गतिर्भर्ता प्रभु: साक्षी निवास: शरणं सुहृत्|
प्रभव: प्रलय: स्थानं निधानं बीजमव्ययम्|| गीता 9/18||

अर्थ: सबकी परम गति, भरण-पोषण करने वाला, सबका प्रभु, सबका साक्षी, सबका वासस्थान, शरण लेने योग्य, सबका सुहृदय, उत्पत्ति और प्रलय का कारण, सबकी स्थिति का आधार, निधान और अविनाशी बीज भी मैं ही हूं।

व्याख्या: परमात्मा से ही यह जगत और जगत का कण-कण पैदा हुआ है। ब्रह्माण्ड में ऐसा कुछ भी नहीं, जो परमात्मा के अलावा हो। इसलिए भगवान कह रहे हैं कि सब प्राणियों की परम गति मैं ही हूं। सबका लालन-पालन करने वाला, सबका प्रभु और सबका साक्षी भी मैं ही हूं।

सब मुझमें ही निवास करते हैं और मेरी ही शरण लेने योग्य है। सबको प्रेम करने वाला, सबकी उत्पत्ति और प्रलय का कारण तथा सबका आधार मैं ही हूं। निधान अर्थात सभी जीवात्मा मुझमें ही सूक्ष्म रूप से वास करती हैं और कभी भी नाश न होने वाला बीज अर्थात सबका आत्मा में ही हूं।

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मैं एक पत्नी होने के साथ साथ गृहिणी एवं माँ भी हुँ । लिखने का हुनर... ब्लॉग लिखती रहती हु... सनातन ग्रुप एक सकारात्मक ऊर्जा, आत्मनिर्भर बनाने की प्रेरणा देती जीवनी, राष्ट्रभक्ति गीत एवं कविताओं की माला पिरोया है । आग्रह :आपको पसन्द आये तो ऊर्जा देने के लिए शेयर एवं अपने सुझाव दीजिए ।

शालू सिंह

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