अव्यक्ताद्व्यक्तय: सर्वा: प्रभवन्त्यहरागमे | रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसञ्ज्ञके || गीता 8/18||

अर्थ: ब्रह्मा का दिन होने पर अव्यक्त से व्यक्त सृष्टि प्रकट होती है और रात होने पर समस्त सृष्टि अव्यक्त में लीन हो जाती है।

व्याख्या : मैं एक हूं और अनेक रूपों में प्रकट हो जाऊं, परमात्मा के इस भाव से सृष्टि का निर्माण हुआ। सृजन के लिए ब्रह्मा, पालन के लिए विष्णु और संहार के लिए शिव नामक एनर्जी ब्रह्म से उत्पन्न हुई। जैसे हम जब सुबह उठते हैं, तब अपनी सृष्टि की रचना करते हैं और रात को सोने जाते हैं, तब हमारे लिए सृष्टि का अस्त हो जाता है।

इसी प्रकार मूल प्रकृति से जब सृष्टि की रचना होती और दिखाई देने वाली सृष्टि बनती है, फिर जब तक सृष्टि का प्रलय नहीं हो जाता, तब तक ब्रह्मा का दिन ही समझना चाहिए, फिर जब सृष्टि की प्रलय होगी, उसको ब्रह्मा की रात माननी चाहिए। प्रलय के समय दिखने वाली व्यक्त सृष्टि अपने मूल कारण अव्यक्त भाव में लीन हो जाती है, वही ब्रह्मा की रात है।

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शालू सिंह

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