श्री राम चरित मानस- बालकाण्ड, मासपारायण, ग्यारहवाँ विश्राम

श्री राम चरित मानस- बालकाण्ड, मासपारायण, ग्यारहवाँ विश्राम

श्री रामचरित मानस

प्रथम सोपान (बालकाण्ड)

कनक कलस भरि कोपर थारा। भाजन ललित अनेक प्रकारा॥

भरे सुधा सम सब पकवाने। नाना भाँति न जाहिं बखाने॥

(दूध, शर्बत, ठंढाई, जल आदि से) भरकर सोने के कलश तथा जिनका वर्णन नहीं हो सकता ऐसे अमृत के समान भाँति-भाँति के सब पकवानों से भरे हुए परात, थाल आदि अनेक प्रकार के सुंदर बर्तन,

फल अनेक बर बस्तु सुहाईं। हरषि भेंट हित भूप पठाईं॥

भूषन बसन महामनि नाना। खग मृग हय गय बहुबिधि जाना॥

उत्तम फल तथा और भी अनेकों सुंदर वस्तुएँ राजा ने हर्षित होकर भेंट के लिए भेजीं। गहने, कपड़े, नाना प्रकार की मूल्यवान मणियाँ (रत्न), पक्षी, पशु, घोड़े, हाथी और बहुत तरह की सवारियाँ,

मंगल सगुन सुगंध सुहाए। बहुत भाँति महिपाल पठाए॥

दधि चिउरा उपहार अपारा। भरि भरि काँवरि चले कहारा॥

तथा बहुत प्रकार के सुगंधित एवं सुहावने मंगल-द्रव्य और शगुन के पदार्थ राजा ने भेजे। दही, चिउड़ा और अगणित उपहार की चीजें काँवरों में भर-भरकर कहार चले।

अगवानन्ह जब दीखि बराता। उर आनंदु पुलक भर गाता॥

देखि बनाव सहित अगवाना। मुदित बरातिन्ह हने निसाना॥

अगवानी करने वालों को जब बारात दिखाई दी, तब उनके हृदय में आनंद छा गया और शरीर रोमांच से भर गया। अगवानों को सज-धज के साथ देखकर बारातियों ने प्रसन्न होकर नगाड़े बजाए।

दो० – हरषि परसपर मिलन हित कछुक चले बगमेल।

जनु आनंद समुद्र दुइ मिलत बिहाइ सुबेल॥ 305॥

(बाराती तथा अगवानों में से) कुछ लोग परस्पर मिलने के लिए हर्ष के मारे बाग छोड़कर (सरपट) दौड़ चले, और ऐसे मिले मानो आनंद के दो समुद्र मर्यादा छोड़कर मिलते हों॥ 305॥

बरषि सुमन सुर सुंदरि गावहिं। मुदित देव दुंदुभीं बजावहिं॥

बस्तु सकल राखीं नृप आगें। बिनय कीन्हि तिन्ह अति अनुरागें॥

देवसुंदरियाँ फूल बरसाकर गीत गा रही हैं, और देवता आनंदित होकर नगाड़े बजा रहे हैं। (अगवानी में आए हुए) उन लोगों ने सब चीजें दशरथ के आगे रख दीं और अत्यंत प्रेम से विनती की।

प्रेम समेत रायँ सबु लीन्हा। भै बकसीस जाचकन्हि दीन्हा॥

करि पूजा मान्यता बड़ाई। जनवासे कहुँ चले लवाई॥

राजा दशरथ ने प्रेम सहित सब वस्तुएँ ले लीं, फिर उनकी बख्शीशें होने लगीं और वे याचकों को दे दी गईं। तदनंतर पूजा, आदर-सत्कार और बड़ाई करके अगवान लोग उनको जनवासे की ओर लिवा ले चले।

बसन बिचित्र पाँवड़े परहीं। देखि धनदु धन मदु परिहरहीं॥

अति सुंदर दीन्हेउ जनवासा। जहँ सब कहुँ सब भाँति सुपासा॥

विलक्षण वस्त्रों के पाँवड़े पड़ रहे हैं, जिन्हें देखकर कुबेर भी अपने धन का अभिमान छोड़ देते हैं। बड़ा सुंदर जनवासा दिया गया, जहाँ सबको सब प्रकार का सुभीता था।

जानी सियँ बरात पुर आई। कछु निज महिमा प्रगटि जनाई॥

हृदयँ सुमिरि सब सिद्धि बोलाईं। भूप पहुनई करन पठाईं॥

सीता ने बारात जनकपुर में आई जानकर अपनी कुछ महिमा प्रकट करके दिखलाई। हृदय में स्मरणकर सब सिद्धियों को बुलाया और उन्हें राजा दशरथ की मेहमानी करने के लिए भेजा।

दो० – सिधि सब सिय आयसु अकनि गईं जहाँ जनवास।

लिएँ संपदा सकल सुख सुरपुर भोग बिलास॥ 306॥

सीता की आज्ञा सुनकर सब सिद्धियाँ जहाँ जनवासा था वहाँ सारी संपदा, सुख और इंद्रपुरी के भोग-विलास को लिए हुए गईं॥ 306॥

निज निज बास बिलोकि बराती। सुर सुख सकल सुलभ सब भाँती॥

बिभव भेद कछु कोउ न जाना। सकल जनक कर करहिं बखाना॥

बारातियों ने अपने-अपने ठहरने के स्थान देखे तो वहाँ देवताओं के सब सुखों को सब प्रकार से सुलभ पाया। इस ऐश्वर्य का कुछ भी भेद कोई जान न सका। सब जनक की बड़ाई कर रहे हैं।

सिय महिमा रघुनायक जानी। हरषे हृदयँ हेतु पहिचानी॥

पितु आगमनु सुनत दोउ भाई। हृदयँ न अति आनंदु अमाई॥

रघुनाथ यह सब सीता की महिमा जानकर और उनका प्रेम पहचानकर हृदय में हर्षित हुए। पिता दशरथ के आने का समाचार सुनकर दोनों भाइयों के हृदय में महान आनंद समाता न था।

सकुचन्ह कहि न सकत गुरु पाहीं। पितु दरसन लालचु मन माहीं॥

बिस्वामित्र बिनय बड़ि देखी। उपजा उर संतोषु बिसेषी॥

संकोचवश वे गुरु विश्वामित्र से कह नहीं सकते थे; परंतु मन में पिता के दर्शनों की लालसा थी। विश्वामित्र ने उनकी बड़ी नम्रता देखी, तो उनके हृदय में बहुत संतोष उत्पन्न हुआ।

हरषि बंधु दोउ हृदयँ लगाए। पुलक अंग अंबक जल छाए॥

चले जहाँ दसरथु जनवासे। मनहुँ सरोबर तकेउ पिआसे॥

प्रसन्न होकर उन्होंने दोनों भाइयों को हृदय से लगा लिया। उनका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रों में (प्रेमाश्रुओं का) जल भर आया। वे उस जनवासे को चले, जहाँ दशरथ थे। मानो सरोवर प्यासे की ओर लक्ष्य करके चला हो।

दो० – भूप बिलोके जबहिं मुनि आवत सुतन्ह समेत।

उठे हरषि सुखसिंधु महुँ चले थाह सी लेत॥ 307॥

जब राजा दशरथ ने पुत्रों सहित मुनि को आते देखा, तब वे हर्षित होकर उठे और सुख के समुद्र में थाह-सी लेते हुए चले॥ 307॥

मुनिहि दंडवत कीन्ह महीसा। बार बार पद रज धरि सीसा॥

कौसिक राउ लिए उर लाई। कहि असीस पूछी कुसलाई॥

पृथ्वीपति दशरथ ने मुनि की चरणधूलि को बारंबार सिर पर चढ़ाकर उनको दंडवत-प्रणाम किया। विश्वामित्र ने राजा को उठाकर हृदय से लगा लिया और आशीर्वाद देकर कुशल पूछी।

पुनि दंडवत करत दोउ भाई। देखि नृपति उर सुखु न समाई॥

सुत हियँ लाइ दुसह दुख मेटे। मृतक सरीर प्रान जनु भेंटे॥

फिर दोनों भाइयों को दंडवत-प्रणाम करते देखकर राजा के हृदय में सुख समाया नहीं। पुत्रों को (उठाकर) हृदय से लगाकर उन्होंने अपने (वियोगजनित) दुःसह दुःख को मिटाया। मानो मृतक शरीर को प्राण मिल गए हों।

पुनि बसिष्ठ पद सिर तिन्ह नाए। प्रेम मुदित मुनिबर उर लाए॥

बिप्र बृंद बंदे दुहुँ भाईं। मनभावती असीसें पाईं॥

फिर उन्होंने वशिष्ठ के चरणों में सिर नवाया। मुनि श्रेष्ठ ने प्रेम के आनंद में उन्हें हृदय से लगा लिया। दोनों भाइयों ने सब ब्राह्मणों की वंदना की और मनभाए आशीर्वाद पाए।

भरत सहानुज कीन्ह प्रनामा। लिए उठाइ लाइ उर रामा॥

हरषे लखन देखि दोउ भ्राता। मिले प्रेम परिपूरित गाता॥

भरत ने छोटे भाई शत्रुघ्न सहित राम को प्रणाम किया। राम ने उन्हें उठाकर हृदय से लगा लिया। लक्ष्मण दोनों भाइयों को देखकर हर्षित हुए और प्रेम से परिपूर्ण हुए शरीर से उनसे मिले।

