तदा द्रष्टुः स्वरूपेवस्थानम्। योगसूत्र 1/3

अर्थ : तब दृष्टा अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है।

व्याख्या : चित्त आईने की तरह होता है, जैसे हमें अपना ही चेहरा देखने के लिए साफ आईने की जरूरत होती है, गंदे आईने में चेहरा नहीं देख सकते। ऐसे ही यदि चित्त संस्कारों और विकारों से मलिन हो, तो आत्म दर्शन नहीं हो सकता। आत्म स्वरूप के साक्षात्कार के लिए अपने चित्त की सफाई होना जरूरी है।

योग साधना चित्त की सफाई करती है, जिससे मन की हलचल शांत हो जाती है और चित्त वृत्तियों का निरोध हो जाता है। चित्त में स्थिरता आने से साधक अपने आत्मा का प्रतिबिंब अब चित्त में अनुभव करने लगता है। इसी को आत्मसाक्षात्कार कहते हैं। चित्त के साफ होते ही साधक अपने आत्म स्वरूप में स्थिर हो जाता है। – शालू सिंह

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शालू सिंह

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