात् हेतोः) अतिलोलं ( मां प्रति नितरां साकाङ्क्ष) [ केशिमथनम्…..] ॥४॥

अनुवाद – जिनके साथ मदन- आमोद में अप्रत्याशित सुख से मेरी आँखें अलसा गयीं, मुँद गयीं, उस विलास सुख से श्रीकृष्ण के कपोलयुगल ने अत्यन्त मनोज्ञ तथा ललित रूप धारण किया था, मदन-आमोदजनित श्रम के कारण निःसृत स्वेदविन्दुओं से मनोहर देहवाली मुझे देखकर उस प्रबलतर मदन रस में मत्त होकर अनङ्ग रस का रसास्वादन करनेवाले अति चञ्चल श्रीकृष्ण से हे सखि ! मुझे अति शीघ्र मिला दो ॥ ४ ॥

पद्यानुवाद-

मेरे मिलित लोचन उनका, पुलक ललित वपु – कम्पन री।

श्रम- सीकरसे सिञ्चित तन यह, उनमें रतिका गुञ्जन री ॥

बालबोधिनी – सखि ! रतिसुख से क्लान्त हुआ मेरा शरीर अलसा जाता था और मेरी आँखें मुँद जाती थीं। कामजनित चिन्ता के कारण सारा शरीर स्वेद-विन्दुओं से सिक्त हो जाता था। उस समय मेरी यह दशा देखकर श्रीकृष्ण के हृदय में कामोद्रेक जनित हर्ष उदित होता था, जिससे उनके कपोलयुगल में सुमनोहर लावण्य प्रकाशित होने लगता था । वे प्रबलतर मदन आमोद में निमग्न हो जाते थे। मेरी देहलता को देखकर वे चञ्चल हो उठते थे, हे सखि ! उन्हीं श्रीकृष्ण से मुझे मिला दो ।

सुरतानन्द से श्रीराधा के शरीर की पसीने से लथपथता श्रीराधा के पूर्वानुभूत सुखानन्द की सम्पूर्ति व्यक्त कर रही है ॥४॥

कोकिल – कलरव – कूजितया जित – मनसिज- तन्त्र – विचारम् ।

श्लथ – कुसुमाकुल- कुन्तलया नखलिखित- घन-स्तनभारं

सखि हे केशीमथनमुदारम् …॥५॥

अन्वयकोकिल-कलरव – कूजितया (कोकिलस्य कलरव इव कूजितं अव्यक्त भाषितं यस्याः तया) [ मया सह ] जित – मनसिज-तन्त्र – विचारं (जितः अभिभूतः मनसिज- तन्त्रस्य कामशास्त्रस्य विचारः येन तं कामशास्त्रविशारदमित्यर्थः; अतएव शास्त्रोक्त क्रियातिक्रमो नाशङ्कनीयः ) [ केशिमथनम् …..] [ तथा] श्लथ-कुसुमाकुलकुन्तलया ( श्लथानि सुरतलीला स्खलितानि कुसुमानि येभ्यस्तादृशाः, आकुलाः बन्धनराहित्यात् विक्षिप्ताः कुन्तलाः यस्यास्तादृश्या) [ मया सह ] नख – लिखित- घन-स्तन-भारं (नखैः लिखितौ अङ्कितौ घनयोः पीवरयोः स्तनयोः भारौ विस्तारौ येन तम् ) [ केशिमथनम्…..] ॥५॥

अनुवाद – रतिशास्त्र के निगूढ़ तत्त्व को सम्यक् रूप से जाननेवाले तथा उसका अनुष्ठान करनेवाले जिन श्रीकृष्ण के साथ सुरतकाल में मैं कोकिल के कलरव के समान कुहक उठी, मेरा कबरी – बन्धन खुल गया और उसमें संयुक्त कुसुमावली शिथिल होकर गिर गयी, उन्होंने अपने नखों के आघात से मेरे पीन स्तनयुगल पर न जाने क्या-क्या लिख दिये, हे सखि ! उन प्रियतम श्रीकृष्ण से मुझे मिला दो ॥५ ॥

पद्यानुवाद-

नख -क्षत उर यह नव कुसुमोंका, बिखरा कबरी – बन्धन री ॥ ५ ॥

बालबोधिनी – श्रीराधा अपनी सखी से श्रीकृष्ण के साथ अनुभूत वाम्य रति का वर्णन कर रही है। सुरतकाल के समय मैं कोयल के समान शब्द करती थी ।