दो० – पुरजन परिजन जातिजन जाचक मंत्री मीत।

मिले जथाबिधि सबहि प्रभु परम कृपाल बिनीत॥ 308॥

तदनंतर परम कृपालु और विनयी राम अयोध्यावासियों, कुटुंबियों, जाति के लोगों, याचकों, मंत्रियों और मित्रों – सभी से यथायोग्य मिले॥ 308॥

रामहि देखि बरात जुड़ानी। प्रीति कि रीति न जाति बखानी॥

नृप समीप सोहहिं सुत चारी। जनु धन धरमादिक तनुधारी॥

राम को देखकर बारात शीतल हुई (राम के वियोग में सबके हृदय में जो आग जल रही थी, वह शांत हो गई)। प्रीति की रीति का बखान नहीं हो सकता। राजा के पास चारों पुत्र ऐसी शोभा पा रहे हैं मानो अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष शरीर धारण किए हुए हों।

सुतन्ह समेत दसरथहि देखी। मुदित नगर नर नारि बिसेषी॥

सुमन बरिसि सुर हनहिं निसाना। नाकनटीं नाचहिं करि गाना॥

पुत्रों सहित दशरथ को देखकर नगर के स्त्री-पुरुष बहुत ही प्रसन्न हो रहे हैं। (आकाश में) देवता फूलों की वर्षा करके नगाड़े बजा रहे हैं और अप्सराएँ गा-गाकर नाच रही हैं।

सतानंद अरु बिप्र सचिव गन। मागध सूत बिदुष बंदीजन॥

सहित बरात राउ सनमाना। आयसु मागि फिरे अगवाना॥

अगवानी में आए हुए शतानंद, अन्य ब्राह्मण, मंत्रीगण, मागध, सूत, विद्वान और भाटों ने बारात सहित राजा दशरथ का आदर-सत्कार किया। फिर आज्ञा लेकर वे वापस लौटे।

प्रथम बरात लगन तें आई। तातें पुर प्रमोदु अधिकाई॥

ब्रह्मानंदु लोग सब लहहीं। बढ़हुँ दिवस निसि बिधि सन कहहीं॥

बारात लग्न के दिन से पहले आ गई है, इससे जनकपुर में अधिक आनंद छा रहा है। सब लोग ब्रह्मानंद प्राप्त कर रहे हैं और विधाता से मनाकर कहते हैं कि दिन-रात बढ़ जाएँ (बड़े हो जाएँ)।

दो० – रामु सीय सोभा अवधि सुकृत अवधि दोउ राज।

जहँ तहँ पुरजन कहहिं अस मिलि नर नारि समाज॥ 309॥

राम और सीता सुंदरता की सीमा हैं और दोनों राजा पुण्य की सीमा हैं, जहाँ-तहाँ जनकपुरवासी स्त्री-पुरुषों के समूह इकट्ठे हो-होकर यही कह रहे हैं॥ 309॥

जनक सुकृत मूरति बैदेही। दसरथ सुकृत रामु धरें देही॥

इन्ह सम काहुँ न सिव अवराधे। काहुँ न इन्ह समान फल लाधे॥

जनक के सुकृत (पुण्य) की मूर्ति जानकी हैं और दशरथ के सुकृत देह धारण किए हुए राम हैं। इन (दोनों राजाओं) के समान किसी ने शिव की आराधना नहीं की; और न इनके समान किसी ने फल ही पाए।

इन्ह सम कोउ न भयउ जग माहीं। है नहिं कतहूँ होनेउ नाहीं॥

हम सब सकल सुकृत कै रासी। भए जग जनमि जनकपुर बासी॥

इनके समान जगत में न कोई हुआ, न कहीं है, न होने का ही है। हम सब भी संपूर्ण पुण्यों की राशि हैं, जो जगत में जन्म लेकर जनकपुर के निवासी हुए,

जिन्ह जानकी राम छबि देखी। को सुकृती हम सरिस बिसेषी॥

पुनि देखब रघुबीर बिआहू। लेब भली बिधि लोचन लाहू॥

और जिन्होंने जानकी और राम की छवि देखी है। हमारे-सरीखा विशेष पुण्यात्मा कौन होगा! और अब हम रघुनाथ का विवाह देखेंगे और भली-भाँति नेत्रों का लाभ लेंगे।

कहहिं परसपर कोकिलबयनीं। एहि बिआहँ बड़ लाभु सुनयनीं॥

बड़ें भाग बिधि बात बनाई। नयन अतिथि होइहहिं दोउ भाई॥

कोयल के समान मधुर बोलनेवाली स्त्रियाँ आपस में कहती हैं कि हे सुंदर नेत्रोंवाली! इस विवाह मंी बड़ा लाभ है। बड़े भाग्य से विधाता ने सब बात बना दी है, ये दोनों भाई हमारे नेत्रों के अतिथि हुआ करेंगे।

दो० – बारहिं बार सनेह बस जनक बोलाउब सीय।

लेन आइहहिं बंधु दोउ कोटि काम कमनीय॥ 310॥

जनक स्नेहवश बार-बार सीता को बुलावेंगे और करोड़ों कामदेवों के समान सुंदर दोनों भाई सीता को लेने (विदा कराने) आया करेंगे॥ 310॥

बिबिध भाँति होइहि पहुनाई। प्रिय न काहि अस सासुर माई॥

तब तब राम लखनहि निहारी। होइहहिं सब पुर लोग सुखारी॥

तब उनकी अनेकों प्रकार से पहुनाई होगी। सखी! ऐसी ससुराल किसे प्यारी न होगी! तब-तब हम सब नगर निवासी राम-लक्ष्मण को देख-देखकर सुखी होंगे।

सखि जस राम लखन कर जोटा। तैसेइ भूप संग दुइ ढोटा॥

स्याम गौर सब अंग सुहाए। ते सब कहहिं देखि जे आए॥

हे सखी! जैसा राम-लक्ष्मण का जोड़ा है, वैसे ही दो कुमार राजा के साथ और भी हैं। वे भी एक श्याम और दूसरे गौर वर्ण के हैं, उनके भी सब अंग बहुत सुंदर हैं। जो लोग उन्हें देख आए हैं, वे सब यही कहते हैं।

कहा एक मैं आजु निहारे। जनु बिरंचि निज हाथ सँवारे॥

भरतु राम ही की अनुहारी। सहसा लखि न सकहिं नर नारी॥

एक ने कहा – मैंने आज ही उन्हें देखा है; इतने सुंदर हैं, मानो ब्रह्मा ने उन्हें अपने हाथों सँवारा है। भरत तो राम की ही शकल-सूरत के हैं। स्त्री-पुरुष उन्हें सहसा पहचान नहीं सकते।

लखनु सत्रुसूदनु एकरूपा। नख सिख ते सब अंग अनूपा॥

मन भावहिं मुख बरनि न जाहीं। उपमा कहुँ त्रिभुवन कोउ नाहीं॥

लक्ष्मण और शत्रुघ्न दोनों का एक रूप है। दोनों के नख से शिखा तक सभी अंग अनुपम हैं। मन को बड़े अच्छे लगते हैं, पर मुख से उनका वर्णन नहीं हो सकता। उनकी उपमा के योग्य तीनों लोकों में कोई नहीं है।

छं० – उपमा न कोउ कह दास तुलसी कतहुँ कबि कोबिद कहैं।

बल बिनय बिद्या सील सोभा सिंधु इन्ह से एइ अहैं॥

पुर नारि सकल पसारि अंचल बिधिहि बचन सुनावहीं।

ब्याहिअहुँ चारिउ भाइ एहिं पुर हम सुमंगल गावहीं॥

दास तुलसी कहता है कवि और कोविद (विद्वान) कहते हैं, इनकी उपमा कहीं कोई नहीं है। बल, विनय, विद्या, शील और शोभा के समुद्र इनके समान ये ही हैं। जनकपुर की सब स्त्रियाँ आँचल फैलाकर विधाता को यह वचन (विनती) सुनाती हैं कि चारों भाइयों का विवाह इसी नगर में हो और हम सब सुंदर मंगल गाएँ।

सो० – कहहिं परस्पर नारि बारि बिलोचन पुलक तन।

सखि सबु करब पुरारि पुन्य पयोनिधि भूप दोउ॥ 311॥

नेत्रों में (प्रेमाश्रुओं का) जल भरकर पुलकित शरीर से स्त्रियाँ आपस में कह रही हैं कि हे सखी! दोनों राजा पुण्य के समुद्र हैं, त्रिपुरारी शिव सब मनोरथ पूर्ण करेंगे॥ 311॥

एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं। आनँद उमगि उमगि उर भरहीं॥

जे नृप सीय स्वयंबर आए। देखि बंधु सब तिन्ह सुख पाए॥

इस प्रकार सब मनोरथ कर रही हैं और हृदय को उमंग-उमंगकर (उत्साहपूर्वक) आनंद से भर रही हैं। सीता के स्वयंवर में जो राजा आए थे, उन्होंने भी चारों भाइयों को देखकर सुख पाया।

कहत राम जसु बिसद बिसाला। निज निज भवन गए महिपाला॥

गए बीति कछु दिन एहि भाँती। प्रमुदित पुरजन सकल बराती॥

राम का निर्मल और महान यश कहते हुए राजा लोग अपने-अपने घर गए। इस प्रकार कुछ दिन बीत गए। जनकपुर निवासी और बाराती सभी बड़े आनंदित हैं।

