कामकलाकाली का वर्णन महाकालसंहिता के कामकलाखण्ड में किया गया है । ग्रन्थ का प्रारम्भ २४१ वें पटल से होता है तथा इसकी अन्तिम पटलसंख्या २५५ है । पन्द्रह पटलों में कामकलाखण्ड नामक सम्पूर्ण ग्रन्थ प्रकाशित हुआ है।

|| कामकलाकाली महाकालसंहिता कामकलाखण्ड ||

परापर परेशान शशांककृतशेखर । योगाधियोगिन्सर्वज्ञ सर्वभूतदयापर ।।

२४१ वें पटल में सर्वप्रथम गणेश तथा परदेवता को नमस्कार किया गया है।

अन्य तन्त्रों के सदृश इस संहिता में भी प्रश्नकर्ता देवी है तथा उत्तर स्वयं महाकाल देते हैं । देवी प्रार्थना करती है कि-

तारा च छिन्नमस्ता च तथा त्रिपुरसुन्दरी। बाला च बगला चापि त्रिपुरा भैरवी तथा ।।

काली दक्षिणकाली च कुब्जिका शवरेश्वरी । अघोरा राजमातंगी सिद्धिलक्ष्मीररुंधती ।।

अश्वारूढा भोगवती नित्यक्लिन्ना व कुक्कुटी। कौमारी चापि वाराही चामुण्डा चण्डिकापि च ।।

भुवनेशी तथोछिष्ट चाण्डाली चण्डघण्टिका । कालसंकर्षणी चापि गुह्यकाली तथापरा ।।

एताश्चान्याश्च वै देव्यः समन्त्रा: कथितास्त्वया । किन्तु कामकलाकाली नोक्तवानसि मे प्रभो ।।

तत्ति मय्यपि गोप्यन्ते प्रायशः परमेश्वर ।

(1) तारा (२) छिन्नमस्ता (३) त्रिपुरसुन्दरी (४) बाला (५) बगला (६) त्रिपुरभैरवी (७) काली (4) दक्षिणकाली (8) कुब्जिका (१०) शवरेश्वरि (११) अघोरा (१२) राजमातङ्गी (१३) सिद्धिलक्ष्मी (१४) अरुन्धती (१५) अश्वारुढ़ा (१६) भोगवती (१७) नित्यक्लिन्ना (१८) कुक्कुटी (१९) कौमारी (२०) वाराही (२१) चामुण्डा (२२) चण्डिका (२३) भुवनेशी (२४) उच्छिष्टचाण्डाली (२५) चण्डघंटिका (२६) कालसंकर्षिणी तथा (२७) गुह्यकाली

प्रभृति देवियों की पूजा तथा मन्त्र का रहस्य उद्घाटित व उल्लिखित हुए हैं किन्तु कामकलाकाली के सम्बन्ध में पहले कुछ भी नहीं कहा गया है। इस कामकलाकाली का मन्त्र, ध्यान, रहस्य तभा कवच सुनने के लिए देवी प्रार्थना करती है। महाकाल प्रसन्न होकर उत्तर देते हैं कि कामकलाकाली के उपासक अधोनिर्दिष्ट व्यक्तिगण है-

(१) इन्द्र (२) वरुण (३) कुबेर (४) ब्रह्मा (५) महाकाल स्वयं (६) बाण (७) रावण (८) यम (२) चन्द्र (१०) विष्णु तथा (११) महर्षिगण।

कामकला की उपासना का फल विद्यालक्ष्मी, मोक्षलक्ष्मी तथा राज्यलक्ष्मी की प्राप्ति है । धनलाभ, यशोलाभ, कान्तालाभ, अष्टसिद्धि, वशीकरण, स्तम्भन, आकर्षण, द्रावण, ग्रहों का स्तम्भन, अनल एवं अनिल का स्तम्भन, धारास्तम्भन, शत्रुओं के शैन्यों का स्तम्भन तया वाक् स्तम्भन आदि कामकलाकाली की उपासना के फल प्रनिहित है।