कलरवशब्दः पारावत पर्य्यायः । रसिक सर्वस्वकार ने कहा है “रतिकाल” के समय नायक के द्वारा चुम्बन इत्यादि किये जाने के समय नायिका कोयल, पारावत आदि के समान सीत्कार की आवाज करती है।

श्रीकृष्ण मेरे केशों को पकड़कर मेरा चुम्बन करते थे तथा मेरे अधरों का पान करते थे। रतिक्रीड़ा में प्रवृत्त होकर वे मेरे पीन तथा सघन स्तनों पर नखक्षत करते थे- सखी, मुझे उनसे मिला दो ॥५ ॥

चरण – रणित – मणि – नूपुरया परिपूरितं सुरत- वितानम् ।

मुखर – विशृंखल मेखलया सकच – ग्रह – चुम्बनदानम्-

सखि हे केशीमथनमुदारम्… ॥६॥

अन्वय-चरण-रणित- मणि- नूपुरया (चरणयोः पादयोः रणिती शब्दितौ मणिनुपूरौ मणिमय-मञ्जीरौ यस्याः तादृश्या) [ मया सह ] परिपूरित सुरत- वितानं (परिपूरितः सम्पूर्णतां प्रापितः सुरतवितानः परि-रम्भण – विस्तारः येन तादृशं) [केशिमथनम्….] [तथा ] मुखर – विशृंखलामेखलया (पूर्वं मुखराः शब्दायमानाः पश्चाच्च विशृंखला त्रुटितगुणा मेखला काञ्ची यस्याः तादृश्या) [ मया सह ] सकच-ग्रह- चुम्बन दानं (सकचग्रहंकेशग्रहणपूर्वकं यथा तथा चुम्बनदानं येन तथोक्तं ) [ केशिमथनम्….] ॥६॥

अनुवाद – केलिक्रीड़ा काल में मेरे चरणों के मणिखचित नूपुरों की रुन्झुन् ध्वनि गूँज उठती थी, करघनी मुखरित होकर क्रमानुसार विशृंखलित हो गयी थी। उस सुरतक्रीड़ा का परिपूर्ण विस्तार करनेवाले, मेरे केशपाश को ग्रहणकर मुखमण्डल पर बारम्बार चुम्बन करनेवाले श्रीकृष्ण से मुझे मिला दो ।

पद्यानुवाद-

मेरी ये पायल बज उठती रह रहकर मृदु झन झन री ॥ ६ ॥

बालबोधिनी – सखि ! जिस समय श्रीकृष्ण सुचारु रूप से सुरतक्रीड़ा का सम्पादन करते थे, उस समय मेरे पैरों के मणिपूरित नूपुर झंकृत हो उठते थे। पहले तो मेरी कटि- करघनी बजने लगती थी, किन्तु बाद में वह टूट जाने के कारण निःशब्द जाती थी। मेरे केशों को पकड़कर वे मेरा चुम्बन करते थे, हे सखि ! मुझे उन्हीं श्रीकृष्ण से मिला दो ॥ ६ ॥

रति – सुख-समय-रसालसया दरमुकुलित- नयन – सरोजम् ।

निः सह – निपतित – तनुलतया मधुसूदनमुदितमनोजम्

सखि हे केशीमथनमुदारम्……॥७॥

अन्वय – रतिसुख-समय-रसालसया (रत्या यत् सुखं तस्य यः समयःकालः तत्र यः रसः चेतसो द्रवीभावः तेन अलसया निश्चेष्टया) [ मया सह ] दरमुकुलित-नयन- सरोजम् (दरमुकुलिते ईषन्मुद्रिते नयनसरोजे लोचनपङ्कजे यस्य तादृशं ) [केशिमथनम्…] [तथा] निःसह-निपतित तनुलतया [निःसहं शिथिलम् अपाटवं यथा तथा निपतिता तनुलता यस्याः तादृश्या [ मया सह ] उदित – मनोजं (उदितः आविर्भूतः मनोजः कामो मयि अभिलाष इति यावत् यस्य तादृशं ) मधुसूदनं [केशिमथनम्….]॥ [अत्र मधुसूदनमिति श्लिष्टम् अनेन भृङ्गो यथा अन्यकुसुमावलीनां मधु क्रमेणास्वादयन् कमलिन्या उत्कर्षमनुभूय तस्यामेवासक्तो भवति तद्वदयमपीति स्वमससो वैदग्ध्यमेव बोधितम्; अतएव उदितमनोजम् इतिविशेषणं सर्वथा सङ्गच्छते ॥७॥