मंगल मूल लगन दिनु आवा। हिम रितु अगहनु मासु सुहावा॥

ग्रह तिथि नखतु जोगु बर बारू। लगन सोधि बिधि कीन्ह बिचारू॥

मंगलों का मूल लग्न का दिन आ गया। हेमंत ऋतु और सुहावना अगहन का महीना था। ग्रह, तिथि, नक्षत्र, योग और वार श्रेष्ठ थे। लग्न (मुहूर्त) शोधकर ब्रह्मा ने उस पर विचार किया,

पठै दीन्हि नारद सन सोई। गनी जनक के गनकन्ह जोई॥

सुनी सकल लोगन्ह यह बाता। कहहिं जोतिषी आहिं बिधाता॥

और उस (लग्न पत्रिका) को नारद के हाथ (जनक के यहाँ) भेज दिया। जनक के ज्योतिषियों ने भी वही गणना कर रखी थी। जब सब लोगों ने यह बात सुनी तब वे कहने लगे – यहाँ के ज्योतिषी भी ब्रह्मा ही हैं।

दो० – धेनुधूरि बेला बिमल सकल सुमंगल मूल।

बिप्रन्ह कहेउ बिदेह सन जानि सगुन अनुकूल॥ 312॥

निर्मल और सभी सुंदर मंगलों की मूल गोधूलि की पवित्र बेला आ गई और अनुकूल शकुन होने लगे, यह जानकर ब्राह्मणों ने जनक से कहा॥ 312॥

उपरोहितहि कहेउ नरनाहा। अब बिलंब कर कारनु काहा॥

सतानंद तब सचिव बोलाए। मंगल सकल साजि सब ल्याए॥

तब राजा जनक ने पुरोहित शतानंद से कहा कि अब देरी का क्या कारण है। तब शतानंद ने मंत्रियों को बुलाया। वे सब मंगल का सामान सजाकर ले आए।

संख निसान पनव बहु बाजे। मंगल कलस सगुन सुभ साजे॥

सुभग सुआसिनि गावहिं गीता। करहिं बेद धुनि बिप्र पुनीता॥

शंख, नगाड़े, ढोल और बहुत-से बाजे बजने लगे तथा मंगल-कलश और शुभ शकुन की वस्तुएँ (दधि, दूर्वा आदि) सजाई गईं। सुंदर सुहागिन स्त्रियाँ गीत गा रही हैं और पवित्र ब्राह्मण वेद की ध्वनि कर रहे हैं।

लेन चले सादर एहि भाँती। गए जहाँ जनवास बराती॥

कोसलपति कर देखि समाजू। अति लघु लाग तिन्हहि सुरराजू॥

सब लोग इस प्रकार आदरपूर्वक बारात को लेने चले और जहाँ बारातियों का जनवासा था, वहाँ गए। अवधपति दशरथ का समाज (वैभव) देखकर उनको देवराज इंद्र भी बहुत ही तुच्छ लगने लगे।

भयउ समउ अब धारिअ पाऊ। यह सुनि परा निसानहिं घाऊ॥

गुरहि पूछि करि कुल बिधि राजा। चले संग मुनि साधु समाजा॥

(उन्होंने जाकर विनती की -) समय हो गया, अब पधारिए। यह सुनते ही नगाड़ों पर चोट पड़ी। गुरु वशिष्ठ से पूछकर और कुल की सब रीतियों को करके राजा दशरथ मुनियों और साधुओं के समाज को साथ लेकर चले।

दो० – भाग्य बिभव अवधेस कर देखि देव ब्रह्मादि।

लगे सराहन सहस मुख जानि जनम निज बादि॥ 313॥

अवध नरेश दशरथ का भाग्य और वैभव देखकर और अपना जन्म व्यर्थ समझकर, ब्रह्मा आदि देवता हजारों मुखों से उसकी सराहना करने लगे॥ 313॥

सुरन्ह सुमंगल अवसरु जाना। बरषहिं सुमन बजाइ निसाना॥

सिव ब्रह्मादिक बिबुध बरूथा। चढ़े बिमानन्हि नाना जूथा॥

देवगण सुंदर मंगल का अवसर जानकर, नगाड़े बजा-बजाकर फूल बरसाते हैं। शिव, ब्रह्मा आदि देववृंद यूथ (टोलियाँ) बना-बनाकर विमानों पर जा चढ़े।

प्रेम पुलक तन हृदयँ उछाहू। चले बिलोकन राम बिआहू॥

देखि जनकपुरु सुर अनुरागे। निज निज लोक सबहिं लघु लागे॥

और प्रेम से पुलकित-शरीर हो तथा हृदय में उत्साह भरकर राम का विवाह देखने चले। जनकपुर को देखकर देवता इतने अनुरक्त हो गए कि उन सबको अपने-अपने लोक बहुत तुच्छ लगने लगे।

चितवहिं चकित बिचित्र बिताना। रचना सकल अलौकिक नाना।

नगर नारि नर रूप निधाना। सुघर सुधरम सुसील सुजाना॥

विचित्र मंडप को तथा नाना प्रकार की सब अलौकिक रचनाओं को वे चकित होकर देख रहे हैं। नगर के स्त्री-पुरुष रूप के भंडार, सुघड़, श्रेष्ठ धर्मात्मा, सुशील और सुजान हैं।

तिन्हहि देखि सब सुर सुरनारीं। भए नखत जनु बिधु उजिआरीं॥

बिधिहि भयउ आचरजु बिसेषी। निज करनी कछु कतहुँ न देखी॥

उन्हें देखकर सब देवता और देवांगनाएँ ऐसे प्रभाहीन हो गए जैसे चंद्रमा के उजियाले में तारागण फीके पड़ जाते हैं। ब्रह्मा को विशेष आश्चर्य हुआ; क्योंकि वहाँ उन्होंने अपनी कोई करनी (रचना) तो कहीं देखी ही नहीं।

दो० – सिवँ समुझाए देव सब जनि आचरज भुलाहु।

हृदयँ बिचारहु धीर धरि सिय रघुबीर बिआहु॥ 314॥

तब शिव ने सब देवताओं को समझाया कि तुम लोग आश्चर्य में मत भूलो। हृदय में धीरज धरकर विचार तो करो कि यह (भगवान की महामहिमामयी निजशक्ति) सीता का और (अखिल ब्रह्मांडों के परम ईश्वर साक्षात भगवान) राम का विवाह है॥ 314॥

जिन्ह कर नामु लेत जग माहीं। सकल अमंगल मूल नसाहीं॥

करतल होहिं पदारथ चारी। तेइ सिय रामु कहेउ कामारी॥

जिनका नाम लेते ही जगत में सारे अमंगलों की जड़ कट जाती है और चारों पदार्थ (अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष) मुट्ठी में आ जाते हैं, ये वही (जगत के माता-पिता) सीताराम हैं, काम के शत्रु शिव ने ऐसा कहा।

एहि बिधि संभु सुरन्ह समुझावा। पुनि आगें बर बसह चलावा॥

देवन्ह देखे दसरथु जाता। महामोद मन पुलकित गाता॥

इस प्रकार शिव ने देवताओं को समझाया और फिर अपने श्रेष्ठ बैल नंदीश्वर को आगे बढ़ाया। देवताओं ने देखा कि दशरथ मन में बड़े ही प्रसन्न और शरीर से पुलकित हुए चले जा रहे हैं।

साधु समाज संग महिदेवा। जनु तनु धरें करहिं सुख सेवा॥

सोहत साथ सुभग सुत चारी। जनु अपबरग सकल तनुधारी॥

उनके साथ (परम हर्षयुक्त) साधुओं और ब्राह्मणों की मंडली ऐसी शोभा दे रही है, मानो समस्त सुख शरीर धारण करके उनकी सेवा कर रहे हों। चारों सुंदर पुत्र साथ में ऐसे सुशोभित हैं, मानो संपूर्ण मोक्ष (सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सायुज्य) शरीर धारण किए हुए हों।

मरकत कनक बरन बर जोरी। देखि सुरन्ह भै प्रीति न थोरी॥

पुनि रामहि बिलोकि हियँ हरषे। नृपहि सराहि सुमन तिन्ह बरषे॥

मरकतमणि और सुवर्ण के रंग की सुंदर जोड़ियों को देखकर देवताओं को कम प्रीति नहीं हुई (अर्थात बहुत ही प्रीति हुई)। फिर राम को देखकर वे हृदय में (अत्यंत) हर्षित हुए और राजा की सराहना करके उन्होंने फूल बरसाए।

दो० – राम रूपु नख सिख सुभग बारहिं बार निहारि।

पुलक गात लोचन सजल उमा समेत पुरारि॥ 315॥

नख से शिखा तक राम के सुंदर रूप को बार-बार देखते हुए पार्वती सहित शिव का शरीर पुलकित हो गया और उनके नेत्र (प्रेमाश्रुओं के) जल से भर गए॥ 315॥

