यथाकाशस्थितो नित्यं वायु: सर्वत्रगो महान् |
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय || गीता 9/6||
अर्थ: जैसे सर्वत्र विचरण करने वाला महान् वायु सदा आकाश में ही स्थित रहता है, वैसे ही सभी भूत मुझमें ही स्थित हैं।

व्याख्या: ब्रह्म, आकाश से अति परे और सूक्ष्म है, लेकिन ब्रह्म को समझने के लिए आकाश एक अच्छा उदहारण है। जैसे आकाश, पूरे ब्रह्माण्ड में व्याप्त है, ऐसे ही ब्रह्म भी व्याप्त है। इसी आकाश में वायु फैला हुआ है, जो सब जगह घूमता रहता है जैसे आकाश के अंदर वायु विचरण करता है, ऐसे ही ब्रह्म के अंदर पांच महाभूतों से बने सभी भूत स्थित होते हैं।

जैसे वायु, आकाश से बाहर नहीं जा सकता, ऐसे ही भूत भी ब्रह्म से बाहर नहीं जा सकते। अतः जो भी कुछ प्रकट या अप्रकट ब्रह्माण्ड में विद्यमान हैं, वो सभी ब्रह्म में ही निहित हैं, उससे बाहर नहीं। ऐसा जानना चाहिए।

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शालू सिंह

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