इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत। सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप।। गीता 7/27।।

अर्थ : हे भरतवंशी अर्जुन! इच्छा और द्वेष से उत्पन्न द्वंद्व रूप मोह से संसार के समस्त प्राणी जन्म लेकर अत्यंत अज्ञानता को प्राप्त हो रहे हैं ।

व्याख्या : बंधन का कारण इच्छा और द्वेष है। हर व्यक्ति इच्छा का पुलिंदा है, सभी में अनगिनत इच्छाएं भरी पड़ी हैं। एक इच्छा के पूरे होते ही दूसरी इच्छा, मन में अपनी जगह बना लेती है और यह सिलसिला जिंदगी भर चलता रहता है, आखिर में व्यक्ति पूरा हो जाता है लेकिन इच्छाएं जवान बनी रहती है।

इसी प्रकार द्वेष भी व्यक्ति के अंदर घर किए रहता है। जहां से हमें सुख मिला था, मिल रहा है या सुख मिलने की उम्मीद है, वहां से हमें राग पैदा हो जाता है, फिर जब सुख में किसी कारण से रुकावट आती है, तब उससे द्वेष हो जाता है।

इस प्रकार इच्छा और द्वेष से मन में द्वंद्व पैदा होता रहता है, जिससे संसार के प्रति व्यक्ति का मोह पक्का हो जाता है। इस मोह के कारण सभी प्राणी अज्ञानता में ही अपना सारा जीवन बिता देते हैं, फिर यह अज्ञानता ही जन्म-मरण का कारण बन जाती है।

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शालू सिंह

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