केकि कंठ दुति स्यामल अंगा। तड़ित बिनिंदक बसन सुरंगा॥

ब्याह बिभूषन बिबिध बनाए। मंगल सब सब भाँति सुहाए॥

राम का मोर के कंठ की-सी कांतिवाला (हरिताभ) श्याम शरीर है। बिजली का अत्यंत निरादर करनेवाले प्रकाशमय सुंदर (पीत) रंग के वस्त्र हैं। सब मंगल रूप और सब प्रकार के सुंदर भाँति-भाँति के विवाह के आभूषण शरीर पर सजाए हुए हैं।

सरद बिमल बिधु बदनु सुहावन। नयन नवल राजीव लजावन॥

सकल अलौकिक सुंदरताई। कहि न जाइ मनहीं मन भाई॥

उनका सुंदर मुख शरत्पूर्णिमा के निर्मल चंद्रमा के समान और (मनोहर) नेत्र नवीन कमल को लजानेवाले हैं। सारी सुंदरता अलौकिक है। (माया की बनी नहीं है, दिव्य सच्चिदानंदमयी है) वह कहीं नहीं जा सकती, मन-ही-मन बहुत प्रिय लगती है।

बंधु मनोहर सोहहिं संगा। जात नचावत चपल तुरंगा।

राजकुअँर बर बाजि देखावहिं। बंस प्रसंसक बिरिद सुनावहिं॥

साथ में मनोहर भाई शोभित हैं, जो चंचल घोड़ों को नचाते हुए चले जा रहे हैं। राजकुमार श्रेष्ठ घोड़ों को (उनकी चाल को) दिखला रहे हैं और वंश की प्रशंसा करनेवाले (मागध-भाट) विरुदावली सुना रहे हैं।

जेहि तुरंग पर रामु बिराजे। गति बिलोकि खगनायकु लाजे॥

कहि न जाइ सब भाँति सुहावा। बाजि बेषु जनु काम बनावा॥

जिस घोड़े पर राम विराजमान हैं, उसकी (तेज) चाल देखकर गरुड़ भी लजा जाते हैं, उसका वर्णन नहीं हो सकता, वह सब प्रकार से सुंदर है। मानो कामदेव ने ही घोड़े का वेष धारण कर लिया हो।

छं० – जनु बाजि बेषु बनाइ मनसिजु राम हित अति सोहई।

आपनें बय बल रूप गुन गति सकल भुवन बिमोहई॥

जगमगत जीनु जराव जोति सुमोति मनि मानिक लगे।

किंकिनि ललाम लगामु ललित बिलोकि सुर नर मुनि ठगे॥

मानो राम के लिए कामदेव घोड़े का वेश बनाकर अत्यंत शोभित हो रहा है। वह अपनी अवस्था, बल, रूप, गुण और चाल से समस्त लोकों को मोहित कर रहा है। सुंदर मोती, मणि और माणिक्य लगी हुई जड़ाऊ जीन ज्योति से जगमगा रहा है। उसकी सुंदर घुँघरू लगी ललित लगाम को देखकर देवता, मनुष्य और मुनि सभी ठगे जाते हैं।

दो० – प्रभु मनसहिं लयलीन मनु चलत बाजि छबि पाव।

भूषित उड़गन तड़ित घनु जनु बर बरहि नचाव॥ 316॥

प्रभु की इच्छा में अपने मन को लीन किए चलता हुआ वह घोड़ा बड़ी शोभा पा रहा है। मानो तारागण तथा बिजली से अलंकृत मेघ सुंदर मोर को नचा रहा हो॥ 316॥

जेहिं बर बाजि रामु असवारा। तेहि सारदउ न बरनै पारा॥

संकरु राम रूप अनुरागे। नयन पंचदस अति प्रिय लागे॥

जिस श्रेष्ठ घोड़े पर राम सवार हैं, उसका वर्णन सरस्वती भी नहीं कर सकतीं। शंकर राम के रूप में ऐसे अनुरक्त हुए कि उन्हें अपने पंद्रह नेत्र इस समय बहुत ही प्यारे लगने लगे।

हरि हित सहित रामु जब जोहे। रमा समेत रमापति मोहे॥

निरखि राम छबि बिधि हरषाने। आठइ नयन जानि पछिताने॥

भगवान विष्णु ने जब प्रेम सहित राम को देखा, तब वे (रमणीयता की मूर्ति) लक्ष्मी के पति लक्ष्मी सहित मोहित हो गए। राम की शोभा देखकर ब्रह्मा बड़े प्रसन्न हुए, पर अपने आठ ही नेत्र जानकर पछताने लगे।

सुर सेनप उर बहुत उछाहू। बिधि ते डेवढ़ लोचन लाहू॥

रामहि चितव सुरेस सुजाना। गौतम श्रापु परम हित माना॥

देवताओं के सेनापति स्वामि कार्तिक के हृदय में बड़ा उत्साह है, क्योंकि वे ब्रह्मा से ड्योढ़े अर्थात बारह नेत्रों से रामदर्शन का सुंदर लाभ उठा रहे हैं। सुजान इंद्र (अपने हजार नेत्रों से) राम को देख रहे हैं और गौतम के शाप को अपने लिए परम हितकर मान रहे हैं।

देव सकल सुरपतिहि सिहाहीं। आजु पुरंदर सम कोउ नाहीं॥

मुदित देवगन रामहि देखी। नृपसमाज दुहुँ हरषु बिसेषी॥

सभी देवता देवराज इंद्र से ईर्ष्या कर रहे हैं (और कह रहे हैं) कि आज इंद्र के समान भाग्यवान दूसरा कोई नहीं है। राम को देखकर देवगण प्रसन्न हैं और दोनों राजाओं के समाज में विशेष हर्ष छा रहा है।

छं० – अति हरषु राजसमाज दुहु दिसि दुंदुभीं बाजहिं घनी।

बरषहिं सुमन सुर हरषि कहि जय जयति जय रघुकुलमनी॥

एहि भाँति जानि बरात आवत बाजने बहु बाजहीं।

रानी सुआसिनि बोलि परिछनि हेतु मंगल साजहीं॥

दोनों ओर से राजसमाज में अत्यंत हर्ष है और बड़े जोर से नगाड़े बज रहे हैं। देवता प्रसन्न होकर और ‘रघुकुलमणि राम की जय हो, जय हो, जय हो’ कहकर फूल बरसा रहे हैं। इस प्रकार बारात को आती हुई जानकर बहुत प्रकार के बाजे बजने लगे और रानी सुहागिन स्त्रियों को बुलाकर परछन के लिए मंगल द्रव्य सजाने लगीं।

दो० – सजि आरती अनेक बिधि मंगल सकल सँवारि।

चलीं मुदित परिछनि करन गजगामिनि बर नारि॥ 317॥

अनेक प्रकार से आरती सजकर और समस्त मंगल द्रव्यों को यथायोग्य सजाकर गजगामिनी (हाथी की-सी चालवाली) उत्तम स्त्रियाँ आनंदपूर्वक परछन के लिए चलीं॥ 317॥

बिधुबदनीं सब सब मृगलोचनि। सब निज तन छबि रति मदु मोचनि॥

पहिरें बरन बरन बर चीरा। सकल बिभूषन सजें सरीरा॥

सभी स्त्रियाँ चंद्रमुखी (चंद्रमा के समान मुखवाली) और सभी मृगलोचनी (हरिण की-सी आँखोंवाली) हैं और सभी अपने शरीर की शोभा से रति के गर्व को छुड़ानेवाली हैं। रंग-रंग की सुंदर साड़ियाँ पहने हैं और शरीर पर सब आभूषण सजे हुए हैं।

सकल सुमंगल अंग बनाएँ। करहिं गान कलकंठि लजाएँ॥

कंकन किंकिनि नूपुर बाजहिं। चालि बिलोकि काम गज लाजहिं॥

समस्त अंगों को सुंदर मंगल पदार्थों से सजाए हुए वे कोयल को भी लजाती हुई (मधुर स्वर से) गान कर रही हैं। कंगन, करधनी और नूपुर बज रहे हैं। स्त्रियों की चाल देखकर कामदेव के हाथी भी लजा जाते हैं।

बाजहिं बाजने बिबिध प्रकारा। नभ अरु नगर सुमंगलचारा॥

सची सारदा रमा भवानी। जे सुरतिय सुचि सहज सयानी॥

अनेक प्रकार के बाजे बज रहे हैं, आकाश और नगर दोनों स्थानों में सुंदर मंगलाचार हो रहे हैं। शची (इंद्राणी), सरस्वती, लक्ष्मी, पार्वती और जो स्वभाव से ही पवित्र और सयानी देवांगनाएँ थीं,

कपट नारि बर बेष बनाई। मिली सकल रनिवासहिं जाई॥

करहिं गान कल मंगल बानीं। हरष बिबस सब काहुँ न जानीं॥

वे सब कपट से सुंदर स्त्री का वेश बनाकर रनिवास में जा मिलीं और मनोहर वाणी से मंगलगान करने लगीं। सब कोई हर्ष के विशेष वश थे, अतः किसी ने उन्हें पहचाना नहीं।

छं० – को जान केहि आनंद बस सब ब्रह्मु बर परिछन चली।

कल गान मधुर निसान बरषहिं सुमन सुर सोभा भली॥

आनंदकंदु बिलोकि दूलहु सकलहियँ हरषित भई।

अंभोज अंबक अंबु उमगि सुअंग पुलकावलि छई॥

कौन किसे जाने-पहिचाने! आनंद के वश हुई सब दूलह बने हुए ब्रह्म का परछन करने चलीं। मनोहर गान हो रहा है। मधुर-मधुर नगाड़े बज रहे हैं, देवता फूल बरसा रहे हैं, बड़ी अच्छी शोभा है। आनंदकंद दूलह को देखकर सब स्त्रियाँ हृदय में हर्षित हुईं। उनके कमल सरीखे नेत्रों में प्रेमाश्रुओं का जल उमड़ आया और सुंदर अंगों में पुलकावली छा गई॥

