रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययो: |
प्रणव: सर्ववेदेषु शब्द: खे पौरुषं नृषु || गीता 7/8||

अर्थ : हे अर्जुन ! मैं जल में रस हूँ, चन्द्र और सूर्य में प्रकाश हूँ, सभी वेदों में ॐ हूँ, आकाश में शब्द हूँ, पुरुषों में पौरुष हूँ ।

व्याख्या : अर्जुन को भगवान् अपनी सर्व्यापकता बताते हुए कह रहे हैं कि ‘मैं’ जल में रस हूँ, असलियत में रस ही जल का आधार है, रस के बिना जल हो ही नहीं सकता,अर्थात रस ही जल का फार्मूला है। ऐसे ही चंद्र और सूर्य का प्रकाश भी परमात्मा है, क्योंकि प्रकाश के बिना सूर्य कुछ भी नहीं है। इसी प्रकार सभी वेदों में ‘ॐ’ मैं ही हूँ, देखा जाय तो ‘ॐ’ परमात्मा की ध्वनि है और वेदों के सारे मन्त्र भी इसी ध्वनि से उत्पन्न हुए है। ऐसे ही भगवान् कह रहे हैं कि आकाश में शब्द ‘मैं’ हूँ, सृष्टि प्रक्रिया में आकाश की उत्पत्ति शब्द से हुई है, शब्द ही आकाश की उत्पत्ति का फार्मूला है। आगे भगवान् कह रहे हैं कि पुरुषों का पौरुष ‘मैं’ ही हूँ, देखा जाय तो पौरुषता ही पुरुष है, पौरुष के बिना पुरुष हो ही नहीं सकता।

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मैं एक पत्नी होने के साथ साथ गृहिणी एवं माँ भी हुँ । लिखने का हुनर... ब्लॉग लिखती रहती हु... सनातन ग्रुप एक सकारात्मक ऊर्जा, आत्मनिर्भर बनाने की प्रेरणा देती जीवनी, राष्ट्रभक्ति गीत एवं कविताओं की माला पिरोया है । आग्रह :आपको पसन्द आये तो ऊर्जा देने के लिए शेयर एवं अपने सुझाव दीजिए ।

शालू सिंह

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