अनुवाद उनके साथ रति-विलास करती हुई अतिशय अनङ्गसुख के अनुभव से अलसा गयी थी, मेरा अङ्ग अङ्ग अवसन्न हो गया था, मेरी देहलता रतिश्रम के कारण सामर्थ्यरहित होकर एकान्त में निर्जीव होकर निढाल हो गयी, उस समय जिन श्रीकृष्ण के नयनकमल अनङ्ग-रस से सिक्त होकर ईषत् खुले हुए थे और जिनके मन में विषमतर मदनविकार निरन्तर विहार कर रहा था, सखि री ! उन प्रियतम श्रीकृष्ण से मेरा मिलन करा दो ॥७॥

७ नं. श्लोक का तात्पर्य-

अलसा का अर्थ है- मन्थरा । रतिसुख समये द्वयोरेककालं रेतःकण क्षरण समये यो रसः तदेकाग्री भावस्तेन अलसा मन्थरा ।

दर मुकुलिते अर्थात् ईषत् निमीलिते।

निःसहाअसमर्थः । उदित मनोजम् अर्थात् अभ्युदित कामम्। निपतित तनुलता अर्थात् विपरीत रति । असमर्था-च्युति कालोत्तरावस्था इत्यर्थ ।

भरत मुनि ने कहा है-

अङ्गे स्वेदः श्लथत्वं च केशवस्त्रादि संवृत्ति ।

जाते च्युति सुखे नार्या विरामेच्छा च गम्यते ॥

पद्यानुवाद-

मुरझाई मैं इधर उधर वे मुकुलित केशि- निकन्दन री ॥७ ॥

बालबोधिनी – श्रीराधा रतिसुख के अनुभव में डूबकर अलसा गयी तथा श्रीकृष्ण ने अपने नेत्रकमलों को सामान्य रूप से बन्द कर लिये हैं। भ्रमर जैसे एक-एक कर सभी पुष्पों पर बैठकर मधुपान करता है, परन्तु कमलिनी का उत्कर्ष देखकर उसमें अतिशय आसक्त रहता है तथा प्रमत्त होकर मधुपान करते हुए उसी में ही विश्राम करता है, वैसे मधुसूदन पुष्पों के जैसे समस्त गोपियों का मधुपान करने पर सबको छोड़कर राधा-कमलिनी में अतिशय आसक्त हैं तथा वहीं उनका विश्राम स्थल है । उसी में ही समस्त प्रकार के रतिसुख का आनन्द अनुभव करते हैं।

इस प्रकार श्रीराधा के मन में श्रीकृष्ण की विदग्धता का अनुभव होने पर वह भी अनुरागिणी हो गयी।

आज श्रीराधा के मन में श्रीहरि के साथ लीला विनोद करते हुए पूर्व अनुभूत विषय स्मरण होने से व्याकुल होकर सखी से कहने लगी- सखि ! उन श्रीकृष्ण से मिला दो ॥७॥

श्रीजयदेव-भणितमिदमतिशय-मधुरिपु-निधुवन-शीलम् ।

सुखमुत्कण्ठित-गोपवधू- कथितं वितनोतु सलीलम् –

सखि हे केशीमथनमुदारम्… …॥८ ॥

अन्वय– इदम् उत्कण्ठित-गोप-वधू कथितं (उत्कण्ठितायाः कृष्णप्राप्तौ उत्सुकाया गोपवध्वा राधिकायाः कथितं यत्र तत्) सलीलम् (सविलासम्) अतिशय – मधुरिपुनिधुवन – शीलं ( अतिशयेन मधुरिपोः कृष्णस्य निधुवनं सुरतं शीलयति स्मारयतीति तत्) श्रीजयदेवभणितम् (श्रीजयदेवोक्तिः) [भक्तानां] सुखं वितनोतु (विस्तारयतु) सखिहे…. ॥८ ॥

अनुवाद – श्रीजयदेव कवि द्वारा विरचित विरह-विधुरा उत्कण्ठिता नायिका द्वारा वर्णित श्रीकृष्ण के प्रगाढ़तर शृङ्गार विषयक सुरत- वृत्तान्त पढ़ने और सुननेवाले भागवत जनों का कल्याण वर्द्धन करें ॥ ८ ॥

