परमेश्वरस्तुतिसारस्तोत्र – Parameshvar Stuti Saar Stotra

इस परमेश्वरस्तुतिसारस्तोत्र का गुणगान करने से मनुष्य योगिजनों के प्राप्त होने योग्य परमगति को प्राप्त कर लेता है।

|| परमेश्वरस्तुतिसारस्तोत्रम् ||

श्रीगणेशाय नमः ॥

त्वमेकः शुद्धोऽसि त्वयि निगमबाह्यामलमयं

प्रपञ्चं पश्यन्ति भ्रमपरवशाः पापनिरताः ।

बहिस्तेभ्यः कृत्वा स्वपदशरणं मानय विभो

गजेन्द्रे दृष्टं ते शरणद वदान्यं स्वपददम् ॥ १॥

हे शरण देनेवाले परमात्मन् ! तुम एक और शुद्ध हो, किंतु वेद के विरुद्ध बुद्धि रखनेवाले भ्रान्त और पाप परायण जन तुम्हारे ऐसे स्वरूप में भी विकाररूप प्रपञ्च (संसार) देखते हैं। हे सर्वव्यापी भगवन् ! मुझे उन लोगों से अलग करके अपने चरणों की शरण में ले लो। [ अपनी शरण में लेने की ] तुम्हारी उदारता गजेन्द्र के विषय में देखी गयी है कि तुमने उसकी रक्षा करके उसे अपना धाम दे दिया ॥ १॥

न सृष्टेस्ते हानिर्यदि हि कृपयातोऽवसि च मां

त्वयानेके गुप्ता व्यसनमिति तेऽस्ति श्रुतिपथे ।

अतो मामुद्धर्तुं घटय मयि दृष्टिं सुविमलां

न रिक्तां मे याच्ञां स्वजनरत कर्तुं भव हरे ॥ २॥

हे भगवन् ! यदि तुम कृपा करके मेरी रक्षा करते हो तो इससे तुम्हारी सृष्टि मर्यादा की कोई हानि नहीं है। तुमने अनेकों की रक्षा की है, हमारे कानों में यह बात पड़ चुकी है कि तुम्हें शरणागतों की रक्षा करने का व्यसन है, अतः मेरा उद्धार करने के लिये तुम मुझ पर भी अपनी निर्मल दष्टि डालो। अपने भक्तजनों की रक्षा में तत्पर रहनेवाले हे भगवन् ! मेरी प्रार्थना को असफल न करो ॥२॥

कदाहं भोः स्वामिन्नियतमनसा त्वां हृदि भजन्नभद्रे

संसारे ह्यनवरतदुःखेऽति विरसः ।

लभेयं तां शान्तिं परममुनिभिर्या ह्यधिगता

दयां कृत्वा मे त्वं वितर परशान्तिं भवहर ॥ ३॥

हे प्रभो ! मैं कब तुमको अपने हृदय में संयतमन से भजता हुआ अमङ्गलमय एवं सर्वदा दुःखयुक्त इस संसार से विरक्त होकर उस शान्ति को प्राप्त करूँगा जिसको कि महामुनियों ने पाया है। हे भव-बन्धन से मुक्त करनेवाले भगवन् ! तुम दया करके मुझे वही पराशान्ति दो ॥ ३॥

विधाता चेद्विश्वं सृजति सृजतां मे शुभकृतिं

विधुश्चेत्पाता माऽवतु जनिमृतेर्दुःखजलधेः ।

हरः संहर्ता संहरतु मम शोकं सजनकं

यथाहं मुक्तः स्यां किमपि तु तथा ते विदधताम् ॥ ४॥

हे भगवन ! ब्रह्मा यदि संसार की सृष्टि करते है। तो मेरे शुभकर्मो की सृष्टि करें, विष्णु भगवान यदि संसार की रक्षा करते हैं तो जन्म-मरण के दुःखरूपी सागर से मेरी रक्षा करें और शिवजी यदि संसार का संहार करते हैं तो मेरे शोकों का उनके कारणभूत अशुभ कर्मो सहित संहार करें । जिस प्रकार मेरी मुक्ति हो सके वैसा कोई उपाय वे लोग करें ॥४॥

अहं ब्रह्मानन्दस्त्वमपि च तदाख्यः सुविदितः

स्ततोऽहं भिन्नो नो कथमपि भवत्तः श्रुतिदृशा ।

तथा चेदानीं त्वं त्वयि मम विभेदस्य जननीं

स्वमायां संवार्य प्रभव मम भेदं निरसितुम् ॥ ५॥

हे भगवन् ! मेरा नाम ब्रह्मानन्द है और तुम्हारा भी यही नाम प्रसिद्ध है। इसलिये श्रुतिदृष्ट्या’ (सुनने में) मैं तुमसे किसी प्रकार भिन्न नहीं हूँ। ऐसी स्थिति में तुम इस समय अपने और मेरे में भेद को प्रकट करनेवाली अपनी माया दूर कर मेरी भिन्नता को निकाल दो ॥ ५॥

