यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्। तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावित: ।। गीता 8/6।।

अर्थ: हे अर्जुन! जिस-जिस भाव का चिंतन करते हुए मनुष्य शरीर का त्याग करता है, वो उस-उस भाव को ही प्राप्त होता है क्योंकि वह सदा उसी भाव में भावित रहा है।

व्याख्या: हम रात को जिस ख्याल में सोने जाते हैं, सुबह उठते ही सबसे पहला ख्याल वही आता है, क्योंकि रात भर चित्त में वही ख्याल तैरता रहता है और अंत समय में व्यक्ति के मन में जो भाव रहता है, शरीर छोड़ने के बाद उसकी जीवात्मा उसी भाव में बनी रहती है और यदि उसको नया जन्म मिलना होता है तो भी उसी भाव के आधार पर मिलता है।

लेकिन अब प्रश्न उठता है कि अंत समय में व्यक्ति के अंदर भाव क्या होता है/ इसके लिए कहा है कि जो व्यक्ति हमेशा जिस भाव में बना रहता है, वही भाव उसको अंत समय में भी आता है। अतः हमें सावधान रहकर अपने भाव को शुद्ध करते रहना चाहिए, क्योंकि न जाने कब अंतिम समय आ जाए।

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शालू सिंह

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