पद्यानुवाद-

राधा वर्णित मधुक्रीड़ाका, करता कविअभिनन्दन री ॥८ ॥

बालबोधिनी – इस गीत का उपसंहार करते हुए श्रीजयदेव कवि कहते हैं कि यह गीत मैंने प्रतिपादित किया, परन्तु इस गीत में वर्णित समस्त प्रसङ्ग का वर्णन श्रीराधाजी ने अपनी सखी के समक्ष प्रस्तुत किया है। इस गीत का वर्णन करनेवाली श्रीराधा उत्कण्ठिता नायिका हैं और गीत में विदग्ध श्रीकृष्ण की कामक्रीड़ा-विषयक चरित्रों का विस्तार के साथ वर्णन हुआ है।

भ्रमर जैसे एक-एक करके फूलों पर बैठकर मधुपान करता है, परन्तु कमलिनी का उत्कर्ष देखकर उसी में आसक्त हो जाता है और प्रसन्न होकर मधुपान करते हुए उसी में विश्राम करता रहता है, उसी प्रकार श्रीमधुसूदन भी पुष्पवत् समस्त गोपियों का त्याग कर मेरा उत्कर्ष जानकर मेरे प्रति अत्यासक्त रूप से अनुरागी हुए हैं। मैं भी कृष्ण की रति- विदग्धता का अनुभव कर उनकी अनुरागिणी हो गयी हूँ।

श्रीराधा के मन में पूर्व अनुभूत लीलाओं का स्मरण होने पर अतिशय अधीर होकर उन्होंने श्रीश्यामसुन्दर से मिलने के लिए अपनी सखी को अपनी हृदय की बात सुनायी।

श्रीजयदेव कवि वर्णित परम उत्कण्ठिता निधुवन- नागरी श्रीराधाका श्रीकृष्णके प्रति अनुराग तथा सुरत-क्रीड़ा का यह वर्णन सबका मङ्गल विधान करे।

इस सम्पूर्ण गीत में विप्रलम्भ शृङ्गार रस है तथा लय छन्द है॥८ ॥

हस्त-स्त्रस्त-विलास-वंशमनृजु-भ्रुवल्लिमद्वल्लवी-

वृन्दोत्सारि-दृगन्त-वीक्षितमति स्वेदार्द्र-गण्डस्थलम् ।

मामुद्वीक्ष्य विलज्जित-स्मित-सुधा-मुग्धाननं कानने

गोविन्दं व्रजसुन्दरीगण -वृतं पश्यामि हृष्यामि च ॥१॥

अन्वय – [संख्या आनीता श्रीराधा गोपयुवती परिवृतं कृष्णम- वलोक्याह]सखि, कानने (वने) व्रजसुन्दरीगणवृतम् (व्रजयुवती- गणवेष्टितम्) अनृजुभ्रूवल्लिमवल्लवी – वृन्दोत्सारि – दृगन्त-वीक्षितं (अनृजवः कुटिलाः भ्रुवल्लयः भ्रूलताः यासां तादृशीनां वल्लवीनां गोपाङ्गनानां वृन्दैः समूहैः उत्सारी भङ्गया उत्क्षिप्तः दृशाम् अन्तो यस्मिन् तत् सकटाक्षमित्यर्थः वीक्षितं दृष्टं), [ अतएव] माम् उद्वीक्ष्य विलज्जितस्मित-सुधामुग्धाननं (विलज्जितया सविशेष- लज्जा- मिश्रितया स्मितसुधया सुधावन्मधुरस्मितेन मुग्धं मोहकरम् आननं वदनं यस्य तम्) अतिस्वेदार्द्रगण्डस्थलम् (अतिस्वेदेन मयि अत्यावेशेनेति शेषः, आर्द्र सिक्तं गण्डस्थलं यस्य तादृशं), [तथा] हस्तस्रस्तविलासवंशम् (हस्त्याभ्यां स्रस्तः स्खलितः विलासवंशः मोहन वेणुर्यस्य तं) गोविन्दं पश्यामि हृष्यामि ( आनन्दमनुभवामि ) च ॥ १ ॥

