सोम अर्थात् चंद्रमा की उत्पत्ति का यह स्तोत्र सोमोत्पत्तिस्तोत्रम् को याजुर्वैदिकी पारमात्मिकोपनिषदन्तर्गत से लिया गया है।

वैज्ञानिक सिद्धांत-चंद्रमा की उत्पत्ति

चंद्रमा की उत्पत्ति आमतौर पर माने जाते हैं कि एक मंगल ग्रह के शरीर ने धरती पर मारा, एक मलबे की अंगूठी बनाकर अंततः एक प्राकृतिक उपग्रह, चंद्रमा में एकत्र किया, लेकिन इस विशाल प्रभाव परिकल्पना पर कई भिन्नताएं हैं, साथ ही साथ वैकल्पिक स्पष्टीकरण और शोध में चंद्रमा कैसे जारी हुआ। अन्य प्रस्तावित परिस्थितियों में कब्जा निकाय, विखंडन, एक साथ एकत्रित (संक्षेपण सिद्धांत), ग्रहों संबंधी टकराव (क्षुद्रग्रह जैसे शरीर से बने), और टकराव सिद्धांत शामिल हैं। मानक विशाल-प्रभाव परिकल्पना मंगल ग्रह के आकार के शरीर को बताती है, थिआ कहलाता है, पृथ्वी पर असर पड़ता है, जिससे पृथ्वी के चारों ओर एक बड़ी मलबे की अंगूठी पैदा होती है, जिसके बाद चंद्रमा के रूप में प्रवेश किया जाता है। इस टकराव के कारण पृथ्वी के 23.5 डिग्री झुका हुआ धुरी भी उत्पन्न हुई, जिससे मौसम उत्पन्न हो गया। चंद्रमा के ऑक्सीजन समस्थानिक अनुपात पृथ्वी के लिए अनिवार्य रूप से समान दिखते हैं। ऑक्सीजन समस्थानिक अनुपात, जिसे बहुत ठीक मापा जा सकता है, प्रत्येक सौर मंडल निकाय के लिए एक अद्वितीय और विशिष्ट हस्ताक्षर उत्पन्न करता है। अगर थिया एक अलग प्रोटॉपलैनेट था, तो शायद पृथ्वी से एक अलग ऑक्सीजन आइसोटोप हस्ताक्षर होता, जैसा कि अलग-अलग मिश्रित पदार्थ होता है। इसके अलावा, चंद्रमा के टाइटेनियम आइसोटोप अनुपात (50Ti / 47Ti) पृथ्वी के करीब (4 पीपीएम के भीतर) प्रतीत होता है, यदि कम से कम किसी भी टकराने वाला शरीर का द्रव्यमान चंद्रमा का हिस्सा हो सकता है।

