अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहु: परमां गतिम् | यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम || गीता 8/21||

अर्थ: जो अव्यक्त अक्षर कहा गया है, उसी को परम गति कहते है! जिसे प्राप्त कर वापिस नहीं आते! वही मेरा परम धाम है।

व्याख्या : परम तत्व को संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त होते हुए भी हम उसको देख नहीं सकते, क्योंकि वह अव्यक्त है। उस अव्यक्त परम तत्व का कभी भी नाश नहीं हो सकता, उसमें रत्तीभर भी क्षय नहीं हो सकता, इसलिए उसको अक्षर कहा जाता है।

इस अव्यक्त अक्षर को ही परम गति कहते हैं। परम गति का अर्थ है कि जहां पहुंचकर आत्मा जन्म-मरण के चक्र से हमेशा के लिए छूट जाती है और फिर जन्म लेने वापस लौटकर इस मृत्युलोक में नहीं आती है, क्योंकि वह परम गति को प्राप्त हो जाती है।

उसी को परमात्मा का परम धाम भी कहा जाता है। योगी लोग इसी परमधाम को पाने के लिए दिनरात साधना करते रहते हैं।

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मैं एक पत्नी होने के साथ साथ गृहिणी एवं माँ भी हुँ । लिखने का हुनर... ब्लॉग लिखती रहती हु... सनातन ग्रुप एक सकारात्मक ऊर्जा, आत्मनिर्भर बनाने की प्रेरणा देती जीवनी, राष्ट्रभक्ति गीत एवं कविताओं की माला पिरोया है । आग्रह :आपको पसन्द आये तो ऊर्जा देने के लिए शेयर एवं अपने सुझाव दीजिए ।

शालू सिंह

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