अनुवाद – हे सखि ! कुटिलतर भ्रूलतामयी गोपवल्लभियों के साथ लीला विलास करते हुए उनके किसी मनोरम अङ्ग पर दृष्टि निक्षिप्त किये हुए, नेत्रों के सङ्केत से उन्हें दूर हटानेवाले, ब्रजसुन्दरियों के समूह से आवृत श्रीकृष्ण मुझे देखते ही विस्मयाविष्ट हो गये। उस समय मदनावेश के कारण उनके ललित हाथों से वंशी गिर पड़ी, गण्डस्थल पसीने से भीग गया। हर्षोल्लास से उनका मुखकमल मन्द मुस्कान सी मकरन्द सुधा से परिपूर्ण हो गया। उनकी ऐसी स्थिति देखकर मुझे एक अनिर्वचनीय आनन्द हो रहा है।

पद्यानुवाद-

ले चल उन कुञ्जोंमें जिनमें, ब्रजबालायें घेरे-

रहती हैं श्रीहरिको आतुर, पर दिखते ही मेरे-

हाथोंसे उनके गिर पड़ती, बंशी सहज सबेरे ।

दूर कटाक्षोंसे कर देते, गोपीजनके भेरे ॥

बालबोधिनी – विरह में तीन प्रकार का अनुभव होता है – स्मरण, स्फूर्ति और आविर्भाव । श्रीराधा का कृष्ण-विरह में पहले स्मरण हुआ, सुदीप्त महाभाव में उनके हृदय में लीलाएँ स्वतःस्फूर्त्त हुई और अब उन्हें साक्षात् अनुभव हो रहा है। वे सखी से कहती हैं- देख सखि ! मैं इस व्रजकानन में ब्रजसुन्दरियों के साथ विराजमान श्रीगोविन्द को देखकर हँस रही हूँ और आनन्दित हो रही हूँ।

सखि ने प्रश्न किया-अरी मुग्धे ! जब श्रीकृष्ण तुम्हें छोड़कर दूसरी गोपललनाओं के साथ विहार कर रहे हैं, तब तुम्हें आनन्द क्यों हो रहा है?

श्रीराधा कहती हैं-जब ऐसी स्थिति में वे मुझे देखेंगे तो बहुत अधिक लज्जित हो जायेंगे, लज्जा के मारे वे पसीने-पसीने हो जायेंगे, उनके कपोल भी पसीने से भीग जायेंगे। मेरे सात्त्विक भावों को देखकर उनके अङ्गों में भी सात्त्विक भाव उदित हो जायेंगे। लज्जा के कारण उनके हाथों से बंशी स्खलित हो पड़ेगी। उस समय वे अपने भु-भङ्गियों से – इशारे से उन मनोहर भुलताओं से युक्त व्रजवल्लभियों को अपने पास से हटा देंगे। उस समय उनका मुख-मण्डल मन्द मुस्कान से अतीव मनोहर होगा। इस प्रकार प्रियतम को देखकर परमानन्दित होऊँगी। सखि ! ऐसे प्रियतम श्रीकृष्ण से कब मिलूँगी ?

इस श्लोक में शार्दूलविक्रीडित छन्द तथा दीपकालङ्कार, विप्रलम्भ-शृङ्गार-रस, पञ्चाली रीति, लारानुप्रासालङ्कार तथा दक्षिण नायक है ॥ १ ॥

दुरालोकः स्तोक-स्तवक-नवकाशोक-लतिका-

विकाशः कासारोपवन-पवनोऽपि व्यथयति ।

अपि भ्राम्यद्भृङ्गी रणित-रमणीया न मुकुल-

प्रसूतिश्चूतानां सखि शिखरिणीयं सुखयति ॥२॥

अन्वय[इदानीं विरहव्याकुलतां दर्शयति ] – सखि, [अधुना] स्तोकस्तवक- नवकाशोक लतिका विकाशः (स्तोकस्तवका अल्पगुच्छा या नवका नवपुष्पिता अशोकलतिका तस्याः विकाशः) दुरालोकः ( उद्दीपकत्वात् नितरां दुर्द्दशः); [ तथा ] कासारोपवन- पवनोऽपि (कासारः सरोवरः तेन सम्पृक्तं यत् उपवनं तस्य पवनोऽपि [एतेन वायोः शैत्यसौगन्ध्यमान्द्यगुणो ध्वनितः] व्यथयति ( सन्तापयति); [ तथा ] भ्राम्यद्भृङ्गी-रणित- रमणीया (भ्राम्यन्तीनां भृङ्गीणां रणितैः गुञ्जितैः रमणीया मनोहारिणी) शिखरिणी (प्रशस्ताङ्कुरसमन्विता) इयं चूतानां (आम्राणां) मुकुलप्रसूतिः (मुकुलोद्गमः) अपि न सुखयति [अपितु सन्तापयत्येव; अधुना अशोकोऽपि शोकदायी, समीरणोऽपि पीड़कः; रमणीयापि उद्वेगकरीति- अहो विरहवैपरीत्यम् ] ॥२॥