दो० – जो सुखु भा सिय मातु मन देखि राम बर बेषु।

सो न सकहिं कहि कलप सत सहस सारदा सेषु॥ 318॥

राम का वर वेश देखकर सीता की माता सुनयना के मन में जो सुख हुआ, उसे हजारों सरस्वती और शेष सौ कल्पों में भी नहीं कह सकते (अथवा लाखों सरस्वती और शेष लाखों कल्पों में भी नहीं कह सकते)॥ 318॥

नयन नीरु हटि मंगल जानी। परिछनि करहिं मुदित मन रानी॥

बेद बिहित अरु कुल आचारू। कीन्ह भली बिधि सब ब्यवहारू॥

मंगल अवसर जानकर नेत्रों के जल को रोके हुए रानी प्रसन्न मन से परछन कर रही हैं। वेदों में कहे हुए तथा कुलाचार के अनुसार सभी व्यवहार रानी ने भली-भाँति किए।

पंच सबद धुनि मंगल गाना। पट पाँवड़े परहिं बिधि नाना॥

करि आरती अरघु तिन्ह दीन्हा। राम गमनु मंडप तब कीन्हा॥

पंचशब्द (तंत्री, ताल, झाँझ, नगारा और तुरही – इन पाँच प्रकार के बाजों के शब्द), पंचध्वनि (वेदध्वनि, वंदिध्वनि, जयध्वनि, शंखध्वनि और हुलूध्वनि) और मंगलगान हो रहे हैं। नाना प्रकार के वस्त्रों के पाँवड़े पड़ रहे हैं। उन्होंने (रानी ने) आरती करके अर्घ्य दिया, तब राम ने मंडप में गमन किया।

दसरथु सहित समाज बिराजे। बिभव बिलोकि लोकपति लाजे॥

समयँ समयँ सुर बरषहिं फूला। सांति पढ़हिं महिसुर अनुकूला॥

दशरथ अपनी मंडली सहित विराजमान हुए। उनके वैभव को देखकर लोकपाल भी लजा गए। समय-समय पर देवता फूल बरसाते हैं और भूदेव ब्राह्मण समयानुकूल शांति-पाठ करते हैं।

नभ अरु नगर कोलाहल होई। आपनि पर कछु सुनइ न कोई॥

एहि बिधि रामु मंडपहिं आए। अरघु देइ आसन बैठाए॥

आकाश और नगर में शोर मच रहा है। अपनी-पराई कोई कुछ भी नहीं सुनता। इस प्रकार राम मंडप में आए और अर्घ्य देकर आसन पर बैठाए गए।

छं० – बैठारि आसन आरती करि निरखि बरु सुखु पावहीं।

मनि बसन भूषन भूरि वारहिं नारि मंगल गावहीं॥

ब्रह्मादि सुरबर बिप्र बेष बनाइ कौतुक देखहीं।

अवलोकि रघुकुल कमल रबि छबि सुफल जीवन लेखहीं॥

आसन पर बैठाकर, आरती करके दूलह को देखकर स्त्रियाँ सुख पा रही हैं। वे ढेर के ढेर मणि, वस्त्र और गहने निछावर करके मंगल गा रही हैं। ब्रह्मा आदि श्रेष्ठ देवता ब्राह्मण का वेश बनाकर कौतुक देख रहे हैं। वे रघुकुलरूपी कमल को प्रफुल्लित करनेवाले सूर्य राम की छवि देखकर अपना जीवन सफल जान रहे हैं।

दो० – नाऊ बारी भाट नट राम निछावरि पाइ।

मुदित असीसहिं नाइ सिर हरषु न हृदयँ समाइ॥ 319॥

नाई, बारी, भाट और नट राम की निछावर पाकर आनंदित हो सिर नवाकर आशीष देते हैं, उनके हृदय में हर्ष समाता नहीं है॥ 319॥

मिले जनकु दसरथु अति प्रीतीं। करि बैदिक लौकिक सब रीतीं॥

मिलत महा दोउ राज बिराजे। उपमा खोजि खोजि कबि लाजे॥

वैदिक और लौकिक सब रीतियाँ करके जनक और दशरथ बड़े प्रेम से मिले। दोनों मिलते हुए बड़े ही शोभित हुए, कवि उनके लिए उपमा खोज-खोजकर लजा गए।

लही न कतहुँ हारि हियँ मानी। इन्ह सम एइ उपमा उर आनी॥

सामध देखि देव अनुरागे। सुमन बरषि जसु गावन लागे॥

जब कहीं भी उपमा नहीं मिली, तब हृदय में हार मानकर उन्होंने मन में यही उपमा निश्चित की कि इनके समान ये ही हैं। समधियों का मिलाप या परस्पर संबंध देखकर देवता अनुरक्त हो गए और फूल बरसाकर उनका यश गाने लगे।

जगु बिरंचि उपजावा जब तें। देखे सुने ब्याह बहु तब तें॥

सकल भाँति सम साजु समाजू। सम समधी देखे हम आजू॥

(वे कहने लगे -) जब से ब्रह्मा ने जगत को उत्पन्न किया, तब से हमने बहुत विवाह देखे-सुने, परंतु सब प्रकार से समान साज-समाज और बराबरी के (पूर्ण समतायुक्त) समधी तो आज ही देखे।

देव गिरा सुनि सुंदर साँची। प्रीति अलौकिक दुहु दिसि माची॥

देत पाँवड़े अरघु सुहाए। सादर जनकु मंडपहिं ल्याए॥

देवताओं की सुंदर सत्यवाणी सुनकर दोनों ओर अलौकिक प्रीति छा गई। सुंदर पाँवड़े और अर्घ्य देते हुए जनक दशरथ को आदरपूर्वक मंडप में ले आए।

छं० – मंडपु बिलोकि बिचित्र रचनाँ रुचिरताँ मुनि मन हरे।

निज पानि जनक सुजान सब कहुँ आनि सिंघासन धरे॥

कुल इष्ट सरिस बसिष्ट पूजे बिनय करि आसिष लही।

कौसिकहि पूजन परम प्रीति कि रीति तौ न परै कही॥

मंडप को देखकर उसकी विचित्र रचना और सुंदरता से मुनियों के मन भी हरे गए (मोहित हो गए)। सुजान जनक ने अपने हाथों से ला-लाकर सबके लिए सिंहासन रखे। उन्होंने अपने कुल के इष्ट देवता के समान वशिष्ठ की पूजा की और विनय करके आशीर्वाद प्राप्त किया। विश्वामित्र की पूजा करते समय की परम प्रीति की रीति तो कहते ही नहीं बनती।

दो० – बामदेव आदिक रिषय पूजे मुदित महीस॥

दिए दिब्य आसन सबहि सब सन लही असीस॥ 320॥

राजा ने वामदेव आदि ऋषियों की प्रसन्न मन से पूजा की। सभी को दिव्य आसन दिए और सबसे आशीर्वाद प्राप्त किया॥ 320॥

बहुरि कीन्हि कोसलपति पूजा। जानि ईस सम भाउ न दूजा॥

कीन्हि जोरि कर बिनय बड़ाई। कहि निज भाग्य बिभव बहुताई॥

फिर उन्होंने कोसलाधीश राजा दशरथ की पूजा उन्हें ईश (महादेव) के समान जानकर की, कोई दूसरा भाव न था। तदनंतर (उनके संबंध से) अपने भाग्य और वैभव के विस्तार की सराहना करके हाथ जोड़कर विनती और बड़ाई की।

पूजे भूपति सकल बराती। समधी सम सादर सब भाँती॥

आसन उचित दिए सब काहू। कहौं काह मुख एक उछाहू॥

राजा जनक ने सब बारातियों का समधी दशरथ के समान ही सब प्रकार से आदरपूर्वक पूजन किया और सब किसी को उचित आसन दिए। मैं एक मुख से उस उत्साह का क्या वर्णन करूँ।

सकल बरात जनक सनमानी। दान मान बिनती बर बानी॥

बिधि हरि हरु दिसिपति दिनराऊ। जे जानहिं रघुबीर प्रभाऊ॥

राजा जनक ने दान, मान-सम्मान, विनय और उत्तम वाणी से सारी बारात का सम्मान किया। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, दिक्पाल और सूर्य जो रघुनाथ का प्रभाव जानते हैं,

कपट बिप्र बर बेष बनाएँ। कौतुक देखहिं अति सचु पाएँ॥

पूजे जनक देव सम जानें। दिए सुआसन बिनु पहिचानें॥

वे कपट से ब्राह्मणों का सुंदर वेश बनाए बहुत ही सुख पाते हुए सब लीला देख रहे थे। जनक ने उनको देवताओं के समान जानकर उनका पूजन किया और बिना पहिचाने भी उन्हें सुंदर आसन दिए।

