तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णम्युत्सृजामि च |
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन || गीता 9/19||

अर्थ: मैं ही सूर्य रूप से तपता हूं, वर्षा का आकर्षण और बरसाता हूं। हे अर्जुन! अमृत और मृत्यु मैं ही हूं और मैं ही सत्-असत् भी हूं।

व्याख्या: क्योंकि परमात्मा कण-कण में व्याप्त है, इसलिए जो कुछ भी इस सृष्टि में होता वह कुछ और नहीं बल्कि परमात्मा का ही रूप है। यहां भगवान कह रहे हैं कि मैं ही सूर्य रूप से तपता हूं, अर्थात धरती पर जो सूर्य से जीवन है, वह भी परमात्मा ही है।

ऐसे ही वर्षा होने की प्रक्रिया भी मेरे से ही होती है। हे अर्जुन! अमृत अर्थात अमरता भी मैं ही हूं और इतना ही नहीं, बल्कि मृत्यु भी मैं ही हूं। जो हमेशा रहने वाला अपरिवर्तनीय स्वरूप है, यानि सत भी मैं ही हूं और जो बदलता रहता है, वो परिवर्तनीय पदार्थ यानि असत भी मैं ही हूं।

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मैं एक पत्नी होने के साथ साथ गृहिणी एवं माँ भी हुँ । लिखने का हुनर... ब्लॉग लिखती रहती हु... सनातन ग्रुप एक सकारात्मक ऊर्जा, आत्मनिर्भर बनाने की प्रेरणा देती जीवनी, राष्ट्रभक्ति गीत एवं कविताओं की माला पिरोया है । आग्रह :आपको पसन्द आये तो ऊर्जा देने के लिए शेयर एवं अपने सुझाव दीजिए ।

शालू सिंह

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