कदाहं हे स्वामिन् जनिमृतिमयं दुःखनिबिडं

भवं हित्वा सत्येऽनवरतसुखे स्वात्मवपुषि ।

रमे तस्मिन्नित्यं निखिलमुनयो ब्रह्मरसिका

रमन्ते यस्मिंस्ते कृतसकलकृत्या यतिवराः ॥ ६॥

हे प्रभो ! मैं कब जन्म-मरणमय घोर दुःखवाले संसार को छोड़कर निरन्तर आनन्दमय सत्य आत्मस्वरूप में नित्य रमण करूँगा, जिसमें कि ब्रह्मा स्वाद के रसिक तथा कृतकृत्य योगीश्वर महामुनि रमण करते हैं ॥६॥

पठन्त्येके शास्त्रं निगममपरे तत्परतया

यजन्त्यन्ये त्वां वै ददति च पदार्थांस्तव हितान् ।

अहं तु स्वामिंस्ते शरणमगमं संसृतिभयाद्यथा

ते प्रीतिः स्याद्धितकर तथा त्वं कुरु विभो ॥ ७॥

हे भगवन् ! तुमको प्रसन्न करने के लिये कोई शास्त्र पढ़ते हैं और कोई तत्पर होकर वेद पढ़ते हैं तथा दूसरे लोग यज्ञ के द्वारा तुम्हारी आराधना करते हैं और तुम्हें रुचिकर वस्तु अर्पण करते हैं; किन्तु हे प्रभो ! मैं तो संसार के दुःखों के डर से तुम्हारी शरण में आया हूँ। हे हित करनेवाले व्यापक परमात्मन् ! जिस प्रकार मुझ पर तुम्हारी प्रसन्नता हो सके वैसा करो ॥७॥

अहं ज्योतिर्नित्यो गगनमिव तृप्तः सुखमयः

श्रुतौ सिद्धोऽद्वैतः कथमपि न भिन्नोऽस्मि विधुतः ।

इति ज्ञाते तत्त्वे भवति च परः संसृतिलयात्

अतस्तत्त्वज्ञानं मयि सुघटयेस्त्वं हि कृपया ॥ ८॥

हे भगवन् ! मैं प्रकाश रूप, नित्य, आकाश के समान व्यापक, पूर्णकाम, आनन्दमय और श्रुतिसिद्ध अद्वैत रूप हूँ; किसी प्रकार ब्रह्म से भिन्न नहीं हूँ, इस प्रकार तत्त्वज्ञान हो जाने पर विवेक-दृष्टि से जगत्का लय हो जाने के कारण ज्ञानी ब्रह्मरूप हो जाता है; इसलिये तुम कृपा करके मुझमें तत्त्वज्ञान भर दो ॥ ८॥

अनादौ संसारे जनिमृतिमये दुःखितमना

मुमुक्षुस्सन् कश्चिद्भजति हि गुरुं ज्ञानपरमम् ।

ततो ज्ञात्वा यं वै तुदति न पुनः क्लेशनिवहैः

भजेऽहं तं देवं भवति च परो यस्य भजनात् ॥ ९॥

जन्म मरण रूप भय से युक्त इस अनादि संसार में मन-ही-मन सदा दुःखी रहनेवाला कोई पुरुष इससे मुक्त होने की इच्छा से परम ज्ञानी गुरु की सेवा करता है और उससे जिस भगवान्को जानकर फिर सांसारिक क्लेश समूहों से पीडित नहीं होता उस देव को मैं भजता हूँ, जिसके भजन से भक्त परब्रह्मस्वरूप हो जाता है ॥९॥

विवेको वैराग्यो न च शमदमाद्याः षडपरे

मुमुक्षा मे नास्ति प्रभवति कथं ज्ञानममलम् ।

अतः संसाराब्धेस्तरणसरणिं मामुपदिशन्

स्वबुद्धिं श्रौतीं मे वितर भगवंस्त्वं हि कृपया ॥ १०॥

हे भगवन् ! मुझमें न विवेक है, न वैराग्य और न शम, दम आदि ज्ञान के अन्य छः साधन ही हैं; मुझमें मुक्त होने की सुदृढ़ इच्छा भी नहीं है; फिर कैसे निर्मल ज्ञान प्राप्त हो सकता है ? इसलिये संसार सागर को पार करने के मार्ग का उपदेश देते हुए तुम कृपा कर मुझको अपनी वैदिक बुद्धि (ब्रह्मविद्या) प्रदान करो ॥१०॥