छं० – पहिचान को केहि जान सबहि अपान सुधि भोरी भई।

आनंद कंदु बिलोकि दूलहु उभय दिसि आनँदमई॥

सुर लखे राम सुजान पूजे मानसिक आसन दए।

अवलोकि सीलु सुभाउ प्रभु को बिबुध मन प्रमुदित भए॥

कौन किसको जाने-पहिचाने! सबको अपनी ही सुध भूली हुई है। आनंदकंद दूलह को देखकर दोनों ओर आनंदमयी स्थिति हो रही है। सुजान (सर्वज्ञ) राम ने देवताओं को पहचान लिया और उनकी मानसिक पूजा करके उन्हें मानसिक आसन दिए। प्रभु का शील-स्वभाव देखकर देवगण मन में बहुत आनंदित हुए।

दो० – रामचंद्र मुख चंद्र छबि लोचन चारु चकोर।

करत पान सादर सकल प्रेमु प्रमोदु न थोर॥ 321॥

रामचंद्र के मुखरूपी चंद्रमा की छवि को सभी के सुंदर नेत्ररूपी चकोर आदरपूर्वक पान कर रहे हैं; प्रेम और आनंद कम नहीं है (अर्थात बहुत है)॥ 321॥

समउ बिलोकि बसिष्ठ बोलाए। सादर सतानंदु सुनि आए॥

बेगि कुअँरि अब आनहु जाई। चले मुदित मुनि आयसु पाई॥

समय देखकर वशिष्ठ ने शतानंद को आदरपूर्वक बुलाया। वे सुनकर आदर के साथ आए। वशिष्ठ ने कहा – अब जाकर राजकुमारी को शीघ्र ले आइए। मुनि की आज्ञा पाकर वे प्रसन्न होकर चले।

रानी सुनि उपरोहित बानी। प्रमुदित सखिन्ह समेत सयानी॥

बिप्र बधू कुल बृद्ध बोलाईं। करि कुल रीति सुमंगल गाईं॥

बुद्धिमती रानी पुरोहित की वाणी सुनकर सखियों समेत बड़ी प्रसन्न हुईं। ब्राह्मणों की स्त्रियों और कुल की बूढ़ी स्त्रियों को बुलाकर उन्होंने कुलरीति करके सुंदर मंगल गीत गाए।

नारि बेष जे सुर बर बामा। सकल सुभायँ सुंदरी स्यामा॥

तिन्हहि देखि सुखु पावहिं नारी। बिनु पहिचानि प्रानहु ते प्यारीं॥

श्रेष्ठ देवांगनाएँ, जो सुंदर मनुष्य-स्त्रियों के वेश में हैं, सभी स्वभाव से ही सुंदरी और श्यामा (सोलह वर्ष की अवस्थावाली) हैं। उनको देखकर रनिवास की स्त्रियाँ सुख पाती हैं और बिना पहचान के ही वे सबको प्राणों से भी प्यारी हो रही हैं।

बार बार सनमानहिं रानी। उमा रमा सारद सम जानी॥

सीय सँवारि समाजु बनाई। मुदित मंडपहिं चलीं लवाई॥

उन्हें पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती के समान जानकर रानी बार-बार उनका सम्मान करती हैं। (रनिवास की स्त्रियाँ और सखियाँ) सीता का श्रृंगार करके, मंडली बनाकर, प्रसन्न होकर उन्हें मंडप में लिवा चलीं।

छं० – चलि ल्याइ सीतहि सखीं सादर सजि सुमंगल भामिनीं।

नवसप्त साजें सुंदरी सब मत्त कुंजर गामिनीं॥

कल गान सुनि मुनि ध्यान त्यागहिं काम कोकिल लाजहीं।

मंजीर नूपुर कलित कंकन ताल गति बर बाजहीं॥

सुंदर मंगल का साज सजकर (रनिवास की) स्त्रियाँ और सखियाँ आदर सहित सीता को लिवा चलीं। सभी सुंदरियाँ सोलहों श्रृंगार किए हुए मतवाले हाथियों की चाल से चलनेवाली हैं। उनके मनोहर गान को सुनकर मुनि ध्यान छोड़ देते हैं और कामदेव की कोयलें भी लजा जाती हैं। पायजेब, पैंजनी और सुंदर कंकण ताल की गति पर बड़े सुंदर बज रहे हैं।

दो० – सोहति बनिता बृंद महुँ सहज सुहावनि सीय।

छबि ललना गन मध्य जनु सुषमा तिय कमनीय॥ 322॥

सहज ही सुंदरी सीता स्त्रियों के समूह में इस प्रकार शोभा पा रही हैं, मानो छविरूपी ललनाओं के समूह के बीच साक्षात परम मनोहर शोभारूपी स्त्री सुशोभित हो॥ 322॥

सिय सुंदरता बरनि न जाई। लघु मति बहुत मनोहरताई॥

आवत दीखि बरातिन्ह सीता। रूप रासि सब भाँति पुनीता॥

सीता की सुंदरता का वर्णन नहीं हो सकता, क्योंकि बुद्धि बहुत छोटी है और मनोहरता बहुत बड़ी है। रूप की राशि और सब प्रकार से पवित्र सीता को बारातियों ने आते देखा।

सबहिं मनहिं मन किए प्रनामा। देखि राम भए पूरनकामा॥

हरषे दसरथ सुतन्ह समेता। कहि न जाइ उर आनँदु जेता॥

सभी ने उन्हें मन-ही-मन प्रणाम किया। राम को देखकर तो सभी पूर्णकाम (कृतकृत्य) हो गए। राजा दशरथ पुत्रों सहित हर्षित हुए। उनके हृदय में जितना आनंद था, वह कहा नहीं जा सकता।

सुर प्रनामु करि बरिसहिं फूला। मुनि असीस धुनि मंगल मूला॥

गान निसान कोलाहलु भारी। प्रेम प्रमोद मगन नर नारी॥

देवता प्रणाम करके फूल बरसा रहे हैं। मंगलों की मूल मुनियों के आशीर्वादों की ध्वनि हो रही है। गानों और नगाड़ों के शब्द से बड़ा शोर मच रहा है। सभी नर-नारी प्रेम और आनंद में मग्न हैं।

एहि बिधि सीय मंडपहिं आई। प्रमुदित सांति पढ़हिं मुनिराई॥

तेहि अवसर कर बिधि ब्यवहारू। दुहुँ कुलगुर सब कीन्ह अचारू॥

इस प्रकार सीता मंडप में आईं। मुनिराज बहुत ही आनंदित होकर शांतिपाठ पढ़ रहे हैं। उस अवसर की सब रीति, व्यवहार और कुलाचार दोनों कुलगुरुओं ने किए।

छं० – आचारु करि गुर गौरि गनपति मुदित बिप्र पुजावहीं।

सुर प्रगटि पूजा लेहिं देहिं असीस अति सुखु पावहीं॥

मधुपर्क मंगल द्रब्य जो जेहि समय मुनि मन महुँ चहैं।

भरे कनक कोपर कलस सो तब लिएहिं परिचारक रहैं॥

कुलाचार करके गुरु प्रसन्न होकर गौरी, गणेश और ब्राह्मणों की पूजा करा रहे हैं (अथवा ब्राह्मणों के द्वारा गौरी और गणेश की पूजा करवा रहे हैं)। देवता प्रकट होकर पूजा ग्रहण करते हैं, आशीर्वाद देते हैं और अत्यंत सुख पा रहे हैं। मधुपर्क आदि जिस किसी भी मांगलिक पदार्थ की मुनि जिस समय भी मन में चाह मात्र करते हैं, सेवकगण उसी समय सोने की परातों में और कलशों में भरकर उन पदार्थों को लिए तैयार रहते हैं।

कुल रीति प्रीति समेत रबि कहि देत सबु सादर कियो।

एहि भाँति देव पुजाइ सीतहि सुभग सिंघासनु दियो॥

सिय राम अवलोकनि परसपर प्रेमु काहुँ न लखि परै।

मन बुद्धि बर बानी अगोचर प्रगट कबि कैसें करै॥

स्वयं सूर्यदेव प्रेम सहित अपने कुल की सब रीतियाँ बता देते हैं और वे सब आदरपूर्वक की जा रही हैं। इस प्रकार देवताओं की पूजा कराके मुनियों ने सीता को सुंदर सिंहासन दिया। सीता और राम का आपस में एक-दूसरे को देखना तथा उनका परस्पर का प्रेम किसी को लख नहीं पड़ रहा है। जो बात श्रेष्ठ मन, बुद्धि और वाणी से भी परे है, उसे कवि क्योंकर प्रकट करे?