बहुत भाग्योदय होने पर इस विद्या की प्राप्ति होती है। प्राणदान तथा इस विद्या के दान को तुला में रखने पर इस विद्या का ही महत्व अधिक होता हैं। सर्वस्व दान करने पर भी गुरु की पादवन्दना करके इस विद्या की उपलब्धि कर लेनी चाहिए।

काली के १२ एवं ९ भेद है ।

काली नवविधा प्रोक्ता सर्वतन्त्रेषु गोपिता ।

यथा त्रिभेदा तारा स्यात् सुन्दरी सप्तसप्ततिः ॥

॥ कामकलाकाली- नवकाली ॥

(१) दक्षिणकाली, (२) भद्रकाली (३) श्मशानकाली (४) कालकाली (५) गुह्यकाली (६) कामकलाकाली (७) धनकाली (८) सिद्धिकाली (९) चण्डकाली ।

नवविध कालियों का वर्णन भिन्न भिन्न तंत्रों में तथा डामरों में किया गया है। दक्षिणकाली के संबन्ध में महाकालसंहिता में ही कहा गया है एवं भद्रकाली का भी ध्यान तथा पूजन यहाँ वर्णित है । श्मशानकाली के नाना भेद डामरों में एवं कालकाली विषयक मन्त्र भीमातन्त्र में बताये गये है। गुह्यकाली के विषय में भी इस तन्त्र में वर्णन मिलता है।

गुह्यकाली तथा कामकलाकाली अभिन्न हैं ।

महाकालसंहिता में महाकाल कहते है-

या गुह्यकाली सैवेयं काली कामकलाभिधा । मंत्रभेदाद् ध्यानभेदाद् भवेत् कामकलात्मिका ॥

मन्त्र, ध्यान तथा प्रयोगों के भेद से इन दोनों में भिन्नता पाई जाती है। जैसे तारा के तीन भेद, सुन्दरी के सतहत्तर भेद तथा दक्षिणा के पाँच भेद होते हैं, उसी तरह गुह्यकाली भी ध्यान तथा मन्त्र के भेद से सात प्रकार की हैं।

विभिन्न देवीमन्त्रों की मन्त्र-संख्या।।

दक्षिणाकाली का मन्त्र २२ वर्ण युक्त है। देवी एकजटा का मन्त्र ५ वर्ण युक्त है, तथा कामकलाकाली के मन्त्र में १८ वर्ण विद्यमान हैं। जिन नव कालियों की चर्चा पहले हुई है उनमें काम कला काली मुख्यतया है । इसके समर्थन में महाकाल कहते हैं

‘षोडशार्ण यथा मुख्या सर्वश्रीचक्रमध्यगा । तथेयं नवकालीषु सदा मुख्यतमा स्मृता’॥

२४२वें पटल में मन्त्रोद्धार वर्णित हैं। पाँच श्लोकों में देवी के मन्त्रों का उद्धार है । इस मन्त्र के आदि में भूतबीज तथा अन्त में स्वाहा है । कामकला काली के सात मन्त्रों में १८ वर्ण युक्त मन्त्र ही मुख्य है। इस मन्त्र का ऋषि महाकाल है, छन्द बृहती है, बीज आद्यबीज है, शक्ति क्रोधवर्ण है तथा विनियोग सर्वसिद्धि है । इस मन्त्र का नाम त्रैयलोक्याकर्षण है।

कामकलाकाली त्रैलोक्यार्षण मन्त्र विनियोगः-
अस्य श्री कामकलाकालि त्रैलोक्यार्षण मन्त्रस्य महाकाल ऋषिः, बृहती छन्दः, कामकलाकालि देवता, क्लीं बीजं हूँ शक्तिः, सर्वार्थसिद्धये जपे विनियोगः ।

