नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन |
तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन || गीता 8/27||

अर्थ: हे पार्थ! इन मार्गों का ज्ञान हो जाने पर कोई भी योगी मोहित नहीं होता। इसलिए हे अर्जुन, सभी काल में योग से जुड़कर रहो।

व्याख्या: अज्ञानी लोग उत्तरायण और दक्षिणायन, इन दोनों मार्गों के नाम तो जरूर जानते हैं, लेकिन इनकी असलियत से परिचित नहीं होते। दूसरी ओर, जो योग-साधक हैं, वे इन मार्गों को लंबी साधना के बाद जान लेते हैं और फिर इनके मर्म को जानकर इन मार्गों के प्रति मोहित नहीं होते क्योंकि वे सिर्फ आत्मभाव में टिके होते हैं।

आगे भगवान कह रहे हैं कि हे अर्जुन, ऐसा कोई भी समय नहीं होना चाहिए जब तुम अपने स्वरूप से जुड़े हुए नहीं हो। भले आप कुछ भी कर रहे हों, सब काम करते हुए प्रत्येक काल में अपने आत्मस्वरूप से जुड़े रहना चाहिए। इसलिए योगी वही होता है जो अपनी आत्मा से योग को हमेशा जोड़कर रखता है।

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मैं एक पत्नी होने के साथ साथ गृहिणी एवं माँ भी हुँ । लिखने का हुनर... ब्लॉग लिखती रहती हु... सनातन ग्रुप एक सकारात्मक ऊर्जा, आत्मनिर्भर बनाने की प्रेरणा देती जीवनी, राष्ट्रभक्ति गीत एवं कविताओं की माला पिरोया है । आग्रह :आपको पसन्द आये तो ऊर्जा देने के लिए शेयर एवं अपने सुझाव दीजिए ।

शालू सिंह

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