दो० – होम समय तनु धरि अनलु अति सुख आहुति लेहिं।

बिप्र बेष धरि बेद सब कहि बिबाह बिधि देहिं॥ 323॥

हवन के समय अग्निदेव शरीर धारण करके बड़े ही सुख से आहुति ग्रहण करते हैं और सारे वेद ब्राह्मण वेष धरकर विवाह की विधियाँ बताए देते हैं॥ 323॥

जनक पाटमहिषी जग जानी। सीय मातु किमि जाइ बखानी॥

सुजसु सुकृत सुख सुंदरताई। सब समेटि बिधि रची बनाई॥

जनक की जगद्विख्यात पटरानी और सीता की माता का बखान तो हो ही कैसे सकता है। सुयश, सुकृत (पुण्य), सुख और सुंदरता सबको बटोरकर विधाता ने उन्हें सँवारकर तैयार किया है।

समउ जानि मुनिबरन्ह बोलाईं। सुनत सुआसिनि सादर ल्याईं॥

जनक बाम दिसि सोह सुनयना। हिमगिरि संग बनी जनु मयना॥

समय जानकर श्रेष्ठ मुनियों ने उनको बुलवाया। यह सुनते ही सुहागिनी स्त्रियाँ उन्हें आदरपूर्वक ले आईं। सुनयना (जनक की पटरानी) जनक की बाईं ओर ऐसी सोह रही हैं, मानो हिमाचल के साथ मैना शोभित हों।

कनक कलस मनि कोपर रूरे। सुचि सुगंध मंगल जल पूरे॥

निज कर मुदित रायँ अरु रानी। धरे राम के आगें आनी॥

पवित्र, सुगंधित और मंगल जल से भरे सोने के कलश और मणियों की सुंदर परातें राजा और रानी ने आनंदित होकर अपने हाथों से लाकर राम के आगे रखीं।

पढ़हिं बेद मुनि मंगल बानी। गगन सुमन झरि अवसरु जानी॥

बरु बिलोकि दंपति अनुरागे। पाय पुनीत पखारन लागे॥

मुनि मंगलवाणी से वेद पढ़ रहे हैं। सुअवसर जानकर आकाश से फूलों की झड़ी लग गई है। दूल्हे को देखकर राजा-रानी प्रेममग्न हो गए और उनके पवित्र चरणों को पखारने लगे।

छं० – लागे पखारन पाय पंकज प्रेम तन पुलकावली।

नभ नगर गान निसान जय धुनि उमगि जनु चहुँ दिसि चली॥

जे पद सरोज मनोज अरि उर सर सदैव बिराजहीं।

जे सुकृत सुमिरत बिमलता मन सकल कलि मल भाजहीं॥

वे राम के चरण कमलों को पखारने लगे, प्रेम से उनके शरीर में पुलकावली छा रही है। आकाश और नगर में होनेवाली गान, नगाड़े और जय-जयकार की ध्वनि मानो चारों दिशाओं में उमड़ चली, जो चरण कमल कामदेव के शत्रु शिव के हृदयरूपी सरोवर में सदा ही विराजते हैं, जिनका एक बार भी स्मरण करने से मन में निर्मलता आ जाती है और कलियुग के सारे पाप भाग जाते हैं,

जे परसि मुनिबनिता लही गति रही जो पातकमई।

मकरंदु जिन्ह को संभु सिर सुचिता अवधि सुर बरनई॥

करि मधुप मन मुनि जोगिजन जे सेइ अभिमत गति लहैं।

ते पद पखारत भाग्यभाजनु जनकु जय जय सब कहैं॥

जिनका स्पर्श पाकर गौतम मुनि की स्त्री अहल्या ने, जो पापमयी थी, परमगति पाई, जिन चरणकमलों का मकरंद रस (गंगा) शिव के मस्तक पर विराजमान है, जिसको देवता पवित्रता की सीमा बताते हैं; मुनि और योगीजन अपने मन को भौंरा बनाकर जिन चरणकमलों का सेवन करके मनोवांछित गति प्राप्त करते हैं; उन्हीं चरणों को भाग्य के पात्र (बड़भागी) जनक धो रहे हैं; यह देखकर सब जय-जयकार कर रहे हैं।

बर कुअँरि करतल जोरि साखोचारु दोउ कुलगुर करैं।

भयो पानिगहनु बिलोकि बिधि सुर मनुज मुनि आनँद भरैं॥

सुखमूल दूलहु देखि दंपति पुलक तन हुलस्यो हियो।

करि लोक बेद बिधानु कन्यादानु नृपभूषन कियो॥

दोनों कुलों के गुरु वर और कन्या की हथेलियों को मिलाकर शाखोच्चार करने लगे। पाणिग्रहण हुआ देखकर ब्रह्मादि देवता, मनुष्य और मुनि आनंद में भर गए। सुख के मूल दूल्हे को देखकर राजा-रानी का शरीर पुलकित हो गया और हृदय आनंद से उमंग उठा। राजाओं के अलंकार स्वरूप जनक ने लोक और वेद की रीति को करके कन्यादान किया।

हिमवंत जिमि गिरिजा महेसहि हरिहि सागर दई।

तिमि जनक रामहि सिय समरपी बिस्व कल कीरति नई॥

क्यों करै बिनय बिदेहु कियो बिदेहु मूरति सावँरीं।

करि होमु बिधिवत गाँठि जोरी होन लागीं भावँरीं॥

जैसे हिमवान ने शिव को पार्वती और सागर ने भगवान विष्णु को लक्ष्मी दी थीं, वैसे ही जनक ने राम को सीता समर्पित कीं, जिससे विश्व में सुंदर नवीन कीर्ति छा गई। विदेह (जनक) कैसे विनती करें! उस साँवली मूर्ति ने तो उन्हें सचमुच विदेह (देह की सुध-बुध से रहित) ही कर दिया। विधिपूर्वक हवन करके गठजोड़ी की गई और भाँवरें होने लगीं।

दो० – जय धुनि बंदी बेद धुनि मंगल गान निसान।

सुनि हरषहिं बरषहिं बिबुध सुरतरु सुमन सुजान॥ 324॥

जय ध्वनि, वंदि ध्वनि, वेद ध्वनि, मंगलगान और नगाड़ों की ध्वनि सुनकर चतुर देवगण हर्षित हो रहे हैं और कल्पवृक्ष के फूलों को बरसा रहे हैं॥ 324॥

कुअँरु कुअँरि कल भावँरि देहीं। नयन लाभु सब सादर लेहीं॥

जाइ न बरनि मनोहर जोरी। जो उपमा कछु कहौं सो थोरी॥

वर और कन्या सुंदर भाँवरें दे रहे हैं। सब लोग आदरपूर्वक (उन्हें देखकर) नेत्रों का परम लाभ ले रहे हैं। मनोहर जोड़ी का वर्णन नहीं हो सकता, जो कुछ उपमा कहूँ वही थोड़ी होगी।

राम सीय सुंदर प्रतिछाहीं। जगमगात मनि खंभन माहीं॥

मनहुँ मदन रति धरि बहु रूपा। देखत राम बिआहु अनूपा॥

राम और सीता की सुंदर परछाईं मणियों के खम्भों में जगमगा रही हैं, मानो कामदेव और रति बहुत-से रूप धारण करके राम के अनुपम विवाह को देख रहे हैं।

दरस लालसा सकुच न थोरी। प्रगटत दुरत बहोरि बहोरी॥

भए मगन सब देखनिहारे। जनक समान अपान बिसारे॥

उन्हें (कामदेव और रति को) दर्शन की लालसा और संकोच दोनों ही कम नहीं हैं (अर्थात बहुत हैं); इसीलिए वे मानो बार-बार प्रकट होते और छिपते हैं। सब देखनेवाले आनंदमग्न हो गए और जनक की भाँति सभी अपनी सुध भूल गए।

प्रमुदित मुनिन्ह भावँरीं फेरीं। नेगसहित सब रीति निबेरीं॥

राम सीय सिर सेंदुर देहीं। सोभा कहि न जाति बिधि केहीं॥

मुनियों ने आनंदपूर्वक भाँवरें फिराईं और नेग सहित सब रीतियों को पूरा किया। राम सीता के सिर में सिंदूर दे रहे हैं; यह शोभा किसी प्रकार भी कही नहीं जाती।

अरुन पराग जलजु भरि नीकें। ससिहि भूष अहि लोभ अमी कें॥

बहुरि बसिष्ठ दीन्हि अनुसासन। बरु दुलहिनि बैठे एक आसन॥

मानो कमल को लाल पराग से अच्छी तरह भरकर अमृत के लोभ से साँप चंद्रमा को भूषित कर रहा है। (यहाँ राम के हाथ को कमल की, सिंदूर को पराग की, राम की श्याम भुजा को साँप की और सीता के मुख को चंद्रमा की उपमा दी गई है) फिर वशिष्ठ ने आज्ञा दी, तब दूल्हा और दुलहिन एक आसन पर बैठे।

छं० – बैठे बरासन रामु जानकि मुदित मन दसरथु भए।

तनु पुलक पुनि पुनि देखि अपनें सुकृत सुरतरु फल नए॥

भरि भुवन रहा उछाहु राम बिबाहु भा सबहीं कहा।

केहि भाँति बरनि सिरात रसना एक यहु मंगलु महा॥

राम और जानकी श्रेष्ठ आसन पर बैठे; उन्हें देखकर दशरथ मन में बहुत आनंदित हुए। अपने सुकृतरूपी कल्प वृक्ष में नए फल (आए) देखकर उनका शरीर बार-बार पुलकित हो रहा है। चौदहों भुवनों में उत्साह भर गया; सबने कहा कि राम का विवाह हो गया। जीभ एक है और यह मंगल महान है; फिर भला, वह वर्णन करके किस प्रकार समाप्त किया जा सकता है।

तब जनक पाइ बसिष्ठ आयसु ब्याह साज सँवारि कै।

मांडवी श्रुतकीरति उरमिला कुअँरि लईं हँकारि कै॥

कुसकेतु कन्या प्रथम जो गुन सील सुख सोभामई।

सब रीति प्रीति समेत करि सो ब्याहि नृप भरतहि दई॥

तब वशिष्ठ की आज्ञा पाकर जनक ने विवाह का सामान सजाकर मांडवी, श्रुतकीर्ति और उर्मिला – इन तीनों राजकुमारियों को बुला लिया। कुशध्वज की बड़ी कन्या मांडवी को, जो गुण, शील, सुख और शोभा की रूप ही थीं, राजा जनक ने प्रेमपूर्वक सब रीतियाँ करके भरत को ब्याह दिया।