षडङ्गन्यास :-

क्लीं का हृदयाय नमः ।

क्रीं म शिरसे स्वाहा ।

हूं क शिखायै वषट् ।

क्रों ला नेत्रत्रयाय वौषट् ।

स्फ्रों का कवचाय हुं ।

ली कामकलाकाली अस्त्राय फट् ।

॥ अथ कामकलाकाली त्रैलोक्यार्षण मन्त्रः ॥

मन्त्र – “क्लीं क्रीं हूं क्रों स्फ्रें (स्फ्रों) कामकलाकालि स्फ्रें (स्फ्रों) क्रों हूं क्रीं क्लीं स्वाहा ॥”

॥ अथ कामकलाकाली ध्यानम् महाकालसंहिता कामकलाखण्ड ॥

उद्यद्घनाघनाश्लिष्यज्जवा कुसुम सन्निभाम् । मत्तकोकिलनेत्राभां पक्वजम्बूफलप्रभाम् ॥

सुदीर्घप्रपदालम्बि विस्रस्तघनमूर्द्धाजाम् । ज्वलदङ्गार वच्छोण नेत्रत्रितयभूषिताम् ॥

उद्यच्छारदसंपूर्णचन्द्रकोकनदाननाम् । दीर्घदंष्ट्रायुगोदञ्चद् विकराल मुखाम्बुजाम् ॥

वितस्तिमात्र निष्क्रान्त ललज्जिह्वा भयानकाम् । व्यात्ताननतया दृश्यद्वात्रिंशद् दन्तमण्डलाम् ॥

निरन्तरम् वेपमानोत्तमाङ्गा घोररूपिणीम् । अंसासक्तनृमुण्डासृक् पिबन्ती वक़कन्धराम् ॥

सृक् कद्वन्द्वस्रवद्रक्त स्नापितोरोजयुग्मकाम् । उरोजा भोग संसक्त संपतद्रुधिरोच्चयाम् ॥

सशीत्कृतिधयन्तीं तल्लेलिहानरसज्ञया । ललाटे घननारासृग् विहितारुणचित्रकाम् ॥

सद्यश्छिन्नगलद्रक्त नृमुण्डकृतकुण्डलाम् । श्रुतिनद्धकचालम्बिवतंसलसदंसकाम ॥

स्रवदस्रौघया शश्वन्मानव्या मुण्डमालया । आकण्ठ गुल्फलंबिन्यालङ्कृतां केशबद्धया ॥

श्वेतास्थि गुलिका हारग्रैवेयकमहोज्ज्वलाम् । शवदीर्घाङ्गुली पंक्तिमण्डितोरः स्थलस्थिराम् ॥

कठोर पीवरोत्तुङ्ग वक्षोज युगलान्विताम् । महामारकतग्राववेदि श्रोणि परिष्कृताम् ॥

विशाल जघना भोगामतिक्षीण कटिस्थलाम् । अंत्रनद्धार्भक शिरोवलत्किङ्किणि मण्डिताम् ॥

सुपीनषोडश भुजां महाशङ्खाञ्चदङ्गकाम् । शवानां धमनीपुञ्जैर्वेष्टितैः कृतकङ्कणाम् ॥

ग्रथितैः शवकेशस्रग्दामभिः कटिसृत्रिणीम् । शवपोतकरश्रेणी ग्रथनैः कृतमेखलाम् ॥

शोभामानांगुलीं मांसमेदोमज्जांगुलीयकैः । असिं त्रिशूलं चक्रं च शरमंकुशमेव च ॥

लालनं च तथा कर्त्रीमक्षमालां च दक्षिणे । पाशं च परशुं नागं चापं मुद्गरमेव च ॥

शिवापोतं खर्परं च वसासृङ्मेदसान्वितम् । लम्बत्कचं नृमुण्डं च धारयन्तीं स्ववामतः ॥

विलसन्नूपुरां देवीं ग्रथितैः शवपञ्जरैः । श्मशान प्रज्वलद् घोरचिताग्निज्वाल मध्यगाम् ॥

अधोमुख महादीर्घ प्रसुप्त शवपृष्ठगाम् । वमन्मुखानल ज्वालाजाल व्याप्त दिगन्तरम् ॥

प्रोत्थायैव हि तिष्ठन्तीं प्रत्यालीढ पदक्रमाम् । वामदक्षिण संस्थाभ्या नदन्तीभ्यां मुहुर्मुहुः ॥