अनुवाद – सखि ! श्रीकृष्ण के विरह में मेरा मन अब किसी भी प्रकार से परितृप्त नहीं हो रहा है। देखो ! यह ईषत् विकसित अशोक की नयी लता की प्रफुल्ल शोभा मेरे नयनों का शूल बन गयी है। इस सरोवर के समीप स्थित उपवनों से आनेवाली समीरण (बयार) भी मेरा अङ्ग अङ्ग दुःखा रही है। चारों ओर भ्रमण करनेवाले भौरों के सुन्दर गुञ्जन भी अच्छे नहीं लग रहे हैं। उनके गुञ्जन से मनोज्ञ बने हुए वृक्षों के अग्रभाग में निकले हुए आमों के नये-नये बौर भी मुझे सुखी नहीं बनाते।

पद्यानुवाद-

मुझे जलाते हैं अशोकके कोमल किशलय फूल ।

बहने वाला मृदु समीर भी, छू उपवन सर- कूल ॥

अगुञ्ज मधु आम्र – मञ्जरी चुभती है ज्यों शूल ।

जग सरसा है, पर मेरे तो हियमें उड़ती है धूल ॥

बालबोधिनी – श्रीराधा विप्रलम्भ-शृङ्गार के विभावों का वर्णन करती हुई सखी से कह रही हैं- इस वासन्तिक वेला में अशोक वृक्षों को देखना कठिन हो गया है। वृक्ष के नवीन पल्लव विरहाग्नि को उद्दीप्त कर रहे हैं। छोटे-छोटे गुच्छों से युक्त अशोक लताओं को विकसित करनेवाली जो वायु सरोवरों के उपवनों से होकर आ रही है, वह अति पीड़ादायिनी हो रही है।

दुरालोक का विग्रह है- दुःखेन आलोक अवलोकनम् यस्याऽसौ ।

आम्रवृक्ष के अग्रभाग में जो आम्रमञ्जरियाँ निकल रही है और उनके चारों ओर मँडराती हुई भ्रमरियाँ गुजार कर रही हैं। अतःपर यह आम्र मञ्जरी श्रीकृष्ण मिलन में जो मुझे सुखी बनाया करती थीं, वह अब दुःखी बना रही हैं। भ्राम्यभृङ्गी पद में भ्रमरियों का निर्देश करके श्रीराधा अपने मन का यह भाव प्रकाशित कर रही हैं कि उनके हृदय में श्रीकृष्ण के अतिरिक्त किसी भी दूसरे पुरुष की कामना नहीं है। उनकी दृष्टि में एकमात्र कमनीय पुरुष श्रीकृष्ण ही हैं।

प्रस्तुत श्लोक में शिखरिणी छन्द है । रसैरुद्रैश्छिन्ना यमनसभा सः शिखरिणी। इसमें समुच्चय एवं अनुप्रास अलङ्कार, क्रियोचित्य तथा विप्रलम्भ-शृङ्गार, मागधी एवं गौड़ीया रीति है ॥ २ ॥

