अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।
य: प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशय: ।। गीता 8/5।।

अर्थ : जो देहाध्यास के अंतकाल में केवल मेरा ही स्मरण करता है, वह मेरे ही भाव को प्राप्त होता है, इसमें कोई संदेह नहीं है।

व्याख्या : भगवान कह रहे हैं कि अंतकाल में जो मेरा स्मरण करता है, वह मेरे ही भाव को प्राप्त हो जाता है। ऐसे में कुछ व्यक्ति सोचने लगते हैं कि जब अंत समय आएगा, तब भगवान् को याद कर लेंगे, जिससे हम भगवान् को ही प्राप्त हो जाएंगे।

लेकिन यहां प्रश्न उठता है कि यह कैसे पता लगेगा कि किसका अंतकाल कब है? जब अंतकाल का पता नहीं है, तब उस काल में भगवान को याद कैसे करेंगे?

हो सकता है कि हमारा अगला ही पल अंतकाल हो। इसका सीधा सा उपाय है कि हर बीतते हुए काल में प्रभु को याद करते रहो, फिर जब भी अंतकाल होगा उसमें प्रभु को याद किया ही होगा। इसप्रकार अंत में प्रभु को ही प्राप्त हो जाएंगे, इसमें कोई भी संदेह नहीं है।

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मैं एक पत्नी होने के साथ साथ गृहिणी एवं माँ भी हुँ । लिखने का हुनर... ब्लॉग लिखती रहती हु... सनातन ग्रुप एक सकारात्मक ऊर्जा, आत्मनिर्भर बनाने की प्रेरणा देती जीवनी, राष्ट्रभक्ति गीत एवं कविताओं की माला पिरोया है । आग्रह :आपको पसन्द आये तो ऊर्जा देने के लिए शेयर एवं अपने सुझाव दीजिए ।

शालू सिंह

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