शिवाभ्यां घोररूपाभ्यां वमन्तीभ्यां महानलम् । विद्युङ्गार वर्णाभ्यां वेष्टितां परमेश्वरीम् ॥

सर्वदैवानुलग्नाभ्यां पश्यन्तीभ्यां महेश्वरीम् । अतीव भाषमाणाभ्यां शिवाभ्यां शोभितां मुहुः ॥

कपालसंस्थं मस्तिष्कं ददतीं च तयोर्द्वयोः । दिगम्बरां मुक्तकेशीमट्टहासां भयानकाम् ॥

सप्तधानद्धनारान्त्रयोगपट्ट विभूषिताम् । संहारभैरवेणैव सार्द्धं संभोगमिच्छतीम् ॥

अतिकामातुरां कालीं हसन्तीं खर्वविग्रहाम् । कोटि कालानल ज्वालान्यक्कारोद्यत् कलेवरम् ॥

महाप्रलय कोट्यर्क्क विद्युदर्बुद सन्निभाम् । कल्पान्तकारणीं कालीं महाभैरवरूपिणीम् ॥

महाभीमां दुर्निरीक्ष्यां सेन्द्रैरपि सुरासुरैः । शत्रुपक्षक्षयकरीं दैत्यदानवसूदनीम् ॥

