यह कल-कल छल-छल बहती, क्या कहती गंगा धारा ?
युग-युग से बहता आता, यह पुण्य प्रवाह हमारा ॥धृ॥

हम इसके लघुतम जल कण, बनते मिटते हैं क्षण-क्षण ।
अपना अस्तित्व मिटाकर, तन मन धन करते अर्पण ।
बढते जाने का शुभ प्रण, प्राणों से हमको प्यारा ॥१॥

इस धारा में घुल मिलकर, वीरों की राख बही है ।
इस धारा में कितने ही, ऋषियों ने शरण ग्रही है ।
इस धारा की गोदी में, खेला इतिहास हमारा ॥२॥

यह अविरल तप का फल है, यह राष्ट्रप्रवाह प्रबल है ।
शुभ संस्कृति का परिचायक, भारत माँ का आँचल है ।
हिंदु की चिरजीवन, मर्यादा धर्म सहारा ॥३॥

क्या इसको रोक सकेंगे, मिटने वाले मिट जाएँ ।
कंकड पत्थर की हस्ती, क्या बाधा बनकर आए ।
ढह जायेंगे गिरि पर्वत, काँपे भूमंडल सारा ॥४॥

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मैं एक पत्नी होने के साथ साथ गृहिणी एवं माँ भी हुँ । लिखने का हुनर... ब्लॉग लिखती रहती हु... सनातन ग्रुप एक सकारात्मक ऊर्जा, आत्मनिर्भर बनाने की प्रेरणा देती जीवनी, राष्ट्रभक्ति गीत एवं कविताओं की माला पिरोया है । आग्रह :आपको पसन्द आये तो ऊर्जा देने के लिए शेयर एवं अपने सुझाव दीजिए ।

शालू सिंह

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