|| सोमोत्पत्तिस्तोत्रम् याजुर्वैदिकी पारमात्मिकोपनिषदन्तर्गतं ||

ऋषय ऊचुः –

कौतूहलं समुत्पन्नं देवता ऋषिभिः सह ।

संशयं परिपृच्छन्ति व्यासं धर्मार्थकोविदम् ॥ १॥

कथं वा क्षीयते सोमः क्षीणो वा वर्धते कथम् ।

इमं प्रश्नं महाभाग ब्रूहि सर्वमशेषतः ॥ २॥

व्यास उवच –

श्रृण्वन्तु देवताः सर्वे यदर्थमिह आगताः ।

तमर्थं सम्प्रवक्ष्यामि सोमस्य गतिमुत्तमाम् ॥ ३॥

अग्नौ हुतं च दत्तं च सर्वं सोमगतं भवेत् ।

तत्र सोमः समुत्पन्नः स्मितांशुहिमवर्षणः ॥ ४॥

अष्टाशीति सहस्राणि विस्तीर्णो योजनानि तु ।

प्रमाणं तत्र विज्ञेयं कलाः पञ्चदशैव तत् ॥ ५॥

षोडशी तु कलाप्यत्र इत्येकोऽपि विधिर्भवेत् ।

तं च सोमं पपुर्देवाः पर्यायेणानुपूर्बशः ॥ ६॥

प्रथमां पिबते वह्निः द्वितियां पिबते रविः ।

विश्वेदेवास्तृतीयां तु चतुर्थीं सलिलाधिपः ॥ ७॥

पञ्चमीं तु वषट्कारः षष्टीं पिबत वासवः ।

सप्तमीं ऋषयो दिव्याः अष्टमीमज एकपात् ॥ ८॥

नवमीं कृष्णपक्षस्य यमः प्राश्नाति वै कलाम् ।

दशमीं पिबते वायुः पिबत्येकादशीमुमा ॥ ९॥

द्वादशीं पितरः सर्वे सम्प्राश्नन्ति भागशः ।

त्रयोदशीं धनाध्यक्षः कुबेरः पिबते कलाम् ॥ १०॥

चतुर्दशीं पशुपतिः पञ्चदशीं प्रजापतिः ।

निष्पीत एककलाशेषः चन्द्रमा न प्रकाशते ॥ ११॥

कला षोडशकायां तु आपः प्रविशते सदा ।

अमायां तु सदा सोमः ओषधिः प्रतिपद्यते ॥ १२॥

तमोषधिगतं गावः पिबन्त्यम्बुगतं च यत् ।

यत्क्षीरममृतं भूत्वा मन्त्रपूतं द्विजातिभिः ॥ १३॥

हुतमग्निषु यज्ञेषु पुनराप्यायते शशी ।

दिने दिने कलावृद्धिः पौर्णिमास्यां तु पूर्णतः ॥ १४॥

नवो नवो भवति जायमानोऽह्नां केतुरुषसामेत्यग्रे ।

भागं देवेभ्यो विदधात्यायन् प्रचन्द्रमास्तगति दीर्घमायुः ॥ १५॥

त्रिमुहूर्तं वसेदर्के त्रिमुहूर्तं जले वसेत् ।

त्रिमुहूर्तं वसेद्गोषु त्रिमुहूर्तं वनस्पतौ ॥ १६॥

वनस्पतिगते सोमे यस्तु हिंस्याद्वनस्पतिम् ।

घोरायां ब्रूणहत्यायां युज्यते नात्र संशयः ॥ १७॥

वनस्पतिगते सोमे अनडुहो यस्तु वाहयेत् ।

नाश्नन्ति पितरस्तस्य दशवर्षाणि पञ्च च ॥ १८॥

वनस्पतिगते सोमे पन्थानं यस्तु कारयेत् ।

गावस्तस्य प्रणश्यन्ति चिरकालमुपस्थिताः ॥ १९॥

वनस्पतिगते सोमे स्त्रियं वा योऽधिगच्छति ।

स्वर्गस्थाः पितरस्तस्य च्यवन्ते नात्र सेशयः ॥ २०॥

वनस्पतिगते सोमे परान्नं यस्तु भुञ्जति ।

तस्य मासकृतो होमः दातारमधिगच्छति ॥ २१॥

वनस्पतिगते सोमे यः कुर्याद्दन्तधावनम् ।

चन्द्रमा भक्षितो येन पितृवंशस्य घातकः ॥ २२॥

सोमोत्पत्तिमिमां यस्तु श्राद्धकाले सदा पठेत् ।

तदन्नममृतं भूत्वा पितॄणां दत्तमक्षयम् ॥ २३॥

सोमोत्पत्तिमिमां यस्तु गुर्विणीं श्रावयेत्प्रियाम् ।

ऋषभं जनयेत्पुत्रं सर्वज्ञं वेदपारगम् ॥ २४॥

सोमोत्पत्तिमिमां यस्तु पर्वकाले सदा पठेत् ।

सर्वान् कामानवाप्नोति सोमलोकं स गच्छति ॥ २५॥

श्रीसोमलोकं स गच्छत्यों नम इति ॥

शुक्ले देवान्, पितॄन् कृष्णे, तर्पयत्यमृतेन च

यश्च राजा द्विजातीनां तस्मै सोमात्मने नमः ॥ २६॥

इति सोमोत्पत्तिः स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ।

मैं एक पत्नी होने के साथ साथ गृहिणी एवं माँ भी हुँ । लिखने का हुनर... ब्लॉग लिखती रहती हु... सनातन ग्रुप एक सकारात्मक ऊर्जा, आत्मनिर्भर बनाने की प्रेरणा देती जीवनी, राष्ट्रभक्ति गीत एवं कविताओं की माला पिरोया है । आग्रह :आपको पसन्द आये तो ऊर्जा देने के लिए शेयर एवं अपने सुझाव दीजिए ।

शालू सिंह

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