चिन्तयेदीदृशीं देवीं काली कामकलाभिधाम् ॥

भावार्थ (कामकलाकाली का ध्यान) – यह देवी उगते हुए (सूर्य के साथ संश्लिष्ट रक्तवर्ण वाले) बादल के समान, सघन परस्पर संश्लिष्ट जवाकुसुम के समान, मत्त कोकिल के नेत्र के समान, पके हुए जामुन के फल की कान्तिवाली है । इसके बाल लम्बे, पैरों तक लटकने वाले बिखरे हुए तथा सघन हैं । जलते हुए अङ्गार के समान लाल रंग के तीन नेत्रों से यह विभूषित है । इसका मुख उगते हुए शारदीय पूर्णचन्द्र तथा लाल कमल के समान है । दो लम्बे दाँत बाहर ऊपर की ओर निकलने से विकराल मुखकमल वाली बतलायी गयी हैं । एक बीत्ता बाहर निकली हुई लपलपाती जीभ के कारण यह भयानक है । मुख के खोल देने के कारण बत्तीसो दाँत दिखलायी दे रहे हैं । इसका शिर निरन्तर काँप रहा है अतएव घोर रूप वाली है । गले में लटके हुए नरमुण्ड से निकलने वाले रक्त को पीती हुई अतएव वक्रकन्धे वाली कही गयी हैं । इसके दोनों स्तन दोनों जबड़ों से स्रवित होने वाले रक्त से उपलिप्त हैं । उसके विस्तृत स्तनों से लिपट कर रक्त की धारा गिर रही है । उस रक्त को लेलिहान जिह्वा से सीत्कार के साथ वह पी रही है । ललाट पर मनुष्य के सघन रक्त से लालरंग का चित्र बनायी हुई हैं । तत्काल कटे हुए अतएव गिरते हुए रक्त वाले नरमुण्ड का उसने कुण्डल धारण किया है । कानों में बँधे हुए बालों से लटकने वाला अवतंस (अंगूठी के आकार वाला कर्णाभूषण) कन्धे तक लटक रहा है । (शिर के) बालों से परस्पर बँधे हुए नरमुण्डों की माला, जिससे कि निरन्तर रक्त टपक रहा है, कण्ठ से लेकर गुल्फ तक लटक रही है । इस माला से वे अलङ्कृत हैं । श्वेतवर्ण की हड्डी की गोली से बने हुए हार एवं ग्रैवेयक (धारण करने के कारण वे) अत्यन्त उज्ज्वल हैं । शव की लम्बी अङ्गुलियों की माला से उनका दृढ़ उरस्थल अलङ्कृत है । वे कठोर विशाल और ऊँचे दो स्तनों वाली हैं । इनके उत्तम नितम्ब महा मरकत पत्थर से निर्मित वेदी के समान (चिकने, कठोर और समतल) हैं । उनके जघन का विस्तार अत्यधिक है और कटि अत्यन्त क्षीण है । आँतों से बँधे हुए बच्चों के शिररूपी किङ्किणी (करधनी) से वे मण्डित हैं । वे लम्बी सोलह भुजा वाली हैं । मनुष्य के कपाल उनके अङ्गों में शोभामान है । शवों की धमनियों को हाथ में लपेट कर कङ्कण बना लिया है । शव के गुँथे बालों की रस्सी से उनका कटिसूत्र रचा गया है । मृत शिशु के हाथों को गूंथ कर उन्होंने करधनी बनायी है । अङ्गुलियों में मांस, मेदा, मज्जा की अङ्गठियाँ पहन रखी हैं । (वे अपने) दायें हाथों में खड्ग, त्रिशूल, चक्र, बाण, अङ्कुश, लालन (=मूषक की आकृतिवाला विषधर जन्तु), कैंची और अक्षमाला तथा अपने बायें हाथों में पाश, परशु, नाग, धनुष, मुद्गर, सियार का बच्चा तथा वसा रक्त और मेदा से भरा कपाल ली हुई हैं। गूंथे हुए शवपञ्जरों के नूपुर से शोभायमान हैं । श्मशान में जलती हुई घोर चिताग्नि की ज्वाला के मध्य में स्थित, औंधे मुँह सोये हुए विशाल शव की पीठ पर खड़ी हैं । उनके मुख से उगली हुई अग्नि की ज्वालायें दिग् दिगन्तर में फैली हुई हैं । एक पैर पर खड़ी होकर दूसरे को उठाकर आगे रखने की स्थिति में वर्तमान हैं । उनके बायें और दायें भयङ्कर रूपों वाली दो सियारिने खड़ी हैं जो अपने मुख से आग उगल रही हैं । विद्युत और अङ्गार के वर्ण वाली ये दोनों सियारिने कामकलाकाली को घेरे हुए हैं । वे सदा उनके सन्निकट रहकर उनको देखती रहती हैं । वह देवी कपाल में स्थित मस्तिष्क को उन दोनों को देती रहती हैं और वे शिवायें उसको निरन्तर खाती रहती हैं । यह देवी नग्न, खुले बालों वाली, अट्टहास करती हुई और भयानक हैं । सात बार ग्रथित नर की आँत के योगपट्ट से विभूषित हैं । वह काली संहारभैरव के साथ निरन्तर सम्भोग चाहती हैं । अत्यन्त कामातुर वह नाटे कद की हैं तथा हँसती रहती हैं । उनका शरीर करोड़ों कालानल को तिरस्कृत करने वाला है तथा महाप्रलय के समय दीप्यमान करोड़ों सूर्य और अरबों विद्युत् के समान है । यह काली कल्प का अन्त करने वाली, महाभैरवरूपिणी, महाभयङ्करी, इन्द्र के सहित सुरों और असुरों के द्वारा दुर्निरीक्ष्य हैं । शत्रुपक्ष का नाश करने वाली, दैत्यदानव का संहार करने वाली कामकला नामक काली का ध्यान करना चाहिये ।

कामकलाकाली महाकालसंहितायां कामकलाखण्डम् जारी……..क्रमशः

मैं एक पत्नी होने के साथ साथ गृहिणी एवं माँ भी हुँ । लिखने का हुनर... ब्लॉग लिखती रहती हु... सनातन ग्रुप एक सकारात्मक ऊर्जा, आत्मनिर्भर बनाने की प्रेरणा देती जीवनी, राष्ट्रभक्ति गीत एवं कविताओं की माला पिरोया है । आग्रह :आपको पसन्द आये तो ऊर्जा देने के लिए शेयर एवं अपने सुझाव दीजिए ।

शालू सिंह

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