साकूत-स्मितमाकुलाकुल-गलद्धम्मिल्लमुल्लासित-

भ्रु-वल्लीकमलीक-दर्शित-भुजामूलार्द्धदृष्टस्तनम् ।

गोपीनां निभृतं निरीक्ष्य गमिताकांक्षश्चिरं चिन्तय-

न्नन्तर्मुग्ध-मनोहरं हरतु वः क्लेशं नवः केशवः ॥३॥

इति श्रीगीतगोविन्द महाकाव्ये अक्लेश- केशवो नाम द्वितीयः सर्गः ।

अन्वय – [राधायां नीतं कृष्णाभिप्रायं व्यञ्जयन्नाशास्ते कविः ] – गोपीनां (गोपाङ्गनानां) साकूतस्मितम् (साकूतं प्रेमाभिलाषसमेतं स्मितं मन्दहासः यस्मिन् तत्) आकुलाकुल- गलद्धम्मिल्लम् (आकुलाकुलम् अति शिथिलं यथास्यात् तथा गलन्तः स्खलन्तः धम्मिल्लाः केशबन्धः यत्र तत्) उल्लासित-भ्रूवल्लीकम् (उल्लासिता कुटिलता भ्रूवल्ली भ्रूलता यत्र तत्) अलीकदर्शित-भुजामूलार्द्धदृष्टस्तनम् (अलीकं सव्याजं यथा तथा दर्शितेन भुजामूलेन बाहुमूलेन अर्द्ध दृष्टौ स्तनौ यत्र तत्) [अतएव] मुग्धमनोहरं निभृतं रहस्यं तद्भावप्रकाशनं) निरीक्ष्य [श्रीराधायाः सर्वोत्तमतां] चिरम् अन्तः (चित्ते) चिन्तयन् (विचारयन्) [तथा] [अतः उत्तमा अन्या नास्तीति] गमिताकाङ्क्षः (गमिता तस्यामेव प्रापिता आकाङ्क्षा येन स तथोक्तः) नवः (श्रीराधिकोत्कर्षनिश्चयेन नव इव जातः) केशवः (हरिः) वः (युष्माकं) क्लेशं (संसारतापं) हरतु (दूरीकरोतु ) [ अतः सर्गोऽयमक्लेशो गतः श्रीराधिकासम्बन्धि-मनः साधारण्याभासरूपः क्लेशः यस्मात् स केशवो यत्र सः ] ॥ ३ ॥

अनुवाद – अविवेकी मन को आकर्षित करनेवाली गोपियों की साकूत मुस्कान, कामोद्रेक के कारण रोमाञ्च आदि हो जाने से खुले केशवाली, ऊपर उठे हुए हाथों के कारण व्यर्थ ही दिखाये गये दोनों स्तनों का अवलोकन करके अपने हृदय में चिरकाल चिन्तन करके श्रीकृष्ण ने उनके प्रति अपनी आकांक्षाओं को विनष्ट कर दिया है, अब राधाभाव से उल्लसित होकर नवनवायमान रूप से चमत्कृत हो रहे हैं, – ऐसे तरुण केशव आप सबके क्लेशों को विनष्ट करें।

बालबोधिनी – दूसरे सर्ग के अन्तिम श्लोक में महाकवि श्रीजयदेव भक्तजनों को आशीर्वाद देते हुए कहते हैं कि विदग्ध श्रीकृष्ण ने गोपियों की चार प्रकार की चेष्टाओं का अपने हृदय में विचार किया, इन चेष्टाओं को देखकर कोई भी मूर्ख आकर्षित हो जाया करता है।

(१) साकूतास्मितम्गोपियों की मुस्कान स्वाभाविक तो है ही, अपितु साभिप्राय भी है। अवश्य उस स्मित में कामवासना का पुट था। तरुण पुरुष को देखकर कामिनियों की कामचेष्टाओं का विजृम्भण होना स्वाभाविक ही है।

(२) आकुलाकुललगद्धम्मिलम् – कामोद्रेक के कारण रोमाञ्च इत्यादि हो जाने से उन गोपियों के केशबन्ध विस्रस्त हो जाते थे ।

(३) श्रीकृष्ण को देखकर कामोद्रेक से उनके नयनयुगल चञ्चल हो गये।

(४) यद्यपि अपने भुजामूलों अथवा हाथों को ऊपर उठाने का कोई भी कारण नहीं था, फिर भी जम्भाई आदि के बहाने से वे अपने उन्नत स्तनों को कृष्ण को दिखा रही थीं। परमविवेकी श्रीकृष्ण ने इन चेष्टाओं का अपने हृदय में विचारकर उन्हें व्यर्थ कर दिया। श्रीराधा की अपेक्षा दूसरी कोई श्रेष्ठ नहीं है, इस प्रकार अपने भक्तों के द्वारा स्तुति किये जानेवाले श्रीकेशव समस्त भक्तों के क्लेशों को दूर करें।

प्रस्तुत श्लोक समुच्चय, आशीः तथा परिकर अलङ्कार है। शार्दूल विक्रीड़ित छन्द है ।

इस प्रकार अक्लेश- केशव कुञ्जर- तिलक नामक षष्ठ प्रबन्ध वर्णन हुआ है।

इति अष्ट पदि ६ कुञ्जर तिलक द्वितीयः सर्गः ।

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