जानकी लघु भगिनी सकल सुंदरि सिरोमनि जानि कै।

सो तनय दीन्ही ब्याहि लखनहि सकल बिधि सनमानि कै॥

जेहि नामु श्रुतकीरति सुलोचनि सुमुखि सब गुन आगरी।

सो दई रिपुसूदनहि भूपति रूप सील उजागरी॥

जानकी की छोटी बहिन उर्मिला को सब सुंदरियों में शिरोमणि जानकर उस कन्या को सब प्रकार से सम्मान करके, लक्ष्मण को ब्याह दिया; और जिनका नाम श्रुतकीर्ति है और जो सुंदर नेत्रोंवाली, सुंदर मुखवाली, सब गुणों की खान और रूप तथा शील में उजागर हैं, उनको राजा ने शत्रुघ्न को ब्याह दिया।

अनुरूप बर दुलहिनि परस्पर लखि सकुच हियँ हरषहीं।

सब मुदित सुंदरता सराहहिं सुमन सुर गन बरषहीं॥

सुंदरीं सुंदर बरन्ह सह सब एक मंडप राजहीं।

जनु जीव उर चारिउ अवस्था बिभुन सहित बिराजहीं॥

दूल्हा और दुलहिनें परस्पर अपने-अपने अनुरूप जोड़ी को देखकर सकुचाते हुए हृदय में हर्षित हो रही हैं। सब लोग प्रसन्न होकर उनकी सुंदरता की सराहना करते हैं और देवगण फूल बरसा रहे हैं। सब सुंदरी दुलहिनें सुंदर दूल्हों के साथ एक ही मंडप में ऐसी शोभा पा रही हैं, मानो जीव के हृदय में चारों अवस्थाएँ (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय) अपने चारों स्वामियों (विश्व, तैजस, प्राज्ञ और ब्रह्म) सहित विराजमान हों।

दो० – मुदित अवधपति सकल सुत बधुन्ह समेत निहारि।

जनु पाए महिपाल मनि क्रियन्ह सहित फल चारि॥ 325॥

सब पुत्रों को बहुओं सहित देखकर अवध नरेश दशरथ ऐसे आनंदित हैं, मानो वे राजाओं के शिरोमणि क्रियाओं (यज्ञक्रिया, श्रद्धाक्रिया, योगक्रिया और ज्ञानक्रिया) सहित चारों फल (अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष) पा गए हों॥ 325॥

जसि रघुबीर ब्याह बिधि बरनी। सकल कुअँर ब्याहे तेहिं करनी॥

कहि न जाइ कछु दाइज भूरी। रहा कनक मनि मंडपु पूरी॥

राम के विवाह की जैसी विधि वर्णन की गई, उसी रीति से सब राजकुमार विवाहे गए। दहेज की अधिकता कुछ कही नहीं जाती; सारा मंडप सोने और मणियों से भर गया।

कंबल बसन बिचित्र पटोरे। भाँति भाँति बहु मोल न थोरे॥

गज रथ तुरगदास अरु दासी। धेनु अलंकृत कामदुहा सी॥

बहुत-से कंबल, वस्त्र और भाँति-भाँति के विचित्र रेशमी कपड़े, जो थोड़ी कीमत के न थे (अर्थात बहुमूल्य थे) तथा हाथी, रथ, घोड़े, दास-दासियाँ और गहनों से सजी हुई कामधेनु-सरीखी गाएँ –

बस्तु अनेक करिअ किमि लेखा। कहि न जाइ जानहिं जिन्ह देखा॥

लोकपाल अवलोकि सिहाने। लीन्ह अवधपति सबु सुखु माने॥

(आदि) अनेकों वस्तुएँ हैं, जिनकी गिनती कैसे की जाए। उनका वर्णन नहीं किया जा सकता; जिन्होंने देखा है वही जानते हैं। उन्हें देखकर लोकपाल भी सिहा गए। अवधराज दशरथ ने सुख मानकर प्रसन्नचित्त से सब कुछ ग्रहण किया।

दीन्ह जाचकन्हि जो जेहि भावा। उबरा सो जनवासेहिं आवा॥

तब कर जोरि जनकु मृदु बानी। बोले सब बरात सनमानी॥

उन्होंने वह दहेज का सामान याचकों को, जो जिसे अच्छा लगा, दे दिया। जो बच रहा, वह जनवासे में चला आया। तब जनक हाथ जोड़कर सारी बारात का सम्मान करते हुए कोमल वाणी से बोले।

छं० – सनमानि सकल बरात आदर दान बिनय बड़ाइ कै।

प्रमुदित महामुनि बृंद बंदे पूजि प्रेम लड़ाइ कै॥

सिरु नाइ देव मनाइ सब सन कहत कर संपुट किएँ।

सुर साधु चाहत भाउ सिंधु कि तोष जल अंजलि दिएँ॥

आदर, दान, विनय और बड़ाई के द्वारा सारी बारात का सम्मान कर राजा जनक ने महान आनंद के साथ प्रेमपूर्वक लड़ाकर (लाड़ करके) मुनियों के समूह की पूजा एवं वंदना की। सिर नवाकर, देवताओं को मनाकर, राजा हाथ जोड़कर सबसे कहने लगे कि देवता और साधु तो भाव ही चाहते हैं (वे प्रेम से ही प्रसन्न हो जाते हैं, उन पूर्णकाम महानुभावों को कोई कुछ देकर कैसे संतुष्ट कर सकता है); क्या एक अंजलि जल देने से कहीं समुद्र संतुष्ट हो सकता है।

कर जोरि जनकु बहोरि बंधु समेत कोसलराय सों।

बोले मनोहर बयन सानि सनेह सील सुभाय सों॥

संबंध राजन रावरें हम बड़े अब सब बिधि भए।

एहि राज साज समेत सेवक जानिबे बिनु गथ लए॥

फिर जनक भाई सहित हाथ जोड़कर कोसलाधीश दशरथ से स्नेह, शील और सुंदर प्रेम में सानकर मनोहर वचन बोले – हे राजन! आपके साथ संबंध हो जाने से अब हम सब प्रकार से बड़े हो गए। इस राज-पाट सहित हम दोनों को आप बिना दाम के लिए हुए सेवक ही समझिएगा।

ए दारिका परिचारिका करि पालिबीं करुना नई।

अपराधु छमिबो बोलि पठए बहुत हौं ढीट्यो कई॥

पुनि भानुकुलभूषन सकल सनमान निधि समधी किए।

कहि जाति नहिं बिनती परस्पर प्रेम परिपूरन हिए॥

इन लड़कियों को टहलनी मानकर, नई-नई दया करके पालन कीजिएगा। मैंने बड़ी ढिठाई की कि आपको यहाँ बुला भेजा, अपराध क्षमा कीजिएगा। फिर सूर्यकुल के भूषण दशरथ ने समधी जनक को संपूर्ण सम्मान का निधि कर दिया (इतना सम्मान किया कि वे सम्मान के भंडार ही हो गए)। उनकी परस्पर की विनय कही नहीं जाती, दोनों के हृदय प्रेम से परिपूर्ण हैं।

बृंदारका गन सुमन बरिसहिं राउ जनवासेहि चले।

दुंदुभी जय धुनि बेद धुनि नभ नगर कौतूहल भले॥

तब सखीं मंगल गान करत मुनीस आयसु पाइ कै।

दूलह दुलहिनिन्ह सहित सुंदरि चलीं कोहबर ल्याइ कै॥

देवतागण फूल बरसा रहे हैं; राजा जनवासे को चले। नगाड़े की ध्वनि, जयध्वनि और वेद की ध्वनि हो रही है, आकाश और नगर दोनों में खूब कौतूहल हो रहा है (आनंद छा रहा है), तब मुनीश्वर की आज्ञा पाकर सुंदरी सखियाँ मंगलगान करती हुई दुलहिनों सहित दूल्हों को लिवाकर कोहबर को चलीं।

दो० – पुनि पुनि रामहि चितव सिय सकुचति मनु सकुचै न।

हरत मनोहर मीन छबि प्रेम पिआसे नैन॥ 326॥

सीता बार-बार राम को देखती हैं और सकुचा जाती हैं; पर उनका मन नहीं सकुचाता। प्रेम के प्यासे उनके नेत्र सुंदर मछलियों की छवि को हर रहे हैं॥ 326॥

श्री राम चरित मानस- बालकाण्ड, मासपारायण, ग्यारहवाँ विश्राम समाप्त॥

मैं एक पत्नी होने के साथ साथ गृहिणी एवं माँ भी हुँ । लिखने का हुनर... ब्लॉग लिखती रहती हु... सनातन ग्रुप एक सकारात्मक ऊर्जा, आत्मनिर्भर बनाने की प्रेरणा देती जीवनी, राष्ट्रभक्ति गीत एवं कविताओं की माला पिरोया है । आग्रह :आपको पसन्द आये तो ऊर्जा देने के लिए शेयर एवं अपने सुझाव दीजिए ।

शालू सिंह

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