आब्रह्मभुवनाल्लोका: पुनरावर्तिनोऽर्जुन।
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते।। गीता 8/16।।

अर्थ : हे अर्जुन! ब्रह्म लोक सहित सभी लोक पुनरावृति हैं, परंतु हे कौन्तेय, मुझे प्राप्त होने वाले का पुनर्जन्म नहीं होता।

व्याख्या : मृत्यु के बाद जीवात्मा कुछ काल के लिए अपने शुभ-अशुभ कर्मों के आधार पर किसी न किसी लोक में वास करती है, यदि पाप ज्यादा हैं तो नरक लोक और यदि पुण्य ज्यादा हैं तो स्वर्ग लोक।

इसके अलावा कुछ विशेष पुण्यात्मा ब्रह्मलोक में भी कर्मों के अनुसार वास करती है। इसप्रकार इन लोकों में अपने फलों को भोग कर वह जीवात्मा, अपने संचित कर्मों के आधार पर नया जन्म लेती है और यह सिलसिला तब तक चलता रहता है जब तक जीव की मुक्ति न हो जाए।

लेकिन कृष्ण कह रहे हैं कि जो जीव मुझे प्राप्त हो जाते हैं उनका पुनर्जन्म नहीं होता। इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वो मुझे पाने के लिए ही मेरे अर्पण कर सभी कर्मों को करता रहे।

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मैं एक पत्नी होने के साथ साथ गृहिणी एवं माँ भी हुँ । लिखने का हुनर... ब्लॉग लिखती रहती हु... सनातन ग्रुप एक सकारात्मक ऊर्जा, आत्मनिर्भर बनाने की प्रेरणा देती जीवनी, राष्ट्रभक्ति गीत एवं कविताओं की माला पिरोया है । आग्रह :आपको पसन्द आये तो ऊर्जा देने के लिए शेयर एवं अपने सुझाव दीजिए ।

शालू सिंह

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