कदाहं भो स्वामिन्निगममतिवेद्यं शिवमयं

चिदानन्दं नित्यं श्रुतिहृतपरिच्छेदनिवहम् ।

त्वमर्थाभिन्नं त्वामभिरम इहात्मन्यविरतं

मनीषामेवं मे सफलय वदान्य स्वकृपया ॥ ११॥

हे स्वामिन् ! श्रुति ने जिनके त्रिविध परिच्छेद (इयत्ता) का बाध किया है; जो वैदिक बुद्धि से ही जानने योग्य हैं, जो नित्य चिदानन्दघन एवं कल्याण स्वरूप हैं तथा जो ‘त्वम्’ पद के अर्थभूत जीवात्मा से अभिन्न हैं ऐसे आपका निरन्तर अपने हृदय-देश में मैं कब ध्यान करूँगा, हे उदार परमेश्वर ! आप अपनी कृपा से मेरे इस विचार को सफल करें ॥११॥

यदर्थं सर्वं वै प्रियमसुधनादि प्रभवति

स्वयं नान्यार्थो हि प्रिय इति च वेदे प्रविदितम् ।

स आत्मा सर्वेषां जनिमृतिमतां वेदगदितः

ततोऽहं तं वेद्यं सततममलं यामि शरणं ॥ १२॥

हे भगवन् ! जिसके लिये प्रिय होने के कारण ही ये प्राण, धन आदि समस्त वस्तु प्रिय प्रतीत होते हैं; और जो किसी दूसरे के लिये प्रिय होने के कारण प्रिय नहीं है अपितु स्वतः प्रिय है; यह बात वेद में प्रसिद्ध है, वही जन्मने-मरनेवाले समस्त प्राणियों का आत्मा है और उसी का वेदों में वर्णन किया गया है, अतः मैं उसी जानने के योग्य निर्मल आत्मदेव की सदा ही शरण लेता हूँ ॥१२ ।।

मया त्यक्तं सर्वं कथमपि भवेत्स्वात्मनि मतिः

त्वदीया माया मां प्रति तु विपरीतं कृतवती ।

ततोऽहं किं कुर्यां न हि मम मतिः क्वापि चरति

दयां कृत्वा नाथ स्वपदशरणं देहि शिवदम् ॥ १३॥

हे नाथ ! मेरी मति किसी प्रकार आत्मस्वरूप तुममें लगी रहे, इसी उद्देश्य से मैंने अपना सब कुछ परित्याग कर दिया, किन्तु तुम्हारी माया ने तो मेरे प्रति विपरीत ही कार्य किया, अतः अब मैं क्या करूँ, मेरी बुद्धि कुछ काम नहीं करती, अब तुम्हीं दया करके मुझे कल्याण देनेवाले अपने चरणों की शरण दो ॥ १३ ॥

नगा दैत्याः कीशा भवजलधिपारं हि गमितास्त्वया

चान्ये स्वामिन्किमिति समयेऽस्मिञ्छयितवान् ।

न हेलां त्वं कुर्यास्त्वयि निहितसर्वे मयि विभो

न हि त्वाऽहं हित्वा कमपि शरणं चान्यमगमम् ॥ १४॥

हे प्रभो! तुमने पर्वत-वृक्षादि स्थावरों, दैत्यों, वानरों और दूसरों को भी संसारसागर के पार कर दिया। इस समय क्यों सो गये? हे अन्तर्यामिन् ! तुम्हारे विराट् स्वरूप में समस्त संसार है, इसलिये तुम मेरा अनादर न करो, तुमको छोड़कर मैंने दूसरे की शरण नहीं ली ॥ १४ ॥

अनन्ताद्या विज्ञानगुणजलधेस्तेऽन्तमगमन्नतः

पारं यायात्तव गुणगणानां कथमयम् ।

गृणन्यावद्धित्वा जनिमृतिहरं याति परमां

गतिं योगिप्राप्यामिति मनसि बुद्ध्वाहमनवम् ॥ १५॥

हे भगवन् ! विशेष ज्ञान रखनेवाले शेष, शारदा आदि भी यदि तुम्हारे गुणरूपी सागर के पार न जा सके, तो मुझ-जैसा साधारण जन तुम्हारे गुणसमूह का पार कैसे पा सकता है; परन्तु जन्म-मरणरूप कष्ट को हरनेवाले तुझ परमेश्वर का जितना ही हो सके उतना ही गुणगान करके मनुष्य योगिजनों के प्राप्त होने योग्य परमगति को प्राप्त कर लेता है, ऐसा मन में जानकर मैंने आपकी स्तुति की है॥१५॥

इति श्रीमन्मौक्तिकरामोदासीनशिष्यब्रह्मानन्दविरचितं परमेश्वरस्तुतिसारस्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

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